Breaking News
  • स्वदेश के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जुड़ें और हर बड़ी खबर सबसे पहले पाएं।
  • YouTube: @SwadeshNews, Facebook: @DainikSwadesh, Instagram: @swadesh_news1, X: @DainikSwadesh

होम > प्रदेश > उत्तर प्रदेश

Hardois Iimli Road

Hardois Iimli Road: मैं हरदोई की इमली रोड हूं...उजड़ी छांव, खोया सरकारी हिसाब, अब जागी उम्मीद

मैं इमली रोड हूं ...आज आप मुझे सर्कुलर रोड कह लीजिए, संजय गांधी मार्ग कह लीजिए, मेरे किनारे दुकानें सजा लीजिए, वाहनों की भीड़ बढ़ा दीजिए...


hardois iimli road मैं हरदोई की इमली रोड हूंउजड़ी छांव खोया सरकारी हिसाब अब जागी उम्मीद

Hardois Iimli Road: मैं हरदोई की इमली रोड हूं...उजड़ी छांव, खोया सरकारी हिसाब, अब जागी उम्मीद |

बृजेश कबीर, हरदोई: मैं इमली रोड हूं ...आज आप मुझे सर्कुलर रोड कह लीजिए, संजय गांधी मार्ग कह लीजिए, मेरे किनारे दुकानें सजा लीजिए, वाहनों की भीड़ बढ़ा दीजिए, फुटपाथ को कारोबार की जगह बना दीजिए ...मगर शहर के बुजुर्गों, मिलेनियल्स (जेन वाई), एक हद तक जेन ज़ी से पूछिएगा, वे आज भी मुझे इमली रोड ही कहेंगे ...क्योंकि मेरा नाम किसी सरकारी फाइल ने नहीं रखा था, मुझे मेरा नाम मेरी छांव ने दिया था।

एक समय रेलवे स्टेशन से सांडी चुंगी तक मेरी दोनों पटरियों के किनारे इमली के विशाल वृक्षों की कतार खड़ी रहती थी। इतनी कि राहगीर मेरी छांव में कुछ पल ठहर जाते थे। धूप मेरे ऊपर से गुजरती थी, नीचे तक पहुंचने में उसे भी पेड़ों से इजाजत लेनी पड़ती थी। मेरी पहचान मेरे नाम में नहीं, मेरे किनारों पर खड़े उन पेड़ों में थी ...फिर शहर आकार लेने लगा, सड़क वही रही, लेकिन किनारे बदलते गए, पेड़ सूखते गए, आंधी-तूफानों की भेंट चढ़े, कुछ समय के साथ खत्म हो गए, कितने ही वृक्षों का दोहन हुआ।

जिनके नीचे पीढ़ियां चली थीं, वे पेड़ चले गए, दुकानें बचीं, प्रतिष्ठान बढ़े, यातायात बढ़ा और मेरे हिस्से की हरियाली घटती चली गई, सदी की शुरुआत तक मेरे दोनों किनारों की वह विशाल इमली कतार लगभग इतिहास बन चुकी थी, मेरी स्मृति में दो पेड़ अब भी खड़े हैं, रेलवे स्टेशन से लखनऊ चुंगी के बीच सांसद जय प्रकाश के आवास वाले मोड़ पर एक और दूसरा खास बिलग्राम चुंगी पर, वे मेरे बीते वैभव के दो जीवित साक्षी हैं।

मैंने शहर को बदलते देखा है, बैलगाड़ियों को गुजरते देखा है, रिक्शे आते देखे हैं, फिर मोटरें आईं, बाजार फैले और वाहनों की आवाजाही बढ़ती गई। मैंने लोगों को मेरे नाम से रास्ता बताते सुना- इमली रोड से चले जाइए ...मगर कभी किसी ने यह नहीं पूछा, जिस सड़क को इमली ने नाम दिया, उस सड़क पर इमली बची कितनी है? शहर अपनी जरूरतों में इतना व्यस्त था, उसे मेरी उदासी दिखाई नहीं दी, मैं व्यापार से आबाद होती गई, लेकिन विरासत उजड़ती गई।

