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Bhopal Union Carbide Waste Disposal Update

भोपाल गैस त्रासदी: यूका परिसर का 899 टन जहरीला कचरा खाक, अब हाईकोर्ट ने मांगा मास्टर प्लान

भोपाल यूनियन कार्बाइड परिसर से 899 टन जहरीले कचरे का निपटान पूरा। हाईकोर्ट ने दूसरे चरण के लिए सरकार से विस्तृत मास्टर प्लान मांगा।


भोपाल गैस त्रासदी यूका परिसर का 899 टन जहरीला कचरा खाक अब हाईकोर्ट ने मांगा मास्टर प्लान

भोपाल गैस त्रासदी के घाव आज भी शहर की स्मृति में ताजा हैं। ऐसे में दशकों से पड़े जहरीले कचरे के निपटान को लेकर आई ताजा रिपोर्ट ने एक महत्वपूर्ण पड़ाव पार किया है। भोपाल स्थित Union Carbide Corporation (यूका) फैक्ट्री परिसर से जुड़े 899 टन से अधिक कचरे के विनष्टीकरण का पहला चरण पूरा हो चुका है। अब निगाहें दूसरे चरण पर टिक गई हैं।

हाईकोर्ट ने पूछा आगे की क्या योजना?

Madhya Pradesh High Court की जबलपुर खंडपीठ में न्यायाधीश विवेक कुमार सिंह और न्यायाधीश अजय कुमार निरंकारी की युगलपीठ ने राज्य सरकार से साफ पूछा है यूनियन कार्बाइड परिसर के पुराने प्लांट और शेष ढांचे को लेकर सरकार का मास्टर प्लान क्या है? सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अदालत में रिपोर्ट पेश कर बताया कि पीथमपुर में कुल 899.08 मीट्रिक टन जहरीले कचरे का पर्यावरणीय मानकों के तहत चरणबद्ध तरीके से विनष्टीकरण किया गया। यह प्रक्रिया अदालत के 3 दिसंबर 2024 और 10 दिसंबर 2025 के निर्देशों के अनुरूप पूरी की गई। अगली सुनवाई 13 मार्च को तय की गई है।

दूसरे चरण के लिए एक्शन प्लान मांगा

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागरथ ने दलील दी कि पहला चरण पूरा हो चुका है, लेकिन असली चुनौती अब शुरू होती है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह विस्तृत एक्शन प्लान पेश करे जिसमें बताया जाए कि शेष संरचनाओं, पुराने प्लांट और परिसर की सफाई का काम कैसे और कब तक पूरा किया जाएगा।

1984 की वह काली रात

2-3 दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात को इसी फैक्ट्री से जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 3,828 लोगों की तत्काल मौत हुई, जबकि हजारों लोग गंभीर रूप से प्रभावित हुए। लगभग 10,000 लोग स्थायी विकलांगता का शिकार बने। इस त्रासदी ने भोपाल को विश्व मानचित्र पर एक भयावह उदाहरण के रूप में दर्ज कर दिया। गैस कांड के बाद भी फैक्ट्री परिसर में पड़ा जहरीला कचरा भूजल और पर्यावरण के लिए लंबे समय तक खतरा बना रहा।

मामला कैसे शुरू हुआ?

यह प्रकरण 2004 में दायर एक जनहित याचिका से शुरू हुआ था। बाद में 2012 में सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित मामलों को उच्च न्यायालय को सौंप दिया, ताकि नियमित मॉनिटरिंग हो सके। सोमवार की सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत सिंह रूपराह और उप महाधिवक्ता स्वप्निल गांगुली उपस्थित रहे।

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