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दिल्ली की सातों सीटों पर भाजपा की नजर, 2014 का इतिहास दोहराना चाहती है भाजपा

दिल्ली की सातों सीटों पर भाजपा की नजर, 2014 का इतिहास दोहराना चाहती है भाजपा

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव-2019 की तिथि घोषित होते ही दिल्ली में लोकसभा चुनावों की हलचल शुरू हो गई है। 2014 की तरह भाजपा फिर एकबार लोकसभाई करिश्मा दिखाने में लगी है तो कांग्रेस भी भाजपा को चुनिंदा मुद्दों पर घेरने की कोशिश में है। दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों की बात की जाए तो वे सात अजूबों से कम नहीं। भाजपा, कांग्रेस ही नहीं बल्कि आप पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल भी जीत की जुगत में लग गए हैं। भाजपा का दिल्ली की सातों सीटों पर कब्जा है। कांग्रेस और आप पार्टी का एक सूत्रीय कार्यक्रम दिल्ली में भाजपा को रोकना है। यही वजह है कि आप पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के हाथ में हाथ फंसाना चाहते हैं। पर दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को दिल्ली कांग्रेस की बागडोर देने के बाद से कांग्रेसियों में मनोवैज्ञानिक रूप से भरोसा बढ़ा है।

केजरीवाल को कांग्रेस से कम भाजपा से ज्यादा और खासतौर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से गिला है। केजरीवाल की इस गिला की शुरुआत केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से ही शुरू हो गई थी। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जब 2014 में दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान से मोदी ने अंजान केजरीवाल को मंच से कोसा तो केजरीवाल की नाराजगी बढ़नी लाजिमी भी थी। देश मे परचम फहराने के बाद भी राजधानी दिल्ली उनसे दूर थी। दरअसल, भाजपा मान चुकी थी कि दिल्ली विधानसभा में भी उसकी जीत होगी। पर अन्ना हजारे आंदोलन से निकलकर पहली बार राजनीति में उतरे केजरीवाल की आप पार्टी ने 70 विधानसभा सीटों में से 67 पर जीत दर्ज कराकर सत्तारूढ़ कांग्रेस को तो बाहर का रास्ता दिखाया ही साथ ही दिल्ली की सत्ता पर बैठने का सपना देखने वाली भाजपा का सपना ही रह गया।

अबकी बार समीकरण बदले-बदले नजर बा रहे हैं। केजरीवाल दिल्ली में खिसकती अपनी जमीन बचाने के लिए कांग्रेस से गठबंधन की उम्मीद तलाश रहे हैं। वे कांग्रेस के समर्थन से ही दिल्ली में 2020 में होने वाले विधानसभा चुनाव में वापसी की संभावना देख रहे हैं। और तभी केजरीवाल इस कोशिश में हैं कि कांग्रेस के हाथ में हाथ डाल दिल्ली में भाजपा को लोकसभा चुनाव में आईना दिखाया जा सकता है। अजय माकन का दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष रहने के समय से ही केजरीवाल कांग्रेस के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ने के मूड में है। गठजोड़ को लेकर केजरीवाल ने कई बैठकें की लेकिन प्रदेश कांग्रेस के नेताओं की रजामंदी न होने की वजह से कांग्रेस और आप का यह गठबंधन आज भी अधर में लटका हुआ है। पर दो दिन पहले प्रदेश अध्यक्ष शीला दीक्षित का कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष से मिलना गठबंधन का संकेत जरुर है। शीला जानती हैं कि भाजपा को वह लोकसभा चुनावों में जवाब देने की हालत में नही है। और आप से गठबंधन कांग्रेस को मजबूती के साथ-साथ भाजपा को कमजोर करेगा। सूत्रों के मुताबिक आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और आप की शर्तों के चलते लोकसभा चुनावों के चलते यह गठबंधन अटका हुआ है। माना तो यह जा रहा है कि जल्द ही कांग्रेस और आप के बीच गठबंधन पर मुहर लगा दी जाएगी और ऐसे में दिल्ली की सातों सीटों में से तीन- तीन पर कांग्रेस और आप के उम्मीदवार लड़ेंगे जबकि एक सीट पर किसी निर्दलीय उम्मीदवार को लड़ाए जाने की चर्चा है।

दिल्ली में मौजूद भाजपा के सांसदों को लेकर जहां उनके कामों, जनता तक पहुँच और पैठ के साथ जीत का विश्लेषण कर रही वही आप पार्टी ने अपने छह उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है और कांग्रेस ने कोई पत्ते नहीं खोले हैं। वह गठबंधन की हां या ना के बाद उम्मीदवार के चयन के मूड में बताई जा रही है।

