हनुमान का सत्य :-
हनुमान जी ज्येष्ठ मास के प्रथम मंगलवार के दिन जब श्रीराम से मिले और उन्हें पहचाना तो उन्होंन श्रीराम से उलाहने भरे शिकायती लहजे में कहा-
एकु मंद मैं मोहबस कुटिल हृदय अज्ञान।
पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबन्धु भगवान ।।
एक तो मैं यों ही मंद हूँ दूसरे मोह के वश में हूँ, तीसरे हृदय का कुटिल और अज्ञान हूँ फिर भी है दीनबन्धु दयालू भगवान प्रभु! (आप) ने मुझे भुला दिया। हनुमान जी की इन बातों से स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि श्रीराम एवं हनुमान जी का कोई पुराना परिचय अवश्य रहा होगा। अपनी बात कहते-कहते हनुमानजी भाव विभोर हो गये -
अस कहि परेउ चरन अकुलाई।
निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई ।।
प्रभु कर पंकज कपि के सीसा।
सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा ।।
अकुलाहट में हृदय का प्रेम बाहर छलक पड़ा और हनुमान जी ने श्रीराम के कमलवत चरणों पर अपना शीश रख दिया । इस दृश्य को देख कर शंकर जी प्रसन्न हो कर मन्त्रमुग्ध हो गये। प्रसन्न श्री राम को होना था, आकाश मंडल में विद्यमान ऋषियों को होना था परंतु अन्तर्दृष्टि से यह दृश्य देखने वाले शंकर जी प्रसन्न हो रहे थे। इस प्रसन्नता के रहस्य को उद्घाटित करते हुए तुलसी जी ने अपनी कृति दोहावली में लिखा है-
रुद्रदेह तज नेह बस बानर भे हनुमान
श्रीराम के प्रेम में ही भगवान शंकर रूद्र का शरीर छोड़कर बन्दर रूपी हनुमान हुए हैं। अत: हनुमान के रामप्रेम एवं भक्ति की भाव विह्वलता को देखकर उसी अनुभूति को स्वयं मे अनुभव कर के शंकर जी का मग्न होना स्वाभाविक है। इस रहस्य को समझाते हुए याज्ञवल्क्य ऋषि ने भरद्वाज ऋषि को बताते हैं कि - ॐ परम ब्रह्म हैं उकार द्वितीय अक्षर विष्णु है एवं मकार तृतीय अक्षर शिव हनुमान है।
ओमति ब्रह्म भवतिनकारो विष्णु भरति मिकारोरुद्रो भवति
- तारसारोपनिषद
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि ॐ परमात्मा नारायण ही रुद्रवतार हनुमान हैं। यही हनुमान का सत्य है।
भगवान श्रीराम ने हनुमान जी को अपना परिचय "कौसलेस दसरथ के जाये" कह कर दिया और हनुमान जी का परिचय - "कहहु विप्र निज कथा बुझाई" कह कर पूछा। हनुमान का परिचय सुन कर राम आश्चर्य चकित हो गये। हनुमान ने अपना परिचय जन्मदात्रि माँ और पिता के नाम के साथ अपने को जोड़ कर नहीं दिया बल्कि अपने को प्रभु श्रीराम से जोड़ दिया -
देहदृष्टया तु दासोऽहं जीवदृष्ट्या त्वदंशक:
वस्तुतस्तु त्वमेवाहमिति में निश्चिता मतिः
देह दृष्टि से मैं (राम का) दास हूँ, और जीव दृष्टि से आपका अंश हूँ तथा परमार्थ दृष्टि से जो आप हैं वहीं मैं हूँ, ऐसी मेरी निश्चित धारणा है। हनुमान जानते थे कि मैं ईश्वर का ही अंश हूँ अतः ईश्वर के समान ही मुझे भी परमार्थी रहना होगा। राम कार्य के लिए ही राम के साथ हनुमान का जन्म हुआ था। इस तत्थ्य का आभास कराते हुए ऋक्षराज जाम्बवान् ने हनुमान से कहा था-
"रामकाज लगि तव अवतारा"
न केवल हनुमान अपितु जितने भी वानर थे वे सभी राम की सेवा और रामकाज करने के लिए सृष्टि से या देवांश से उत्पन्न हुए थे, महर्षि वाल्मीकि ऐसा ही मानते हैं -
एतेच ऋक्षाः सह वानरेन्द्रस्त्वत् कारणाद राम सुरौहि सृष्टा:
- वा.रा.7/36/50
हनुमान के साथ-साथ पूरी वानर सेना भी देवांश थी। राम का अंश होकर भी हनुमान को अपने हाड़-मांस के शरीर के अंग सीने को फाड़कर राम-लक्ष्मण को सीता के साथ दिखाने की क्या आवश्यकता थी? लगता है कि उनमें देह- दृष्टि वाला *दास रूप* प्रबल था अतः वे बार-बार अपने को दास एवं सेवक हनुमान ही सिद्ध करते रहे जो कि उनका अपना व्यक्गित सत्य था। सीता जी को अपना परिचय हनुमान ने राम को दिये परिचय की तरह नहीं दिया बल्कि यह कहा कि -
"राम दूत में मातु जानकी"
यह भी एक सत्य था ।
क्रमशः शेष अगले अंक में

मायापति मिश्र बौद्धिक प्रमुख मध्य भारत, अखिल भारतीय इतिहास संकलन समिति