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Basant Season Essay in Hindi | Rituraj Basant

बसन्त यानी मौसम का राजकुमार

बसंत ऋतु पर सुंदर ललित निबंध। मौसम का राजकुमार कहे जाने वाले बसंत में प्रकृति, संस्कृति, कविता और उत्सव का जीवंत वर्णन


बसन्त यानी मौसम का राजकुमार

गिरीश पंकज

अपने देश में छह अतुएँ आती-जाती है। ग्रीष्म, वर्षा, शरद तिशिर, हेमंत और बसन्त। लेकिन बसन्त का आना ऐसा लगता है, जैसे आंगन में खुशियाँ नाच रही हैं। इसे हम मधुमास भी कहते है। इस मौसम में न बहुत अधिक ठंड, और न ज्यादा गरमी। चारों तरफ पामरी हुई हरियाली। खिले हुए फूल। चहकते हुए पांडी। दिन की चमक बढ़ जाती है। दूर पहाड़ों में जमी बर्फ भी धीरे-धीरे पिघलने लगती है। पहाड़ी क्षेत्र में रहने चाले लोगों को तब थोड़ा सुकून मिलता है। अपीली पहाड़ियों से बहता हुआ पानी धरती को शीतलता प्रदान करता है। धरती कुछ और नम हो जाती है। फसल के लिए बेहद उपयोगी। जगा पर्वत, क्या समतल क्षेत्र, हर कहीं फूल-ही-फूल नजर आते हैं। विविध रंगों के फूलों को देखो, तो लगता है अस! यह प्रकृति कितनी बड़ी चित्रकार है। सच कहे तो हमारी प्रकृति किसी चमत्कारी कलाकार से कम नहीं है। बसन्त बानी नवोत्साह। हम उस चित्रकार को देख नहीं पाते लेकिन वह चित्रकार कमाल का है। पूरी धरती की तरह-तरह के सुंदर चित्रों से रंग देता है। हम सबके जीवन को भी। ठिठुरते शरीर को सुकून देने जैसे आ जाता है वसन्तः कुकने लगती है कोषस्त। गाने लगती है मधुर गीत। फूलों पर भंवो झूमने लगते हैं। रंग-बिरंगी तितलियाँ भी फूलों पर मंडराने लगती हैं। हम उन्हें सूने की कोशिश करते हैं लेकिन तितलियों कभी हाथ नहीं आती। मानी कहती हो, 'तुम हमें पकड़ोगे तो हम नष्ट हो जाएंगी। हमें उन्मुक्त होकर उड़ने दो!"

आते हैं। ऐसा लगता है, जैसे प्रकृति कोई सुंदर नारी है, जो अपने परिधान बदल कर नई हो रही है। प्रकृति तो हर पल सुंदर ही होती है। लेकिन वसन्त में उसकी सुंदरता इतनी अधिक बढ़ जाती है कि मन प्रफुल्लित हो उठता है। बार बार उसे ही देखने का मन करता है। तया-तरह के रंग, तरह तरह की आकार वाले फूल देखकर हम सबका मन भी फूल-जैसा कोमल हो जाता है। आम के वृक्षों को देखो तो मन झूम उठता है। उसमें बौर-ही-बौर दिखाई देते हैं। यही बाद में फल बनते हैं। मन सोचने लगता है कुछ दिनों के बाद इसमें बहुत फल लगेंगे और जब यह पकेंगे तो हम बड़े चाब से उसे खाएँगे। आम भी न जाने कितने प्रकार के। जिसको जो स्वाद जम जाए, वह खाए। वसन्त में खेतों को देखो, तो चारों ओर सरसों के फूल नजर आते हैं। लगत्ता है, धरती ने पीले वस्त्रों से अपना श्रृंगार कर लिया है। या फिर यह कहें कि सुंदर धरती माता ने पीली साड़ी पहन ली है। सारे अऋतु एक तरफ और बसन्त ऋतु एक तरफ। इसीलिए तो इसे अऋतुओं का राजा कहा गया है, यानी ऋतुराज। या कह सकते हैं मौसम का राजकुमार। भगवान कृष्ण भी ती कहते हैं अतुओं में मैं बसन्त ऋतु हैं। बसन्त की इससे बड़ी प्रशंसा दूसरी नहीं हो सकती। जिस अतु की खुद भगवान प्रशंसा कर रहे हो, उसकी बात ही निराली होगी। और हां, असंत पंचमी को मां सरस्वती का पूजन भी करते हैं। जयोंकि इसी दिन उनका जन्म हुआ था। मां सरस्वती विद्या की देवी है। इसलिए बसन्त पंचमी के दिन उनकी पूजा करनी ही चाहिए। किसी कवि ने माँ सरस्वती की पूजा करते हुए यह पंक्तियां कहीं

