प्रोफेसर रजनीश शुक्ल ने भगवान कृष्ण के जीवन दर्शन को विस्तार से समझाया, उन्हें पूर्णता का जीवंत रूप बताया और उनके विरोधाभासों को अद्वैत में विलीन होते हुए दर्शाया।
भारतीय संस्कृति में भगवान श्रीकृष्ण महज किसी धर्मग्रंथ की कहानी या इतिहास के पन्ने नहीं हैं, बल्कि वे उस परम चेतना का जीवंत रूप हैं, जो हर लिहाज से परिपूर्ण है। शास्त्रों में विभिन्न अवतारों को किसी विशेष परिस्थिति या उद्देश्य के लिए ईश्वर का 'अंश' माना गया है, पर श्रीकृष्ण के लिए स्पष्ट उद्घोष है एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयं। वे जीवन के किसी एक पक्ष तक सीमित न रहकर मानव चेतना के हर रंग और आयाम को अपने भीतर समेटे हुए साक्षात् परब्रह्म हैं।
अगर ऊपरी सतह से देखें, तो उनका जीवन विरोधाभासों से भरा दिखता है, लेकिन गहराई में उतरते ही ये सारे विरोधाभास एक गहरे अद्वैत में लीन हो जाते हैं। वे कभी युद्धभूमि छोड़कर 'रणछोड़' कहलाते हैं, तो कभी भीष्म पितामह जैसा महायोद्धा भी उन्हें दुनिया का सबसे श्रेष्ठ नीतिज्ञ और रक्षक स्वीकार करता है। वे गोपियों संग रास रचाते हैं, हजारों रानियों के स्वामी बनते हैं, फिर भी महर्षि वेदव्यास उन्हें पूर्ण अनासक्त 'योगेश्वर' मानते हैं। वे कभी किसी राजसिंहासन पर नहीं बैठे, लेकिन राजाओं के राजा भी राजसूय यज्ञ में सबसे पहले उन्हीं की पूजा करते हैं। कालयवन के समय उनका युद्धक्षेत्र छोड़ना कायरता नहीं, बल्कि जन-धन के न्यूनतम नुकसान में धर्म-स्थापना की एक सूक्ष्म रणनीति थी। जहाँ आम इंसान झूठी प्रतिष्ठा के अहंकार में विनाश चुन लेता है, वहीं कृष्ण लोक-कल्याण के लिए खुद पर 'रणछोड़' का लांछन भी हँसते-हँसते सह लेते हैं।
यही बात उनकी रासलीला और विवाहों पर भी लागू होती है। इसे सांसारिक दृष्टिकोण से देखना एक बड़ी भूल है। रासलीला दरअसल वासना का तुष्टीकरण नहीं, बल्कि काम का राम में रूपांतरण है—यह जीव और ब्रह्म का वह परम समागम है, जहाँ संकीर्ण सीमाएँ मिट जाती हैं। गोपियाँ कोई सामान्य स्त्रियाँ नहीं थीं; वे जन्मांतर की साधक आत्माएँ थीं, जो केवल ब्रह्म-स्पर्श की प्यास में थीं। इसी तरह, नरकासुर के बंदीगृह से छुड़ाई गई सोलह हजार नारियों से उनका विवाह भोग-लिप्सा नहीं था। जिस तत्कालीन समाज ने उन असहाय नारियों को शायद ठुकरा दिया होता, कृष्ण ने उन्हें अपनी पत्नी का दर्जा देकर वह सामाजिक सम्मान और गरिमा दी, जिसके वे योग्य थीं। इस विशाल गृहस्थी और सामर्थ्य के केंद्र में रहकर भी पूरी तरह अनासक्त रहना ही उनके योगेश्वर होने की पहचान है।
श्रीकृष्ण का एक अनोखा पहलू यह भी है कि उन्होंने कई साम्राज्य जीते, पर कभी किसी मुकुट की लालसा नहीं की। कंस का वध करके उग्रसेन को राजा बनाया, जरासंध को हराकर उसके बेटे सहदेव का राजतिलक किया और महाभारत के बाद पांडवों को सिंहासन सौंपा। वे खुद राजा नहीं बने, पर हर राजा के विवेक बने रहे। उनके जीवन का सबसे कठोर मोड़ तब आया, जब उनके सामने ही उनके अपने यदुवंश का विनाश हो गया। जब अपने ही लोग अहंकार और अधर्म की राह पर भटक गए, तो कृष्ण ने मोह में पड़कर उन्हें बचाने के लिए अपनी ईश्वरीय शक्तियों का प्रयोग नहीं किया। जो बिना किसी पक्षपात के धर्म की मर्यादा के लिए अपने ही कुल के संहार को निष्पक्ष भाव से देख सके, वही वास्तव में ईश्वर हो सकता है।
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जब अर्जुन हताश होकर अपने हथियार डाल देता है, तब कृष्ण उसे अनासक्त कर्म का अमर संदेश देते हैं कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। यह सिखाता है कि फल की चिंता किए बिना केवल अपने कर्तव्य-पथ पर अडिग रहो। जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी उससे अछूता रहता है, वैसे ही संसार के तमाम दायित्वों को निभाते हुए भीतर से निर्लिप्त रहना ही उनके जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा है। चाहे यशोदा का वात्सल्य हो, सुदामा के सूखे चावलों पर झलके अश्रु हों, द्रौपदी की लाज बचाना हो या अर्जुन का सारथी बनना कृष्ण हर रिश्ते को उसकी संपूर्णता में जीते हैं, लेकिन किसी मोह में बँधते नहीं। एक हाथ में सुदर्शन चक्र धारण करने की सामर्थ्य रखते हुए, दूसरे हाथ से बाँसुरी बजाकर जगत् को आनंदित करना ही उनके चरित्र की पूर्णता है। वे हमें दुखों से भागना नहीं, बल्कि हर संकट के बीच मुस्कुराते हुए जीवन जीने की कला सिखाते हैं।

प्रो. रजनीश शुक्ल
(लेखक दर्शनशास्त्री एवं आचार्य हैं)