फिर किसी ने मेरी सुध ली, 15 अगस्त 2018 को नेकी की दीवार संस्था ने मेरी पुरानी पहचान को फिर सांस देने की कोशिश की, रेलवेगंज से सांडी चुंगी तक 211 इमली के पौधे रोपे गए, ट्री गार्ड लगाए गए, सपना बहुत बड़ा नहीं था, बस इतना था, एक दिन मैं फिर इमली रोड जैसी दिखाई दूं ...नेकी की दीवार और मुझे लगा था, शहर खुश होगा, लेकिन पौधे बड़े होने से पहले ही कई जगह मेरी उम्मीद छोटी पड़ गई और नेकी की दीवार की नेक मंशा धराशाई हो गई, जिन प्रतिष्ठानों के सामने पौधे लगाए गए थे, वहां कुछ पौधों के अस्तित्व को लेकर ही असहमति पैदा हो गई, पौधों की जड़ों में चूने का पानी डालकर नष्ट कर दिया गया, वजह भी बहुत बड़ी नहीं रही, बस इतनी कि पौधे बड़े होंगे तो फुटपाथ घिरेगा, कारोबार की जगह कम होगी, आवाजाही प्रभावित होगी।

मैं सोचती रही, क्या शहर की सड़क पर फुटपाथ इतना बड़ा हो गया, एक पेड़ के लिए जगह छोटी पड़ गई? नेकी की दीवार की वह कोशिश टिक नहीं सकी, मेरी आंखों के सामने फिर छोटे-छोटे पौधे सूखते गए, मैं फिर वही हो गई- व्यस्त, भीड़ भरी और पेड़ों से खाली, अब फिर किसी ने मेरा नाम पुकारा है, इस बार जिलाधीश अनुनय झा की पहल पर मेरी पुरानी पहचान लौटाने की कोशिश शुरू हुई है, रेलवेगंज से सांडी चुंगी तक एवेन्यू पौधरोपण अभियान से दोनों ओर 102 इमली के पांच से छह फीट ऊंचाई के स्वस्थ पौधे रोपे गए हैं, सामाजिक वानिकी वन एवं वन्यजीव प्रभाग ने वन जमा योजना अंतर्गत यह कार्य कराया है, पौधों की सुरक्षा के लिए आयरन गार्ड लगाए गए हैं और सिंचाई तथा देखरेख के लिए सुरक्षा श्रमिकों की व्यवस्था की गई है।

मैंने जब इन पौधों को अपने किनारे खड़े देखा तो बरसों बाद मुझे लगा, शायद कोई मेरी पुरानी तस्वीर याद रखता है, शायद किसी ने शहर के नक्शे से ज्यादा उसकी स्मृतियों को पढ़ा है, मगर पौधे लगाना ही काफी नहीं, मुझे इस बार सिर्फ पौधे नहीं चाहिए, मुझे समझ चाहिए, मुझे उन लोगों की जरूरत है जो यह समझें, सड़क केवल डामर और सीमेंट की पट्टी नहीं होती, उसके किनारे खड़े पेड़ भी उसकी पहचान होते हैं, फुटपाथ केवल दुकानों तक पहुंचने का रास्ता नहीं होता, वह शहर की अगली पीढ़ी के लिए सांस लेने की जगह भी होता है।

आज मेरे किनारे लगाए गए 102 पौधे छोटे हैं, कल ये बड़े होंगे, कल जड़ें जमीन पकड़ेंगी, इनके तने मजबूत होंगे, शाखाएं फैलेंगी, छांव बनेगी, शायद किसी राहगीर को दोपहर की धूप में वही राहत मिलेगी, जो कभी मेरे पुराने इमली वृक्ष दिया करते थे, लेकिन यह तभी होगा, जब मेरे किनारे खड़े प्रतिष्ठान इन पौधों को अपने सामने खड़ी बाधा नहीं, शहर की साझा विरासत मानेंगे, मैं किसी दुकान के खिलाफ नहीं हूं, मैंने व्यापार बढ़ते देखा है, मेरी वजह से बाजार भी आबाद हुआ है, रोजी-रोटी कमाने वाले अनगिनत कदम मेरे ऊपर पड़े हैं, मुझे व्यापार से शिकायत नहीं, शिकायत तब होती है जब व्यापार की जगह बनाने के लिए विरासत की जगह मिटा दी जाती है, एक पेड़ के लिए कुछ फीट जगह बचाना क्या इतना कठिन है? अगर फुटपाथ कुछ संकरा पड़ता है तो क्या उसकी भरपाई एक ऐसी छांव नहीं करेगी, जो आने वाले दशकों तक शहर को मिलेगी? ...और अगर आज लगाया गया एक पौधा केवल इसलिए नष्ट कर दिया जाए कि वह कल बड़ा होकर जगह घेरेगा, तो फिर आने वाली पीढ़ियों के लिए हम क्या छोड़ेंगे- सिर्फ चौड़ी सड़कें या थोड़ी-सी छांव भी?