,जय जय जय हे मां सरस्वती

 तुमकी आज निहार रहे हैं 

अपने हाथ पसार रहे हैं।

ज्ञान मांगने के लिए हाथ पसारना पड़ता है। चित्र की देवी माँ सरस्वती सवको उदारता के साथ आशीर्वाद देती है। विद्या प्रेमी, संगीत प्रेमी सभी मां सरस्वती की उपासना करते हैं। दुनिया के किसी देश में माँ सरस्वती की पूजा नहीं होती लेकिन हमारा देश सांस्कृतिक राष्ट्र है। इसके अपने कुछ सनातन यानी प्राचीन मूल्य है, जिसके कारण ही यह उत्सवधर्मी है। धार्मिक है। इसीलिए माँ सरस्वती को वह ज्ञान की और कला की देवी मानकर उसकी पूजा-अर्चना और आराधना करता है।

अप्रैल के तक प्रकृति वासंती आनंद से भरी सहती है और इसी समय तो हम होली का आनंद भी लेते हैं, जिसे फाग कहते हैं। फाग का राग ऐसा होता है कि क्या जावे, क्या बूढ़े, सबको मगन कर देता है। नाच उठता है मन का मपूर। और कोई सिद्ध संगीतकार 'राग बसंत' छेड़ देता है। संगीत में अनेक राग होते हैं। उनमें एक राग बसन्त भी है। आखिर बसन्त का संदेश क्या है? यही कि हमें अपने जीवन को नित्य नवीन करना है। नया वर्ष भी शुरू होता है और हम नए-नए संकल्प करते हैं। आने वाले भविष्य को संवारने की कल्पना करते हैं। योजना बनाते है। बसन्त आते ही आकाश भी रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। कहीं-कहीं तो पतंग उत्सव भी आयोजित किए जाते हैं। पतंग का संग मिलते ही बसन्त जैसे चहकने लगता है। बच्चों में अति उत्साह दिखाई देता है। आकाश में तरह-तरह के आकर वाली पतरी उड़ती हैं। लोग आपस में पेंच लड़ाते हैं। एक दूसरे की लाल, पोली, हरी पतंगों को काटते है और आनंद में डूब जाते हैं। तब आकाश में उड़ते पंती यह देखकर चकित हो जाते हैं कि हमारे आकाश में, हमारी दुनिया में में कैसे विचित्र पंछी है, जो मंडरा सो है।

बसन्त एक ऐसा मौसम है, जिसे देखकर कचियों ने न जाने कितनी कविताएँ लिखी हैं। हर मौसम पर कविता लिखी जाती है, लेकिन बसन्त में में जो कविताएँ लिखी जाती है, वह अलग किस्म की होती हैं। हजारों कवियों ने दिल को छू लेने वाली कविताएँ लिखी है। महाकवि 'निराला' का नाम भाला किसने नहीं सुना। वे कुछ इस अंदाज में कविता लिखते है.

अभी न होगा मेरा अन्त।

अभी-अभी ही तो आया है,

मेरे जन में मुद्दल वसन्त 

अभी न होगा मेरा अन्त।

'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी जैसी महान कविता लिखने वाली सुभद्राकुमारी चौहान ने भी एक काचिता लिखी है,

वीरों का कैसा हो बसन्त।

आ रही हिमालय से पुकार

है  उदधि गरजता बार बार

 प्राची पश्चिम भू नभ अपार,

सब पूछ रहे हैं दिग-दिगन्त। 

वीरों का कैसा से बसन्त।

इन पंक्तियों के लेखक ने भी समय-समय पर बसन्त पर कुछ गीत लिखे हैं चार पंक्तियों में भी प्रस्तुत कर रहा हूँ

फिर आया मधुमास धरा यह 

कितनी प्रमुदित है। 

रंग-चिरंगी परियों जैसी

 तितली मैडराई।

भ्रमर करे गुनगुन लगता है,

जागी तरुणाई।

आया है अतुराज द्वार पर, कोयल हर्षित है।

कहने का मतलब यह है कि बसन्त ऋतु में न केवल प्रकृति नए कलेचा धारण कर लेती है, चरन कुछ कवियों के मन में भी नए-नए भाव उत्पन्न होते हैं। यह सब समझने वालों के लिए है। चरन्ना जो नौरस मन चाले हैं, उनके लिए क्या असन्त, क्या पताक्षर। सब एक समान। लेकिन जो जीवन में उत्साह से भरे राहते है, जो हर पल को अच्छे से जीने की कोशिश करते हैं, वे सभी चतुओं का आनंद लो लेते हैं, परंतु जब बसन्त ऋतु आती है,तो परमानंद से भर जाते है। बसन्त आते ही तन और मन में एक नया उत्साह पैदा होता है। सूर्य की तपिश कुछ कम हो जाती है। भले वह गर्मी में काफी तेज हो जाए लेकिन बसन्त ऋतु में सूर्य भी थोड़ा शांत रहता है। चारों ओर खिले हुए फूलों के कारण पूरी धरती महकती लगती है। इसे महसूस भी करना पड़ता है। बसन्त ऋतु को देखकर लगता है। है कि धरती अपने आप को नवीन कर रही है। जैसे हम लोग घर से बाहर कहीं जाने के लिए नए-नए परिधान धारण करते हैं, उसी तरह धरती भी बसन्त में नए परिधान पहन कर प्रसन्न हो जाती है।