दिव्य और असाधारण महिला थीं भगिनी निवेदिता

दिव्य और असाधारण महिला थीं भगिनी निवेदिता
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'भगिनी निवेदिता का राष्ट्र योग' विषय पर हुई व्याख्यानमाला

ग्वालियर। विवेकानंद केन्द्र दत्त मंदिर जीवाजीगंज में भगिनी निवेदिता की 150वीं जयंती एवं श्रीधर गोपाल कुंटे जी के जन्म शताब्दी पर मंगलवार को 'भगिनी निवेदिता का राष्ट्र योग' विषय पर व्याख्यानमाला आयोजित की गई। कार्यक्रम में राष्ट्र सेविका समिति की महानगर कार्यवाहिका श्रीमती महिमा तारे एवं भारतीय शिक्षण मंडल की कार्यकर्ता आरती वझे ने अपना उद्बोधन दिया।

कार्यक्रम की शुरूआत सरस्वती पूजन से हुई। कार्यक्रम में श्रीमती महिमा तारे ने 'भगिनी निवेदिता का राष्ट्र योग' विषय पर बोलते हुए कहा कि भगिनी निवेदिता एक दिव्य और असाधारण महिला थीं। वे भारत के पुनरुत्थान के लिए आजीवन समर्पित रहीं। भगिनी निवेदिता ने देश के स्वाधीनता आंदोलन में पर्दे के पीछे रहकर एक आक्रामक भूमिका निभाई।

श्रीमती तारे ने कहा कि शिक्षा, कला, संस्कृति एवं विज्ञान में भारत की ध्वज पताका विश्व में फहरे। इसके लिए स्वामी विवेकानंद जी की समाधि के पश्चात भी भगिनी निवेदिता प्रयत्नशील रहीं। वे भारत की राष्ट्र अवधारणा से परिचित थीं। उन्होंने कहा कि भगिनी निवेदिता का राष्ट्र के प्रति योगदान हमारी आने वाली पीढिय़ों तक सदैव प्रेरणादायक रहेगा। 'मार्गरेट नोबल से भगिनी निवेदिता' विषय पर बोलते हुए आरती वझे ने कहा कि भगिनी निवेदिता का पहले नाम मार्गरेट नोबेल था। वे इंग्लेण्ड में जन्मी और वहीं पर पढ़ी-लिखी थीं। जब मार्गरेट नोबेल के जीवन में स्वामी विवेकानंद जी गुरु के रूप में आए तो उनका जीवन पूर्ण रूप से बदलकर भारतीय हो गया। भगिनी निवेदिता ने स्वामी जी के द्वारा निर्दिष्ट कार्य के लिए स्वयं को तैयार किया और अपने स्वभाव और विचारों में बदलाव किया। उन्होंने कहा कि भगिनी निवेदिता भारतीय संस्कृति से इतनी प्रभावित हुईं कि स्वयं को भूलकर भारतीय संस्कृति में रंग गईं और भारत देश के लिए समर्पित हो गईं। इस अवसर पर आधुनिक भागीरथ सम्मान सपना घाटे, विश्वकर्मा सम्मान उत्कर्ष नाईक एवं भगवान बुद्ध सम्मान सविता चौहान को दिया गया। व्याख्यानमाला के अंत में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धासुमन अर्पित किए गए। इस अवसर पर जीतेन्द्र वझे, प्रभांशु जोशी, अप्पा दामले एवं सुभाष वर्मा आदि गणमान्यजन उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन रक्षित वझे एवं प्रभांशु जोशी ने किया।

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