गठबंधन की संभावनाएं दूसरे अन्य राजनीतिक दलों के दबाव के चलते भी बन रही है। सभी विपक्षी दलों की मजबूरी है कि मोदी को रोकने के लिए अपने अपने स्तर पर गठजोड़ किया जाए। इसीलिए दिल्ली में कांग्रेस और आप पार्टी एक साथ आने की संभावना है। सूत्रों का कहना है कि दिल्ली में गठबंधन के देरी की एक वजह 2020 के होने वाले विधानसभा चुनावों में दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को लेकर भी है। केजरीवाल के दावे के पीछे अगर 70 में से 67 सीटे और मौजूदा मुख्यमंत्री होने की दलील है तो शीला दीक्षित की डेढ़ दशक तक दिल्ली पर राज करने और इस दौरान हुए विकास कार्यों की दलील का दावा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी 2019 को फतह कर लेना चाहती है। और तभी वह जिताऊ उम्मीदवारों को लेकर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती है। भले उसे बदलाव करना पड़े या फिर मौजूदा सांसदों का टिकट काट देना पड़े। चर्चा तो यह भी है कि पार्टी के सौ सांसदों के टिकट काटे जाएंगे और इतने ही सेलिब्रिटियों को टिकट दिए जाने की चर्चा है।

दिल्ली की सात सीटों में से नई दिल्ली सीट सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। अधिवक्ता और भाजपा प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी यहाँ से सांसद है। मतदाताओं से दूरी और जिद्दीपन के चलते उन्हें बदले जाने की संभावना है। इस सीट से चुनाव लड़ने वाले दावेदारों की संख्या बाकी सभी सीटों से ज्यादा है। पूर्व महापौर रविन्द्र गुप्ता, क्रिकेटर गौतम गंभीर, प्रदेश प्रभारी श्याम जाजू, एनडीएमसी के उपाध्यक्ष करण सिंह तंवर और खुद मीनाक्षी लेखी भी हैं। लेकिन, पार्टी में चर्चा मोनिका अरोड़ा को चुनाव लड़ाने की है। मीनाक्षी की तरह ही मोनिका पार्टी की प्रवक्ता और अधिवक्ता हैं। चांदनी चौक सीट से हर्षवर्धन सांसद हैं, उन्हें पूर्वी दिल्ली से लड़ाए जाने की चर्चा है तो चांदनी चौक से दिल्ली भाजपा के पूर्व अध्यक्ष विजेंदर गुप्ता को लड़ाए जाने की खबर है। उत्तर पश्चिमी दिल्ली से उदितराज सांसद हैं। उदितराज जहां पार्टी की ही नीतियों पर सवाल उठाते रहे हैं वहीं जनता से उनका कम ही सम्पर्क रहा। हालांकि पार्टी को उनसे कोई फायदा नही पर दोबारा लड़ाए जाने की उम्मीद है। हालांकि पूर्व सांसद अनीता आर्य यहाँ से टिकट की दावेदारी कर रही हैं। आरक्षित सीट होने के चलते उम्मीदवारों की संख्या कम है लिहाजा अनीता आर्य को भी टिकट मिलने की संभावना दिखती है।

दक्षिण दिल्ली से सांसद रमेश विधूड़ी हैं, मतदाताओं से बेरुखी उनका कमजोर पहलू बताया जा रहा है उनके समानांतर रामवीर सिंह विधूड़ी के नाम की भी चर्चा है। पश्चिमी दिल्ली से प्रवेश वर्मा सांसद हैं। खुद को जाटों का नेता बताने वाले प्रवेश वर्मा को पिछले विधानसभा उपचुनाव में जाटों ने भी नकार दिया था और तब नाराज होकर वे घर बैठ गए थे। चर्चा है कि पार्टी क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग को उतारने के मूड में है लेकिन सहवाग दिल्ली की जगह हरियाणा से चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे बताए जा रहे हैं।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली से मनोज तिवारी सांसद हैं और साथ ही दिल्ली भाजपा अध्यक्ष भी। सांसद रहने के दौरान वे जनता की आवाज संसद में उठाने में काफी पीछे रहे हैं। बताया जा रहा है कि कांग्रेस-आप पार्टी में गठबंधन हुआ तो वे अपने गृह क्षेत्र बिहार के बक्सर से चुनाव लड़ने के मूड में बताए जा रहे हैं। फिलहाल अश्विनी चौबे बक्सर से संसद है।

पूर्वी दिल्ली की बात करें तो यहाँ से महेश गिरी सांसद हैं। 2014 में मोदी लहर के चलते उन्होंने जीत तो दर्ज कर ली थी पर मतदाताओं के बीच पहचान उनकी अधूरी ही रही है। कहा तो ये जा रहा है कि चांदनी चौक के सांसद डॉ हर्षवर्धन को इस सीट से लाया जा सकता है। अबकी बार पार्टी हाईकमान इस उधेड़बुन में है कि जीत के लिए कैसे, किसे और कहां से चुनाव लड़ाया जाए?

Updated : 12 March 2019 3:33 PM GMT
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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