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Bhind Roti Bank: No Donations, Yet No One Sleeps H

भिंड का अनोखा ‘रोटी प्रकल्प’: न दान, न चंदा… फिर भी भूखा नहीं लौटता कोई बंदा

भिंड में अनोखा रोटी बैंक बिना दान और चंदे के हर शाम जरूरतमंदों को भरपेट भोजन देता है, समाज के सहयोग से चलती मिसाल


भिंड का अनोखा ‘रोटी प्रकल्प’ न दान न चंदा… फिर भी भूखा नहीं लौटता कोई बंदा

रोटी, कपड़ा और सिर पर छत  ये जीवन की बुनियादी आवश्यकताएँ हैं। योजनाएँ और प्रयास अपनी जगह हैं, लेकिन समाज में आज भी ऐसे लोग हैं, जिनके लिए दो वक्त की रोटी भी संघर्ष है। ऐसे में यदि किसी को एक समय का भरपेट भोजन मिल जाए, तो वह उसके लिए किसी वरदान से कम नहीं होता। भिंड में इसी संवेदना ने एक अद्भुत सामाजिक पहल को जन्म दिया  ‘रोटी बैंक’।

यह सेवा प्रकल्प बीते कई वर्षों से सैकड़ों जरूरतमंदों की भूख शांत कर रहा है। विशेष बात यह है कि इसकी न कोई पंजीकृत समिति है, न संगठन और न ही दान-चंदे का कोई कोष। फिर भी व्यवस्था इतनी सुदृढ़ है कि यहाँ से कोई भी जरूरतमंद खाली पेट नहीं लौटता।

केवल सहयोग से चलती है व्यवस्था

सामान्यतः किसी भी ‘बैंक’ के संचालन के लिए पूंजी आवश्यक होती है, पर भिंड का रोटी बैंक इसका अपवाद है। यहाँ न धन इकट्ठा किया जाता है, न चंदा माँगा जाता है। समाज के लोग स्वेच्छा से भोजन सामग्री उपलब्ध कराते हैं। जन्मदिन, पुण्यतिथि या अन्य अवसरों पर परिवार स्वयं आगे आकर भोजन की व्यवस्था करते हैं। इस प्रकार यह पहल समाज के सहयोग से, समाज के लिए संचालित हो रही है।

एक दृश्य जिसने सोच बदल दी

भिंड के ऐतिहासिक गौरी सरोवर तट स्थित मोटे गणेश जी मंदिर परिसर में अनेक जरूरतमंद लोग प्रसाद के सहारे अपनी भूख मिटाने की कोशिश करते दिखाई देते थे। यह दृश्य बबलू सिंधी और उनके साथियों को भीतर तक झकझोर गया। उन्होंने महसूस किया कि केवल सहानुभूति पर्याप्त नहीं है, कुछ ठोस करना होगा। यहीं से ‘रोटी बैंक’ की परिकल्पना साकार हुई।

वे कहते हैं कि यह सब भगवान की कृपा और समाज के सहयोग से संभव हो पाया। जब उन्होंने बच्चों और बुजुर्गों को हाथ फैलाते देखा, तो उन्होंने ठान लिया कि भिंड में कोई भूखा न सोए।भिंड का यह ‘रोटी बैंक’ केवल भोजन वितरण नहीं, बल्कि करुणा, सहयोग और सामाजिक जिम्मेदारी का जीवंत उदाहरण है। बिना दान-चंदे के, केवल संवेदना की पूंजी पर चल रही यह सेवा हर शाम अनेक जीवनों में तृप्ति और आशा की रोशनी भर रही है।

उनके साथ रोमा शर्मा, दीपक चावला और पंकज महरोत्रा सहित कई नि:स्वार्थ सहयोगी जुड़े हैं। अनेक ऐसे सदस्य भी हैं, जो सामने नहीं आते, लेकिन प्रतिदिन की भोजन व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हर शाम लगती है मानवता की पंगत

प्रतिदिन शाम 5 बजे मोटे गणेश जी मंदिर के समीप सीढ़ियों पर जरूरतमंदों की पंक्तियाँ सजने लगती हैं। बूढ़े, बच्चे, महिलाएँ  सभी शांत भाव से बैठकर प्रतीक्षा करते हैं। एक संकेत के साथ भोजन परोसना आरंभ होता है और कुछ ही देर में थालियाँ भर जाती हैं। भूख से व्याकुल चेहरों पर संतोष की मुस्कान तैर उठती है। यही दृश्य इस सेवा का सबसे बड़ा पुरस्कार है।