जबलपुर के डॉ. अर्जुन शुक्ला के शोध में 440 हर्ट्ज़ की ध्वनि से मच्छरों में बेचैनी और व्यवहारिक बदलाव सामने आया, अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित
मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और फाइलेरिया जैसी बीमारियां आज भी जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। इन रोगों के प्रमुख वाहक मच्छर हैं, जिनके नियंत्रण के लिए अब तक मुख्य रूप से रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता रहा है। हालांकि, रसायनों के अत्यधिक प्रयोग से पर्यावरणीय असंतुलन और कीटनाशक-प्रतिरोध जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
रसायन नहीं, व्यवहार को समझने की कोशिश
ऐसे में जबलपुर स्थित शासकीय मोहनलाल हरगोविंददास विज्ञान एवं विज्ञान महिला महाविद्यालय के प्राणीशास्त्र विभाग में कार्यरत डॉ. अर्जुन शुक्ला ने एक अभिनव शोध के माध्यम से यह जांचने का प्रयास किया कि क्या विशेष ध्वनि आवृत्तियां मच्छरों के व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं। यह अध्ययन मच्छरों को मारने के बजाय उनके व्यवहार को समझने और नियंत्रित करने की दिशा में किया गया है।
क्यूलेक्स और एनाफिलीज़ पर प्रयोग किए गए
शोध में मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण प्रजातियों क्यूलेक्स और एनाफिलीज के वयस्क नर एवं मादा मच्छरों पर नियंत्रित वातावरण में प्रयोग किए गए। सामान्य पहचान के अनुसार क्यूलेक्स मच्छर दीवार पर सीधे बैठता है, जबकि एनाफिलीज बैठते समय अपने शरीर को तिरछे कोण में रखता है और उसका पिछला भाग ऊपर उठा रहता है।
440 हर्ट्ज़ पर दिखा सबसे ज्यादा असर
डॉ. अर्जुन ने बताया कि मच्छर मनुष्यों की तरह कानों से ध्वनि नहीं सुनते, बल्कि उनके एंटीना में स्थित ‘जॉन्स्टन ऑर्गन’ नामक संरचना कंपन को महसूस करती है। इसी आधार पर भारतीय संगीत की सरगम से जुड़ी 392 हर्ट्ज (गा), 440 हर्ट्ज (मा/धा के समीप) और 494 हर्ट्ज (नि) आवृत्तियों का चयन किया गया।कैसियो कीबोर्ड के माध्यम से इन ध्वनियों को उत्पन्न कर मच्छरों के व्यवहार का सूक्ष्म अवलोकन किया गया। 440 हर्ट्ज की ध्वनि पर मच्छरों में सबसे अधिक व्यवहारिक परिवर्तन देखा गया। वे अधिक बेचैन हुए, अनियमित ढंग से उड़ने लगे और कम समय के लिए स्थिर बैठे।