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Asha Bhosle Tribute: Voice That Defined Generation

हम इंतजार करेंगे...

आशा भोसले के गीतों और योगदान को याद करते हुए एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि। उमराव जान से लेकर पॉप तक, उनकी आवाज ने संगीत को नई पहचान दी।


हम इंतजार करेंगे

शब्द सुमन-अतुल तारे

आशा जी, आपने अच्छा नहीं किया। आप आशा थीं, हम सबके बीच। लता मंगेशकर जी के बिछुड़ने का गम अभी हरा ही था।
उनका वह गीत रह-रह कर याद आता रहा शायद इस जन्म में मुलाकात हो न हो... भारतीय फिल्म संगीत में एक न भरने वाला वह शून्य खड़ा कर ही गई थीं। पर आशा जी थीं, एक आशा थी। आज वह भी टूट गई।

फिल्म उमराव जान 1981 में आई थी। निर्देशक थे मुजफ्फर अली। उनसे पूछा गया आपने इस फिल्म में, जहां शास्त्रीय गायन रहने ही वाला था, लता मंगेशकर जी को पार्श्व गायन के लिए क्यों नहीं लिया? मुजफ्फर अली ने कहा लता जी की तुलना लता जी से ही संभव है, पर मैं दूसरी पाकीजा नहीं बनाना चाहता था, इसलिए आशा जी को लिया। आशा जी और उमराव जान आज एक साथ याद किए जाते हैं।

'इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं' पर जब रेखा अभिनय करती हैं, तो दर्शक आशा भोसले की आवाज में आंखों से भी कहीं अधिक खो जाते हैं। आशा भोसले फिल्म संगीत का एक ऐसा अध्याय हैं, जो शायद अगले कई दशकों तक सामने आए, इसकी संभावना न्यूनतम है।

मैंने उमराव जान से अपनी बात इसलिए शुरू की, क्योंकि आशा जी के बारे में यह माना जाता रहा था कि वह 'इक तू है पिया जिस पे दिल आ गया' या 'रात बाकी, बात बाकी होना है जो हो जाने दो' जैसे गीतों के लिए अधिक उपयुक्त हैं। उनकी आवाज में मदहोशी है, तरन्नुम है, लहर है। इसलिए जब वह 'इक तू है' को लचक के साथ कहती हैं, तो रेखा के अभिनय में भी वही लचक दिखाई देती है। और जब परवीन बॉबी के लिए 'होना है जो हो जाने दो' गाती हैं, तब 'हो..ना' और 'जा..ने दो' के बीच एक ऐसी मीठी शरारत होती है, जो आशा जी ही कर सकती थीं।

कौन भूल सकता है और कब जंगली और कश्मीर की कली जैसी फिल्में फिर पर्दे पर होंगी! सायरा बानो हों या शर्मिला टैगोर, दोनों अपने समय की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्रियां रहीं। सायरा बानो के लिए 'एहसान तेरा होगा मुझ पर...' जब आशा जी ने स्वर दिए, तो आज भी सुनने पर आंखों में आंसू आ जाते हैं। वहीं जब शर्मिला टैगोर के लिए 'दीवाना हुआ बादल... सावन की घटा छाई...' गाती हैं, तो युवा मन ही नहीं, हर दिल झूम उठता है।

बेहद संघर्ष के साथ अपने प्रारंभिक जीवन को उन्होंने अपनी बड़ी बहन के साथ आगे बढ़ाया। मंगेशकर से वह भोसले बनीं, पर यह रिश्ता चल नहीं सका। संगीत उन्हें आर. डी. बर्मन (पंचम दा) के करीब लाया और लगा कि ये ‘सोलमेट’ हैं। पंचम दा के संगीत ने आशा भोसले के करियर को नई ऊंचाई दी।

पंचम दा ने चुलबुली आशा को पहचाना। वह समझ गए थे कि उनकी आशा एक अल्हड़ नदी की तरह है, जैसे नर्मदा गंगा की तरह ठहराव नहीं, बल्कि निरंतर बहती ऊर्जा। उनके कुछ प्रमुख सदाबहार गीतों में 'पिया तू अब तो आजा' (कारवां), 'दम मारो दम' (हरे रामा हरे कृष्णा), 'बाहों में चले आओ' (अनामिका) शामिल हैं, जिन्होंने उन्हें ऐसी ऊंचाई दी जहां हर तरफ उन्हीं के चर्चे रहे।

उन्होंने उम्र को कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। नई पीढ़ी के साथ रॉक और पॉप में भी अपनी मस्ती दिखाई। उनकी लहराती, इठलाती, मदमस्त आवाज में एक ठहराव भी है, एक मंद लय भी जिसे उन्होंने उमराव जान में सिद्ध कर दिया।

'जुस्तजू जिसकी थी, उसको तो न पाया'

यह गाना आज भी भरी भीड़ में किसी को भी तन्हा कर देता है।

मन उदास है। आंखें नम हैं। क्या दें शब्द सुमन, जब गला रूंधा हो और कलम कांप रही हो।

याद आ रहा है एक और गीत। आशा जी और आशा पारेख शायद एक-दूसरे के लिए ही बने थे। उन्हीं की फिल्म मेरे सनम का गीत-

'जाइए, आप कहां जाएंगे, ये नजर लौट के फिर आएगी...'

और अंत में
'हम इंतजार करेंगे... हम इंतजार करेंगे तेरा कयामत तक...
खुदा करे कि कयामत हो और तू आए...'

आपको आना होगा।

नमन।


 

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