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Cat22: मध्य प्रदेश में 'Cat-22' संकट: 8 महीने में 50 इंसान और 45 बाघों की मौत, जानिए क्या है वजह

मध्य प्रदेश में वन्यजीव संरक्षण की सफलता के बीच इंसान और जानवर दोनों की सुरक्षा चुनौती बन रही है। 2026 के शुरूआती 8 महीनों में जंगली जानवरों के हमलों में 50 लोगों की मौत हुई है।


cat22 मध्य प्रदेश में cat-22 संकट 8 महीने में 50 इंसान और 45 बाघों की मौत जानिए क्या है वजह

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भोपाल। मध्य प्रदेश में बाघों की बढ़ती संख्या वन्यजीव संरक्षण के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। लेकिन इसी सपलता केसाथ जंगल और इंसानी बस्तियों के बीच टकराव भी बढ़ रहा है। 2026 के शुरुआती आठ महीनों के आंकड़े इस तनाव की गंभीर तस्वीर सामने रखते हैं। इस अवधि में जंगली जानवरों के हमलों में 50 लोगों की जान गई है। दूसरी तरफ 45 से ज्यादा बाघों की भी मौत दर्ज की गई है। इंसानों और बाघों की मौत का यह साथ-साथ बढ़ता आंकड़ा उस विरोधाभास को सामने लाता है। जिसे इस रिपोर्ट में Cat-22 जैसी स्थिति के तौर पर देखा गया है।

वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इंसानी मौतों में सबसे बड़ा हिस्सा बाघों के हमलों का है। 50 मृतकों में 16 महिलाएं और लड़कियां शामिल हैं। बाघों के हमलों में 22 लोगों की मौत हुई। इसके अलावा जंगली सुअरों के हमलों में 8 लोगों की जान गई। हाथियों को हमलों में 7 मौतें हुईं। स्लॉथ भालुओं के हमलों में 4 लोग मारे गए जबकि तेंदुए के हमले में एक व्यक्ति की मौत हुई।

Cat-22 की मार्च से मई के बीच सबसे ज्यादा मौतें

इंसानी मौतों का आंकड़ा पूरे 8 महीनों में समान नहीं रहा। 50 में से 30 मौतें सिर्फ मार्च, अप्रैल और मई के दौरान हुईं। मार्च में 7 लोगों की जान गई। अप्रैल में 13 और मई में 10 मौतें दर्ज की गईं। इन महीनों में जंगलों में ग्रामीण और आदिवासी समुदाय की आवाजाही बढ़ जाती है। महुआ और तेंदूपत्ता संग्रह के लि बड़ी संख्या में लोग वन क्षेत्रों में पहुंचते हैं। ऐसे में जंगल में इंसानों की मौजूदगी बढ़ने के साथ जंगली जानवरों से सामना होने की आशंका भी बढ़ जाती है। यही वजह है कि वन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोगों के लिए यह समय ज्यादा जोखिम वाला बन जाता है।

महाकौशल और बांधवगढ़ में बाघों से ज्यादा खतरा

बाघों के हमलों में हुई 22 मौतों में से 14 महाकौशल क्षेत्र में दर्ज की गईं। सिवनी और उसके आसपास के इलाकों में इसका असर खास तौर पर सामने आया है। इसके अलावा बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व और आसपास के क्षेत्रों में बाघों के हमलों मसे 7 लोगों की मौत हुई। इन इलाकों में जंगल और ग्रामीण आबादी एक-दूसरे के काफी करीब हैं। ग्रामीण की रोजी-रोटी के लिए जंगल पर निर्भरता भी बनी हुई है। ऐसे में वन्यजीवों की आवाजाही और लोगों की गतिविधियाँ कई बार एक ही क्षेत्र में पहुंच जाती हैं। यही स्थिति मानव-बाघ संघर्ष को ज्यादा जटिल बनाती है।

बाघ बढ़े तो नए इलाकों की बढ़ी तलाश

राष्ट्रीय बाघ गणना 2022 में मध्य प्रदेश में 785 बाघ दर्ज किए गए थे। अब इनकी संख्या करीब 1000 तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। बाघों की संख्या में यह बढ़ोतरी संरक्षण की सफलता दिखाती है। लेकिन बढ़ती आबादी के साथ उनके लिए पर्याप्त सुरक्षित क्षेत्र और प्राकृतिक कॉरिडोर बनाए रखना भी जरूरी हो जाता है। जब युवा बाघ किसी मजबूत बाघ के क्षेत्र से बाहर निकलते हैं तो उन्हें नया इलाका तलाशना पड़ता है। इसी दौरान उनकी आवाजाही जंगल से बाहर खेतों और बस्तियों में तक पहुंच सकती है। दूसरी तरफ ग्रामीण महुआ और तेंदूपत्ता जैसी वन उपज जुटाने के लिए जंगल में जाते हैं। दोनों की गतिविधियाँ जब एक ही जगह और समय पर मिलती हैं तो संघर्ष का खतरा बढ़ जाता है।

45 से ज्यादा बाघों की मौत ने खड़े किए सवाल

मानव मौतों के साथ बाघों की मौत का आंकड़ा भी इस संकट का दूसरा पहलू सामने लाता है। 2026 के शुरुआती आठ महीनों में 45 से ज्यादा बाघों की मौत दर्ज की गई है। इसका मतलब यह है कि संघर्ष का असर केवल इंसानी आबादी पर नहीं पड़ रहा। बाघ भी अलग-अलग परिस्थितियों में अपनी जान गंवा रहे हैं। मध्य प्रदेश में बाघों की बड़ी आबादी और प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व संरक्षण की पहचान हैं। लेकिन अब चुनौती केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इंसानों की सुरक्षा के साथ बाघों के लिए सुरक्षित आवास और आवाजाही के रास्ते बनाए रखा भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।

संरक्षण की सफलता के साथ सुरक्षा की चुनौती

मध्य प्रदेश ने बाघ संरक्षण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। बाघों की संख्या में बढ़ोतरी उसी का संकेत है। लेकिन मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि अगली चुनौती सिर्फ बाघों की संख्या बढ़ाना नहीं हैं। इंसानों औ बाघों के बीच टकराव को कम करना भी उतना ही जरूरी है। एक तरफ ग्रामीण जंगल से अपनी आजीविका जुटाते हैं। दूसरी तरफ बाघों को अपने लिए पर्याप्त क्षेत्र और सुरक्षित रास्तों की जरूरत होदी है। दोनों की जरूरतें जब एक ही भूगोल में टकराती हैं तो यही Cat-22 जैसी स्थिति पैदा होती है। आठ महीनों में 50 इंसानों और 45 से ज्यादा बाघों की मौत इसी विरोधाभास को आंकड़ों के साथ सामने रखती है।

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