गुना में ईस्टर कार्यक्रम के दौरान धर्मांतरण और अंधविश्वास फैलाने के आरोप। जनजातीय समाज को लेकर सवाल उठ रहे हैं, प्रशासन की भूमिका पर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
गुना। जिला मुख्यालय से महज 22 किलोमीटर दूर मोहनपुर खुर्द में जो हो रहा है, वह सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं है यह एक सुनियोजित धर्मांतरण का खेल लग रहा है। ईस्टर के नाम पर गांव में सैकड़ों आदिवासियों को इकट्ठा किया गया। दो बकरे और 40 मुर्गों का भोज हुआ। लेकिन असली कहानी खाने-खिलाने में नहीं, “प्रार्थना” के नाम पर परोसी जा रही साजिस में छिपी है। ग्राउंड पर जो तस्वीर सामने आई है, वह साफ संकेत देती है कि यहां कुछ बाहरी और कुछ स्थानीय लोगों का खेल चल रहा है।
झाड़-फूंक से ‘चंगाई’ तक: बदला सिर्फ तरीका, अंधविश्वास वही
गांव के लोगों से बात करने पर जो बातें सामने आईं, वह और ज्यादा चौंकाने वाली हैं। कई लोगों ने बताया कि पहले झाड़-फूंक करवाई, फायदा नहीं मिला। फिर उन्हें बताया गया प्रार्थना करो, यीशु ठीक करेंगे। यानी ओझा-गुनिया से निकलकर अब पास्टर मॉडल आ गया है। दावा वही बीमारी ठीक करने का। तरीका नया प्रार्थना का। यहां सवाल आस्था का नहीं है, बल्कि उस मानसिकता का है जिसमें इलाज की जगह चमत्कार बेचा जा रहा है।

इलाज नहीं, ‘प्रार्थना’ दी जा रही
कुछ मामलों में सामने आया कि जिन लोगों को इलाज की जरूरत थी, उन्हें अस्पताल नहीं बल्कि “चंगाई सभा” में भेजा गया। हाथ-पैर की कमजोरी, दुर्घटना के बाद की स्थिति या अन्य बीमारियों में भी चिकित्सा सलाह के बजाय “विश्वास” पर जोर दिया गया। यह केवल धार्मिक गतिविधि नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के अधिकार से सीधा समझौता है। उत्तम कहते हैं धर्म नहीं, मन परिवर्तन हुआ है। रुकमणी ईसाई को परमेश्वर के पुत्र बताती है। जानकारों का कहना है कि मध्यप्रदेश धर्म स्वातत्य अधिनियम से बचने के लिए यह भाषा सोच-समझाकर गढ़ी और इन लोगों को रटाई गई है। जब एक गरीब जनजाति लोग कानूनी बचाव की भाषा बोलने लगे तो पर्दे के पीछे एक पूरा षडयंत्र सामने आता है।
मिशनरी मॉडल: बाहर पढ़ाई, गांव में प्रचार
गांव में सक्रिय कुछ युवाओं का बैकग्राउंड भी सामने आया है। विशाल दतिया के नया जीवन मिशन स्कूल से पढ़ाई करने के बाद अब गांव लौटकर “वचन फैलाने” की बात कर रहे हैं। विशाल कहता है कि वह ईसा मसीह के वचन गाँव-गाँव फैलाना चाहता हूँ। बाहर पैसा आता है, मिशनरी स्कूलों में स्थानीय युवा तैयार होते हैं स्थानीय स्तर पर यह नया पैटर्न दिख रहा है
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बाहर ट्रेनिंग
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गांव में सक्रियता
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अपने ही समाज में प्रभाव
विशाल ने माना कि 20 साल पहले यहाँ ऐसा कुछ नहीं था। यह बदलाव अपने आप नहीं आया। इसके पीछे विदेशी धन और सुनियोजित मिशनरी रणनीति है।

20 साल पहले कुछ नहीं था, अब तेजी से बदलाव
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि 15-20 साल पहले इस तरह की गतिविधियां नहीं थीं। अब हालात तेजी से बदले हैं। धार्मिक कार्यक्रम, प्रार्थना सभाएं और बाहरी संपर्क इन सबने गांव के सामाजिक ढांचे को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इनके निशाने पर आदिवासी समाज है।
प्रशासन की चुप्पी?
सबसे बड़ा सवाल यही है क्या प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं, या जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है? जिला मुख्यालय से इतनी कम दूरी पर सैकड़ों लोगों का जुटना, बड़े आयोजन होना यह सब बिना जानकारी के संभव नहीं लगता। फिर भी अब तक कोई कार्रवाई सामने नहीं आई है।

गरीबी, बीमारी और मौन सिस्टम
इस पूरे मामले की जड़ सिर्फ धर्म नहीं है। धर्मांरतण करने वाले जानते हैं कि स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, रोजगार का अभाव और शिक्षा की कमी से इन लोगों का फायदा उठाया जा सकता है। मोहनपुर खुर्द की कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं है। इन लोगों की नजर में ऐसे कई मोहनपुर है जिनमें चुपसे से ये खेल चल रहा है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले को सिर्फ कार्यक्रम मानकर छोड़ देता है या इसके पीछे चल रहे पूरे नेटवर्क को समझने की कोशिश करता है।
प्रशासन को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए
विश्व हिन्दू परिषद प्रांत अडंग प्रमुख सुरेश शर्मा बताते हैं कि जिले में लंबे समय से ईसाई मिशनरियों द्वारा कनर्जन की गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है। मेहनपुर खुर्द गांव में भोले-भाले जनजाति समुदाय को ईसा मसीह द्वारा बीमारी ठीक करने सहित अन्य तरीके से बहला-फुसलाकर उनका कनवर्जन किया जा रहा है। यहां के जनजाति समुदाय के लोगों को ही पास्टर बनाकर उनसे ही कवर्जन की गतिविधियां कराई जा रही है।
हिन्दू जागरण मंच के जिला संयोजक दीपक रजक बताते हैं कि जिले में पिछलवे लंबे समय से गरीब जनजति समुदाय को प्रलोभन देकर कनवर्जन का खेल चल रहा है। जिला प्रशासन की नाक के नीचे यह सब हो रहा है। उक्त मामले में दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन किया जाएगा।