छत्तीसगढ़ के पद्मश्री अनूप रंजन पांडेय को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संगीत नाटक अकादमी सम्मान दिया। उन्होंने पुरस्कार प्रदेश के लोक और आदिवासी कलाकारों को समर्पित किया।
रायपुर। छत्तीसगढ़ के संस्कृतिकर्मी अनूप रंजन पांडेय को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। नई दिल्ली में हुए समारोह में उन्हें लोक और जनजातीय कला के संरक्षण में योगदान के लिए यह सम्मान मिला। पांडेय ने पुरस्कार को छत्तीसगढ़ के आदिवासी कलाकारों और प्रदेश की जनता को समर्पित किया।
चार दशक की साधना को मिला राष्ट्रीय सम्मान
अनूप रंजन पांडेय का जन्म 21 जुलाई 1965 को बिलासपुर में हुआ। जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम कोसा से उनका जुड़ाव रहा है। संगीत और संस्कृति की शुरुआती सीख उन्हें अपनी मां और भजन गायिका स्वर्गीय मनोरमा पांडेय तथा पिता और संस्कृत विद्वान स्वर्गीय राधेश्याम पांडेय से मिली। नौ साल की उम्र में उन्होंने रेलवे स्कूल बिलासपुर के मंच से पहली प्रस्तुति दी। 1990 के दशक में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन से जुड़े और गांव-गांव जाकर नुक्कड़ नाटकों के जरिए साक्षरता, महिला सशक्तीकरण, पर्यावरण और जनस्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर जागरूकता अभियान चलाया। इस दौरान उन्होंने 3000 से ज्यादा नुक्कड़ नाटकों में काम किया।
हबीब तनवीर के नया थिएटर के साथ किया काम
पांडेय ने पद्मभूषण हबीब तनवीर के नया थिएटर के साथ भी काम किया। उन्होंने ‘चरणदास चोर’, ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘आगरा बाजार’, ‘मुद्राराक्षस’, ‘सड़क’ और ‘राजरक्त’ समेत कई चर्चित नाटकों में अभिनय किया। इन प्रस्तुतियों के जरिए भारत के साथ इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और जर्मनी में भी कला का प्रदर्शन किया।
2500 लोकगीत और 175 लोकवाद्यों का संकलन
लोक रंगमंच के साथ पांडेय ने छत्तीसगढ़ की मौखिक और वाचिक परंपराओं के संरक्षण पर भी काम किया। उन्होंने करीब 2500 लोकगीत, लोकगाथाओं और लोकवार्ताओं, 150 नाचा नकल-प्रहसनों और 175 लोकवाद्यों का संकलन किया।
‘बंदूक छोड़ो, ढोल पकड़ो’ से बस्तर में शांति का संदेश
बस्तर के आदिवासी कलाकारों के साथ मिलकर उन्होंने ‘बस्तर बैंड’ की स्थापना की। इसके जरिए दुर्लभ लोकवाद्यों और पारंपरिक संगीत को मंच दिया गया। ‘बंदूक छोड़ो, ढोल पकड़ो’ अभियान के तहत 100 से ज्यादा कला मंडलियों को फिर सक्रिय किया गया और 5000 से अधिक कलाकारों को जोड़ा गया। बैंड ने रूस, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका और इटली समेत कई देशों में बस्तर की लोक संस्कृति प्रस्तुत की।
पद्मश्री समेत कई सम्मान मिल चुके
अनूप रंजन पांडेय को 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा दाऊ मंदराजी लोक कला सम्मान, वरिष्ठ अध्येतावृत्ति सम्मान, टैगोर नेशनल स्कॉलरशिप और राष्ट्रीय स्वयं सिद्धश्री सम्मान भी मिल चुके हैं। उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से लोक कला में पीएचडी की है। वर्तमान में वह चिन्हारी रंगमंडल के निर्देशक और बस्तर बैंड के संचालक हैं।
राष्ट्रपति मुर्मु ने समारोह में लोक और जनजातीय कलाओं के संरक्षण की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बदलते समय में कई लोककलाएं विलुप्त होने के खतरे में हैं। ऐसे में उनका दस्तावेजीकरण करने के साथ उन्हें जीवित परंपरा के रूप में आगे बढ़ाना जरूरी है।