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Ashutosh Rana on Narmada and Bundelkhand

सौभाग्य से होता है नर्मदांचल में जन्म : आशुतोष राणा

प्रख्यात अभिनेता आशुतोष राणा ने स्वदेश से बातचीत में बुंदेलखंड और नर्मदांचल की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक महिमा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नर्मदा लोकमंगल की धारा है।


सौभाग्य से होता है नर्मदांचल में जन्म  आशुतोष राणा

डॉ. अजय खेमरिया

प्रख्यात बॉलीवुड अभिनेता ने स्वदेश से बातचीत में बताया सांस्कृतिक भूमि का महात्म्य प्रख्यात सिने अभिनेता और आध्यात्मिक विषयों के जानकार आशुतोष राणा का बुंदेलखंड के प्रति प्रेम जगजाहिर है। उन्होंने बुंदेलखंड को समकालीन परिदृश्य में विशेष पहचान भी दिलाई है। भोपाल प्रवास के दौरान एक अनौपचारिक भेंट में उन्होंने ‘इत जमुना उत नर्मदा, इत चंबल उस टौंस, छत्रसाल से लड़न की रहू न काहू हौंस...’ का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की सांस्कृतिक धरती पर यदि किसी क्षेत्र ने वीरता, भक्ति, लोकसंवेदना और सौंदर्य को एक साथ साधा है, तो वह बुंदेलखंड है।

यह केवल भौगोलिक अंचल नहीं, भारतीय आत्मा का प्राचीन स्वर

उन्होंने कहा कि यह केवल एक भौगोलिक अंचल नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का वह प्राचीन स्वर है, जिसमें तलवार की चमक और मंदिरों की शिल्प-साधना एक साथ दिखाई देती है। बुंदेलखंड की संस्कृति का सबसे प्राणवान पक्ष उसका लोकजीवन है। यहां की मिट्टी में अद्भुत आत्मीयता है और यहां के लोग जीवन को उत्सव की तरह जीते हैं।अपने रोचक और काव्यात्मक अंदाज में किस्सागोई करते हुए राणा ने कहा कि मध्यप्रदेश दरअसल “मित्र प्रदेश” है, जहां आकर हर व्यक्ति स्वाभाविक रूप से आत्मीयता से भर जाता है। उनके अनुसार अन्य प्रदेशों में यह भाव सहज रूप से देखने को नहीं मिलता।

लोकमंगल के लिए होती है नर्मदा की कृपा

नर्मदा नदी का उल्लेख करते हुए आशुतोष राणा ने कहा कि नर्मदा हमें कुछ नहीं देती, बल्कि वह हमारे माध्यम से सबको सब कुछ देती है। यही कारण है कि नर्मदांचल के लोग इस क्षेत्र से बाहर निकलकर भी नक्षत्रों की तरह दैदीप्यमान होते हैं। वहीं जो बाहरी व्यक्ति नर्मदांचल में आता है, वह भी इस भूमि के प्रेम का होकर रह जाता है।उनके अनुसार नर्मदा की गोद से निकले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्वों का वैशिष्ट्य केवल व्यक्तिगत नहीं है। वे प्रतिष्ठा के शिखर पर इसलिए पहुंचे क्योंकि नर्मदा ने उन्हें केवल स्थानीयता या निजता के लिए नहीं, बल्कि लोकमंगल के लिए तैयार किया। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि महर्षि महेश योगी, ओशो, दादा जी धूनीवाले और दद्दाजी धूनीवाले जैसी विभूतियों की परंपरा आज भी निरंतर आगे बढ़ रही है।

नर्मदा परिक्रमा आध्यात्मिकता का अद्वितीय अनुष्ठान

भारतीय परंपरा में गंगा को मोक्षदायिनी और यमुना को प्रेम की धारा कहा गया है, लेकिन नर्मदा को “जीवंत तपस्विनी” का स्वरूप प्राप्त है। आशुतोष राणा ने बताया कि शिव पुत्री नर्मदा को अपने पिता भगवान शिव से तीन वरदान प्राप्त हुए थे। पहला नर्मदा के दर्शन मात्र से मोक्ष की प्राप्ति, दूसरा नर्मदा के कंकड़-कंकड़ को जागृत शिवलिंग के रूप में मान्यता, और तीसरा जिस साधक को अपने इष्ट की प्राप्ति नहीं हो रही हो, वह नर्मदा तट पर आकर अपने इष्ट को प्राप्त कर सकता है। उन्होंने कहा कि नर्मदा परिक्रमा भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक अद्वितीय अनुष्ठान है, जो नर्मदांचल के भावपूर्ण वातावरण को विशिष्ट और अलौकिक बना देता है।

 

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