जिले के प्राथमिक विद्यालयों की बदहाली, भ्रष्टाचार और शिक्षकों की लापरवाही को सुधारने के बजाय, बलरामपुर के शिक्षा विभाग ने सच्चाई को चारदीवारी के पीछे कैद करने का रास्ता चुन लिया है।
Balrampur BSA Order: बलरामपुर में BSA का तानाशाही फरमान, स्कूलों में पत्रकारों की 'नो एंट्री' |
Balrampur BSA Order: जिले के प्राथमिक विद्यालयों की बदहाली, भ्रष्टाचार और शिक्षकों की लापरवाही को सुधारने के बजाय, बलरामपुर के शिक्षा विभाग ने सच्चाई को चारदीवारी के पीछे कैद करने का रास्ता चुन लिया है। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) विकास चंद्र श्रीवास्तव ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सीधा हमला करते हुए एक तानाशाही आदेश जारी किया है।
फोटो-वीडियोग्राफी पर रोक
17 अगस्त 2026 को जारी किए गए आधिकारिक पत्र के अनुसार, जिले के सभी परिषदीय विद्यालयों में बाहरी व्यक्तियों, यूट्यूबर्स और किसी भी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश तथा फोटो-वीडियोग्राफी पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है। बीएसए ने पत्र में तर्क दिया है कि बाहरी लोगों के आने से पठन-पाठन प्रभावित होता है और शिक्षकों व विभाग की छवि धूमिल होती है। साथ ही आदेश दिया गया है कि स्कूल का गेट संचालन अवधि और उसके बाद भी अनिवार्य रूप से बंद रखा जाए।
भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश
लेकिन जमीनी हकीकत इस तुगलकी फरमान की दूसरी ही कहानी बयां करती है। यह आदेश दरअसल बलरामपुर के स्कूलों में हो रही लगातार नकारात्मक घटनाओं और भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की एक सोची-समझी कोशिश है। पिछले कुछ समय में यहाँ शिक्षा विभाग की भारी फजीहत हुई है। हाल ही में जिले में मिड-डे मील (एमडीएम) योजना में 12 करोड़ से अधिक का बड़ा घोटाला सामने आया था, जहाँ बच्चों के भोजन का बजट गबन करने के आरोप में कई प्रधानाध्यापकों को निलंबित किया गया। जेल भेजा गया और कथित तौर पर तत्कालीन बीएसए की गर्दन नपते-नपते बची। इसके अलावा, स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर शिक्षकों के स्कूल न पहुंचने और झंडारोहण न होने जैसी शर्मनाक रिपोर्ट भी मीडिया ने ही उजागर की थी।
मीडिया का मुंह बंद करने का प्रयास
खराब बुनियादी ढांचा, स्कूलों के ऊपर से गुजरते जानलेवा हाई-टेंशन तार और नदारद शिक्षकों की सच्चाई जब पत्रकार कैमरे पर लाते हैं, तो विभाग की पोल खुल जाती है। कमियों को दूर करने और शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के बजाय बीएसए का यह 'लेटर' सीधे तौर पर मीडिया और आम नागरिकों का मुंह बंद करने का प्रयास है।
कैमरों और पत्रकारों से इतना खौफ क्यों?
सवाल यह उठता है कि यदि स्कूलों में सबकुछ नियमबद्ध चल रहा है, तो फिर आम लोगों के कैमरों और पत्रकारों से इतना खौफ क्यों? यह आदेश साबित करता है कि विभाग अपनी नाकामियों को सुधारने के बजाय उन्हें छिपाने में अधिक दिलचस्पी रखता है। यही आज का फ़लसफ़ा भी है। सरकार द्वारा अपने विभागाध्यक्षों के मीडिया सहित तमाम एजेंसियों को कथित तौर पर रौंदने का काम कर रही है। बाकी, देखना होगा, ख़बर के बाद जिले व प्रदेश के उच्च अधिकारी क्या संज्ञान लेते हैं या ये तुगलकी फरमान आम लोगों और मीडिया कर्मियों के जारी रहेगा।