अनुभूति कराने वाला लेखन ही साहित्य : पराड़कर जी

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री श्रीधर पराड़कर की साहित्य साधना राष्ट्रीय वातावरण को आलोकित करती रही है। इसी कारण उनको विश्व स्तरीय हिन्दी सेवी सम्मान दिया जा रहा है। यह सम्मान मॉरीशस में 18 अगस्त से होने वाले विश्व हिन्दी सम्मेलन में दिया जाएगा। इससे पूर्व श्रीधर पराड़कर को उनकी साहित्य सेवा के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय के केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा की ओर से भारत के राष्ट्रपति द्वारा हिंदी सेवी सम्मान वर्ष 2015 प्रदान किया गया। श्री पराडकर जी को यह सम्मान मिलने पर स्वदेश ने श्री पराड़कर जी से वार्ता की। उनसे लिया गया साक्षात्कार यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।
वे कहते हैं कि साहित्य अनुभूति जन्य होता है, जिस साहित्य में अनुभूति एवं संवेदना का अभाव होता है, वह साहित्य हो ही नहीं सकता। आज साहित्य के नाम पर कुछ भी पढ़ाया और पढ़ा जा रहा है। अखिल भारतीय साहित्य परिषद प्रारंभ से ही लेखन कार्य के प्रति रुचि रखने वालों को साहित्य की गंभीरता का बोध करा रहा है। वर्तमान में साहित्य के क्षेत्र में सबसे चिंतनीय बात यह है कि साहित्य केवल कविताओं तक सीमित होता जा रहा है, जबकि साहित्य व्यापकता लिए हुए है। कथा, निबंध, व्यंग्य, यात्रा वृतांत, कविता, संस्मरण, आत्मकथा, नाटक आदि अनेक विधाएं हैं, जो साहित्य का प्रतिरुप हैं। साहित्य कभी विचारधाराओं और संगठनों की सीमा में नहीं बांधा जा सकता। साहित्य समग्रता का सागर है। अखिल भारतीय साहित्य परिषद ऐसे साहित्य को बढ़ावा देता है, जिसमें देश का दर्शन हो। साहित्य भी वही है जिसमें सांस्कृतिक वातावरण की महक हो।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री श्रीधर जी पराड़कर के चिंतन में ऐसे ही साहित्य की परिकल्पना है। साहित्य साधना में लम्बे समय से रत रहने वाले श्री पराड़कर जी विश्व हिन्दी सम्मेलन के बारे में जानकारी देते हुए कहते हैं कि विश्व में जहां भी हिन्दी बोली जाती है, वहां के चयनित हिन्दी के विद्वानों को एक मंच पर लाकर हिन्दी के प्रति प्रतिबद्धता को व्यक्त करने का काम ही इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य है। वे कहते हैं कि हिन्दी की प्रतिष्ठा बढ़े, हिन्दी का बड़े स्तर पर उपयोग हो, इसके लिए ही ऐसे सम्मेलनों की आयोजना बनी। विश्व हिन्दी सम्मेलन का मुख्यालय मॉरीशस में है।
चर्चा के दौरान श्री पराड़कर जी कहते हैं कि मॉरीशस में होने वाला संस्था का यह 11वां आयोजन है। सबसे पहले नागपुर में हुआ और पिछले वर्ष भोपाल में ऐसा ही कार्यक्रम किया गया। संस्था ही हर जगह आयोजक होती है, लेकिन जिस देश में यह कार्यक्रम होता है, उसे उस देश की सरकार ही करती है। इसको भारत का विदेश विभाग देखता है।
हिन्दी की उपेक्षा के बारे में किए गए एक सवाल के बारे में वे स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि देश में कहीं भी हिन्दी की उपेक्षा नहीं है। हां सरकारी हिसाब से सोचेंगे तो ऐसा लग सकता है, क्योंकि यह सब राजनीतिक कारणों से हो रहा है, जबकि लोगों की तरफ से ऐसी कोई बात नहीं है। प्रामाणिक रुप से देखा जाए तो हिन्दी ही देश की संपर्क भाषा है, अंगे्रजी संपर्क भाषा न तो कभी थी, न है और न ही हो सकती है। वे कहते हैं कि यह सही है कि आज शासन, प्रशासन और जनता के बीच बढ़ती दूरियों का कारण भी भाषा ही है। जनता जिस भाषा को जानती है, उसी भाषा में उससे बात करें तो जनता को अच्छा लगेगा। सेवा और उपभोक्ता के बीच के अंतर को समाप्त करना ही होगा। हिन्दी की उपयोगिता के बारे में वे कहते हैं कि देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां आज हिन्दी अपना रही हैं। इसलिए यह समस्या राजनीतिक है, भाषा की कोई समस्या है ही नहीं। श्री पराड़कर जी कहते हैं कि सारा देश एक है, सारी भारतीय भाषाएं हमारी अपनी भाषाएं हैं। साहित्य परिषद के राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम हिन्दी में होते हैं और क्षेत्रीय कार्यक्रम वहां की भाषाओं में होते हैं।
वर्तमान में साहित्य में खेमेबाजी को लेकर वे बहुत चिंतित दिखाई देते हैं। वे कहते हैं कि एक विचार धारा को पुष्ट करने वाला साहित्य समग्र नहीं हो सकता। साहित्य निष्पक्ष होना चाहिए, फिर चाहे उसका विरोध हो या समर्थन। साहित्य की राष्ट्रीय मर्यादाएं भी होती हैं, यह सभी को ध्यान में रखना चाहिए। किसी को दोष देने की प्रवृति समाप्त होना चाहिए। हम स्वयं क्या कर रहे हैं और कैसा कर रहे हैं, इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें स्वयं यह सोचना चाहिए कि मेरा नाम समस्या बढ़ाने वालों में नहीं आना चाहिए, समाधान कारक लेखन ही हमारा आधार बनना चाहिए।
