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जुलाई में विवाह मुहूर्त समाप्त

अंतिम विवाह सीजन : 16 जुलाई से थम जाएगी शहनाइयों की गूंज

16 जुलाई से गुरु तारा अस्त होने के कारण विवाह समेत सभी मांगलिक कार्यों पर लंबा विराम लग जाएगा। अगले शुभ मुहूर्त नवंबर में होंगे।


अंतिम विवाह सीजन  16 जुलाई से थम जाएगी शहनाइयों की गूंज

गुरु तारा अस्त होते ही मांगलिक कार्यों पर लगेगा विराम

विवाह सीजन अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है। अगले कुछ दिनों में शादी-विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ सहित अन्य मांगलिक कार्यों के लिए केवल चार शुभ मुहूर्त शेष हैं। 12 जुलाई इस सीजन का अंतिम प्रमुख विवाह मुहूर्त माना जा रहा है। इसके बाद 16 जुलाई से गुरु तारा अस्त होने और फिर देवशयनी एकादशी के कारण मांगलिक कार्यों पर लंबा विराम लग जाएगा। अब शहनाइयों की गूंज सीधे देवउठनी एकादशी के बाद ही सुनाई देगी।

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस वर्ष दिसंबर के अंत तक विवाह के लिए केवल 12 शुभ मुहूर्त ही उपलब्ध हैं। ऐसे में जिन परिवारों ने अभी तक विवाह की तिथि तय नहीं की है, उन्हें अब नवंबर और दिसंबर के सीमित मुहूर्तों का इंतजार करना होगा। हालांकि, 22 जुलाई को भड़लिया नवमी का अबूझ मुहूर्त रहेगा। इस दिन बिना पंचांग देखे भी विवाह संपन्न कराने की परंपरा है। यही कारण है कि शहरों से लेकर गांवों तक इस दिन बड़ी संख्या में विवाह समारोह आयोजित किए जाएंगे।

जुलाई के बाद नवंबर-दिसंबर में मिलेंगे विवाह के शुभ मुहूर्त

जुलाई: 9 और 11
नवंबर: 21, 24, 25 और 26
दिसंबर: 2, 3, 11 और 12

25 जुलाई से शुरू होगा चातुर्मास, चार माह तक नहीं होंगे मांगलिक कार्य

धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवशयनी एकादशी (25 जुलाई) के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास का आरंभ हो जाता है और परंपरागत रूप से विवाह सहित सभी मांगलिक कार्य स्थगित कर दिए जाते हैं। इस अवधि में केवल जप, तप, व्रत, दान, सत्संग, कथा-श्रवण और भगवान की आराधना का विशेष महत्व माना गया है। चार माह बाद देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागेंगे। इसी दिन तुलसी-शालिग्राम विवाह के साथ मांगलिक कार्यों का नया शुभारंभ होगा और विवाह सीजन फिर से शुरू हो जाएगा।

16 जुलाई से 9 अगस्त तक गुरु तारा रहेगा अस्त

आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया, 16 जुलाई को देवगुरु बृहस्पति (गुरु तारा) पश्चिम दिशा में अस्त होंगे और 9 अगस्त को पुनः उदित होंगे। ज्योतिष शास्त्र में गुरु को विवाह, संस्कार और अन्य मांगलिक कार्यों का प्रमुख कारक माना गया है। इसलिए गुरु के अस्त होने की अवधि में विवाह जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते। शास्त्रों के अनुसार, गुरु के अस्त होने से तीन दिन पहले का वृद्धत्व काल और उदय होने के तीन दिन बाद तक का बाल्यकाल भी शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है।

श्राद्ध पक्ष 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक

भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक का समय पितरों को समर्पित होता है। इस दौरान कोई भी नया या मांगलिक कार्य करना शास्त्रों में वर्जित माना गया है। श्राद्ध पक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक रहेगा।

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