धार भोजशाला मामले में हाईकोर्ट पीठ ने स्वयं निरीक्षण किया। आज धार्मिक स्वरूप तय करने पर अहम सुनवाई, सर्वे में तीन वास्तु चरणों के संकेत।
धार की ऐतिहासिक भोजशाला परिसर में 28 मार्च को फिर इतिहास रचा गया, जब स्वयं इंदौर हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति स्वविवेक से भोजशाला से जुड़े सच का साक्षात्कार करने पहुंचे। वैज्ञानिक सर्वे और पुरातात्विक जांच से पुष्ट हुआ है कि भोजशाला स्थल पर वास्तुकला के तीन अलग-अलग चरण मौजूद थे। तीसरे चरण का प्रतिनिधित्व करने वाली वर्तमान मौजूदा संरचना पहले के चरण की क्षतिग्रस्त और पुनः उपयोग के लिए संशोधित संरचना के ऊपर बनाई गई थी। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राचीन ऐतिहासिक भोजशाला को ही विकृत करने का प्रयास हुआ, लेकिन समय-समय पर उसके वैभव को बनाए रखने और संरक्षित करने के भी प्रयास हुए।
भोजशाला मामले में 16 मार्च को हाईकोर्ट ने स्वयं निर्णय लिया था कि वह स्वयं भोजशाला का मौका मुआयना करेगी। अब 2 अप्रैल को भोजशाला के धार्मिक स्वरूप निर्धारण करने के मामले में सुनवाई शुरू होगी। हाईकोर्ट में 19वें नंबर पर भोजशाला मामला लगा हुआ है। 3 माह भोजशाला के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला 28 जून को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। ऐसे में वे इस मामले का सभी पक्षों को सुनकर साक्ष्यों को देख समझ कर और प्रत्यक्ष अनुभूत करके निर्णय देने के लिए सतत सुनवाई का संकेत पहले ही कर चुके हैं।
भोजशाला का प्रत्येक अवशेष अपनी प्राचीन संरचना का प्रमाण दे रहा है। सर्वेक्षण, वैज्ञानिक जांच, पुरातात्विक उत्खनन, शिलालेखों के अध्ययन, मूर्तिकला और स्थापत्य के भग्नावशेष की जांच, मौजूदा संरचना की कला और वास्तुकला के अध्ययन और उत्खनित अवशेषों के आधार पर प्रामाणिकता के साथ कहा जा सकता है कि मौजूदा भोजशाला संरचना बेसॉल्ट की एक पूर्व मौजूद संरचना के ऊपर निर्मित है, जिसका निचला हिस्सा अभी भी वर्तमान संरचना के आधार पर मौजूद है। भोजशाला की इसी मौजूदा संरचना के भीतर और आसपास पाए गए शिलालेखों के सैकड़ों बड़े और छोटे टुकड़े यह प्रत्यक्ष गवाही देते हैं कि कई शिलालेख पत्थर की संरचना में स्थापित किए गए थे, जिससे भोजशाला को एक पहचान मिली थी।
शारदा सदन में भी उल्लेख
भोजशाला में बेसॉल्ट से निर्मित विस्तारित्त संरचना को बहुत ही सूक्ष्म दानेदार बेसॉल्ट की बड़ी शिलाओं पर उत्कीर्ण अनेक शिलालेखों को सुशोभित किया गया था। वर्तमान संरचना में और उसके आसपास पाए गए कई शिलालेख इसी संरचना में स्थापित किए गए थे। 'शारदा सदन' का उल्लेख परिजातमंजरी में मिलता है, जो एक बड़ी शिला पर उत्कीर्ण है, जिसे वर्तमान संरचनाओं में स्थापित किया गया है।
मुआयने की मांग या याचिका नहीं लगी थी
भोजशाला का मामला कोर्ट में आकर भी इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि आजादी के बाद पहली बार यह ऐसा पहला कोई मामला है जब कोर्ट की कोई पीठ या स्वयं उस मामले को सुन रहे न्यायमूर्ति उस स्थल का मौका मुआयना करने पहुंचे हैं. जिसको लेकर विभिन्न पक्ष अलग-अलग दावे करते हैं। हाईकोर्ट न्यायमूर्ति भोजशाला जाकर प्रत्यक्ष सच्चाई देखें, ऐसा किसी वादी प्रतिवादी ने आग्रह नहीं किया था, याचिका नहीं लगाई थी, कोर्ट ने स्वयं निर्णय लेकर भोजशाला को प्रत्यक्ष देखा है। अभी तक ऐतिहासिक अयोध्या मामले और ज्ञानवापी मामले में भी ऐसा नहीं हुआ है, तभी तो न्यायमूर्ति ने सर्वे टीम, प्रशासनिक अधिकारी को छोड़कर शेष सभी वादी प्रतिवादी को भी भोजशाला मुआयने के समय दूर रखा है।
क्या कहते हैं भोजशाला से जुड़े जानकार
हिन्दुओं में उत्साह, पूछ रहे लंदन से मूर्ति कब आएगी?
भोजशाला मुक्ति यज्ञ के संयोजक श्री गोपाल शर्मा कहते हैं कि हाईकोर्ट के न्यायाधीश भोजशाला आकर चले गए, इसके बाद मंगलवारीय सत्याग्रह में 200 से अधिक महिला-पुरुष शामिल हुए। सभी में उत्साह था, पूछ रहे थे मूर्ति कब आएगी लंदन से? यह आस्था से जुड़ा विश्वास और उसका प्रकटीकरण है। न्यायाधीश के भोजशाला आगमन के बाद 3 दिनों में ही वकीलों की 7-8 टोलियां भोजशाला का दौरा कर चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की याचिका समय काटने का खेलभर है।
आगामी 3 माह भोजशाला मामले के लिए महत्वपूर्ण
भोजशाला मामले में याचिकाकर्ता आशीष गोयल कहते हैं कि इंदौर हाईकोर्ट में 2 अप्रैल को 19वें नंबर पर याचिका लगी है। भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने हेतु सुनवाई चल रही है। आगामी 3 माह भोजशाला मामले में महत्वपूर्ण हैं, इसीलिए साजिशन रोड़े अटकाने का काम हो रहा है। हाईकोर्ट न्यायमूर्ति के भोजशाला आगमन पर आमजन भी कहने लगा है कि सत्य के अन्वेषण हेतु अंततः मी लॉड को भी स्वयं मंदिर निरीक्षण हेतु आना पड़ा। यह भोजशाला के ऐतिहासिक महत्व को स्थापित करता है.