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लोकसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष को लेकर कयासबाजी तेज

मेनका गांधी और अहलूवालिया दौड़ में सबसे आगे

लोकसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष को लेकर कयासबाजी तेज

नई दिल्ली। सोमवार से शुरू हो रही 17वीं लोकसभा की बैठक से पहले अब नए लोकसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष को लेकर कयासबाजी तेज हो गई है। हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल है कि मोदी और शाह की जोड़ी इस बार किसके सिर पर लोकसभा अध्यक्ष का ताज पहनाती है? वैसे तो अंतिम समय तक किसी को भी इस बात का भान नहीं रहता कि आगे क्या निर्णय होने वाला है, लेकिन, सूत्रों के हवाले से पार्टी के अंदरखाने इस तरह की चर्चा है कि इस बार सुल्तानपुर से चुनाव जीतकर आईं मेनका गांधी को यह जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। मेनका गांधी को लेकर अगर कयासबाजी है तो उसके भी कई मायने हैं। एक तो उनको मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं किया जाना यह बताता है कि संभवतः उन्हें विशेष रणनीति के तहत ही अध्यक्ष बनाया जाना तय किया गया हो। संसद के अंदर पार्टी की यह रणनीति हो सकती है कि गांधी परिवार को आमने-सामने लाने के लिए क्यों न मेनका गांधी को ही लोकसभा का अध्यक्ष बना दिया जाए? गांधी परिवार के उत्तराधिकारियों में जहां राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के साथ वरूण गांधी शिष्टाचार दिखाते नजर आए हैं पर ऐसा कभी कोई वाक्या नजर नहीं आया जहां गांधी परिवार की ये दोनों बहुएं एक मंच पर साथ-साथ दिखीं हों। कल्पना की जा सकती है जिस कांग्रेस की ताकत सोनिया गांधी या राहुल गांधी की मुठ्ठी में रही हो, उसी के मुखियाओं को अब संसद में अपनी बात रखने के लिए क्या मेनका गांधी से इजाजत नहीं लेनी पड़ेगी? इस तर्क की कसौटी पर मेनका गांधी का नाम एकदम सटीक बैठता है।

दूसरा नाम मध्य प्रदेश के खंडवा से सांसद नन्द कुमार सिंह चैहान का है। कई बार सांसद रहने के साथ-साथ चैहान प्रदेश के अध्यक्ष भी रहे हैं। फिर संसद को सुचारू रूप से चलाने के लिए उनका अनुभव काम आ सकता है। इसके अलावा एक नाम एस एस अहलूवालिया का भी उभरकर आ रहा है। हालांकि, अहलूवालिया के साथ एक बड़ी कमजोरी यह है कि वे कांग्रेस के रास्ते से होकर भाजपा में आए हैं। अहलूवालिया एक समय राजीव गांधी के बेहद करीबी माने जाते थे। समय बदला, केंद्र में अटल जी की सरकार बनी तो वे अटल जी के साथ उनकी सरकार का हिस्सा बन गए। संसद चलाने के लिए उनके जैसा अनुभव कई मायने में बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में अगर अहलूवालिया पर बात बनती है तो संसद के कामकाज के लिए वे एक अच्छा विकल्प साबित हो सकते हैं। उनके पास आठ बार सांसद होने का अच्छा अनुभव है। हालांकि, भाजपा में चेहरों की कमी नहीं है, फिर बात अगर चैंकाने वाली हो तो कोई और नया चेहरा भी सामने आ सकता है।

अब चलते हैं लोकसभा उपाध्यक्ष को लेकर। वैसे गठबंधन सरकारों में अब तक परंपरा यही यही रही है कि उपाध्यक्ष पद पर गठबंधन के किसी सहयोगी दल के निर्वाचित सदस्य को ही बिठाया जाता रहा है। भाजपा के सहयोगी दलों में शिवसेना को इस पद के लिए बड़ा हकदार माना जा रहा है। अटल सरकार के समय भी शिवसेना के ही मनोहर जोशी को लोकसभा अध्यक्ष बनाया गया था। लेकिन जिस तरह भाजपा चूंकि दक्षिण भारत में विस्तार को सर्वाधिक तवज्जो दी रही है, उससे लगता नहीं है कि इस बार भी मौका शिवसेना को ही मिले। तभी माना जा रहा है कि इस बार यह मौका वाईएसआर को मिले। लोकसभा चुनाव में वाईएसआर 22 सीटें जीतकर आई है। वैसे उपाध्यक्ष पद के लिए पहल तो अकाली दल भी कर सकती है। भले ही उसे सीटें ज्यादा न मिली हों, लेकिन बात अगर विश्वनीयता की हो तो अकाली दल इस लिहाज से अव्वल रही है। फिर मतगणना से पूर्व खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रकाश सिंह बादल के पैर छू कर उनसे आशीर्वाद लिया था। मोदी सरकार जिस तरह प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटी है उससे एक बात तो तय है कि वह जो कुछ भी निर्णय लेगी, अपनी भविष्य की योजना के आधार पर लेगी न कि दबाव वश। तभी एआईएडीएमके के थंविदुरै का नाम भी उपाध्यक्ष की रेस में शामिल बताया जा रहा है। परंपरानुसार, नवनिर्वाचित सांसदों को अस्थाई अध्यक्ष, प्रोटेम स्पीकर द्वारा शपथ दिलाई जाती है फिर सभी सांसद लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। फिर नया अध्यक्ष संसद की कार्यवाही का जिम्मा संभालता है।

कई अनुभवी चेहरे नहीं दिखेंगे 17वीं लोकसभा में

सोमवार को जब नई लोकसभा का गठन होगा तो उसमें कई वरिष्ठ सदस्यों की कमी खलेगी। भाजपा ने उम्रदराज नेताओं को इस बार चुनाव नहीं लड़वाया था। भाजपा के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, सुमित्रा महाजन, कलराज मिश्र, जैसे नेताओं को टिकिट नहीं दिया गया था जबकि सुषमा स्वराज, उमाभारती ने स्वास्थ्यगत कारणों के चलते खुद चुनाव नहीं लड़ने का फ़ैसला किया था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव हार गए हैं जबकि कमलनाथ को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया है। जेडीएस नेता व पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा भी चुनाव हारने के चलते संसद नही पहुँच पाए हैं।

Updated : 2019-06-17T14:05:36+05:30
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