सतना आज सावन माह का पहला सोमवार है इस दौरान जिले में सुप्रसिद्ध गैवीनाथ मंदिर आस्था का केंद्र बना हुआ है।
Sawan Somvar 2026: महाकाल मंदिर उज्जैन से जुड़ा है बिरसिंहपुर के गैवीनाथ धाम का रास्ता |
अमन शुक्ला, सतना: सतना आज सावन माह का पहला सोमवार है इस दौरान जिले में सुप्रसिद्ध गैवीनाथ मंदिर आस्था का केंद्र बना हुआ है। त्रेतायुग में यहां राजा वीर सिंह का राज्य हुआ करता था। तब बिरसिंहपुर नगर का नाम देवपुर था। यहां के राजा वीर सिंह अनंत शिवभक्त थे। वे प्रतिदिन अपने चेतक नाम के घोड़े पर सवार होकर भगवान महाकाल को जल चढ़ाने उज्जैन जाते थे।
कहते हैं कि ये सिलसिला 650 वर्षों तक अनवरत चलता रहा। कुछ वर्षों बाद राजा वीर सिंह वृद्ध हो गए और उज्जैन जाने में परेशानी होने लगी। तब राजा ने महाकाल के दर्शन उपरांत उज्जैन आने में असमर्थता जताई। तब भगवान महाकाल देवपुर में स्थित गैवी यादव के घर में चूल्हे से निकलने का स्वप्न दिया। लेकिन गैवी की मां चूल्हे से निकले पत्थर को मूसल से ठोककर अंदर कर देती। यह सिलसिला लगभग तीन माह तक चला और अंत में भगवान महाकाल ने राजा वीर सिंह को स्वप्न में अपने दर्शन देने की बात का जिक्र किया।
गैवी यादव के घर की बात कही और कहा की मैं तुम्हारी सेवा और निष्ठा से बहुत प्रशन्न हूं। मैं तुम्हे देवपुर में ही दर्शन दूंगा लेकिन तुम्हारे नगर में स्थित गैवी यादव और उसकी मां मुझे निकलने नहीं दे रही है। ऐसे स्वप्न को देखकर राजा ने सुबह गैवी यादव और उसकी मां को राज दरबार बुलाकर चूल्हे से निकलने वाली पत्थर की घटना का जिक्र किया। जिसे दोनों ने स्वीकार किया और कहा राजन यह क्रम पिछले तीन माह से चल रहा है। राजा ने वह जगह खाली कराकर भव्य मंदिर का निर्माण कराया। जहां साढ़े तीन फिट का शिवलिंग निकला और महाकाल के कहने पर ही भोलेनाथ का नाम पड़ा गैवीनाथ और तब से ही गैवीनाथ के नाम से जाना जाने लगा।
उज्जैन न जा पाएं तो पहुंचे बिरसिंहपुर
बिरसिंहपुर के शिवलिंग की स्थानीय स्तर पर पहचान महाकाल के उपलिंग के रूप में होती है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति महाकाल के दर्शन करने नहीं जा सकता। वह बिरसिंहपुर के गैवीनाथ का दर्शनकर कर पुण्य लाभ ले सकता है। इसका वर्णन पदम् पुराण के पातालखंड में भी वर्णित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां चारों धाम से लौटने वाले भक्त भगवान गैवीनाथ के घर पर पहुंचकर जल चढ़ाते है। पूर्वज बताते है कि चारों धाम की यात्रा करने के पश्चात जो भक्त गैवीनाथ को जल नहीं चढ़ाते तो उनकी यात्रा अधूरी मानी जाती है।
ऐसी है किंवदंती
बताया कि ऐसा किवदंती है कि "यह स्वयंभू स्थापित शिवलिंग है। जिसे मुगल शासक औरंगजेब ने सोना पाने के लालच में इस शिवलिंग को खंडित करने का प्रयास किया था। जिसमें उसने टाकी मारी थी, उसने पहली टाकी मारी तो उसमें से दूध निकला. दूसरी टाकी में खून, तीसरी टाकी में मवाद, चौथी टाकी में फूल बेलपत्र आदि और पांचवी टाकी में जीवजंतु भंवर निकली। जिसके बाद औरंगजेब को वहां से शिवलिंग को छोड़कर भागना पड़ा था। फिर औरंगजेब को भगवान भोलेनाथ से उन्हें छमा याचना मांगनी पड़ी, तब से लेकर यहां खंडित शिवलिंग की पूजा की।