मैं इमली रोड हूं, मेरे पास अपने पुराने पेड़ों की गिनती नहीं बची, मेरे पास यह बताने वाला कोई दस्तावेज भी नहीं कि कभी मेरे दोनों किनारों पर कितने विशाल इमली वृक्ष खड़े थे, लेकिन मेरे पास यादें हैं, दो पेड़ अब भी हैं, और अब मेरे किनारों पर 102 नए पौधे खड़े हैं, वे अभी मेरे अतीत और भविष्य के बीच खड़े छोटे-छोटे प्रश्न हैं, मैं चाहती हूं कि इस बार उनका जवाब शहर दे, नेकी की दीवार ने मुझे फिर से खोई पहचान देने का सपना देखा था, पर पौधे बच नहीं सके, अब प्रशासन ने उसी ख्वाब में नए सिरे से रंग भरे हैं, अब बारी उन प्रतिष्ठानों की है, जिनके सामने ये पौधे खड़े हैं, वे तय करेंगे कि मेरी अगली कहानी कैसी होगी, क्या मैं फिर कभी अपनी छांव पर गर्व कर पाऊंगी? या फिर मेरे किनारे कारोबार तो बढ़ता रहेगा, मगर मेरी पहचान केवल पुराने लोगों की जुबान में बची रहेगी?

मैं सड़क हूं, चलती रहती हूं, लोग मेरे ऊपर से गुजरते रहते हैं, मगर मेरी अपनी जिंदगी कहीं ठहर गई है, मैं इंतजार कर रही हूं- उस दिन का, जब कोई राहगीर फिर कहेगा, इमली रोड आ गई, और इस बार वह नाम केवल स्मृति नहीं, मेरी आंखों के सामने खड़ी हकीकत होगा, ऐसी उम्मीद बूढ़े बाबा महाराज मन्दिर प्रबंधन से जुड़े जीतेश दीक्षित 'जीतू’ ने जगाई है, उन्होंने बिलग्राम चुंगी से साड़ी चुंगी के मध्य नारायण धाम के सामने सड़क के दोनों ओर रोपे गए एक-एक पौधे की सुरक्षा और संरक्षा का दायित्व लिया है, इस संकल्प से कि इनके फल वे जेन अल्फा को ज़रूर चखाएंगे, एक ग़ज़ल की दो लाइनों से विदा लूंगी...

तिरे होंटों में सजती थी तिरे साजन के हाथों से,
कभी इमली कभी जामन ये बारिश ने कहा मुझ से...

रोड रजिस्टर तिरोहित: पेड़ कट गए, यह त्रासदी, पर दस्तावेजी हिसाब भी गायब

मेरे पास आज कोई हिसाब नहीं है, कितने इमली के वृक्ष मेरे दोनों किनारों पर खड़े थे, जवाब शायद कभी मेरे रोड रजिस्टर में दर्ज रहा होगा, वन विभाग की पुरानी व्यवस्था में सड़क और मार्ग के किनारे खड़े वृक्षों की गणना और उनका विवरण दर्ज रखने की परंपरा थी, यानी मैं केवल चलने-फिरने का रास्ता नहीं थी, मेरे किनारे खड़ा हर पेड़ भी सरकारी अभिलेख में अपनी पहचान रखता था, मगर आज वह रजिस्टर कहां है, उसमें दर्ज पेड़ों का आंकड़ा कहां गया और इतनी महत्वपूर्ण अभिलेखीय व्यवस्था कब और कैसे खत्म हुई- यह सवाल अब मेरी तरह ही अनुत्तरित है।

1974-75 में उत्तर प्रदेश वन निगम का गठन हुआ, सरकार ने वृक्षों के हटाने, निस्तारण और वन संसाधनों के विदोहन की जिम्मेदारी निगम को दी, बाद के सरकारी अभिलेखों में सड़क किनारे के वृक्षों को अलग श्रेणी मानकर उनके लिए फेलिंग साइकिल तय करने और बड़ी संख्या में ऐसे वृक्षों का विदोहन वन निगम के माध्यम से करने का प्रमाण मिलता है, यानी मेरे किनारों के पेड़ सरकारी नजर से ओझल नहीं हुए थे, उनका दोहन और प्रबंधन एक नई व्यवस्था में चला गया था, मगर सवाल आज भी वहीं है- पेड़ों के बदलते जिम्मेदार के साथ क्या उनका पुराना हिसाब भी खो जाना जरूरी था? कभी सड़क किनारे खड़े हर वृक्ष की गिनती दर्ज होती थी, तो आज मेरी पुरानी इमली कतार की संख्या का कोई प्रमाण क्यों नहीं मिलता? इनका हिसाब किस मोड़ पर छूट गया, इसका जवाब शायद किसी पुराने वन अभिलेख में अब भी दबा हो।

Related to this topic: