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Vijay TVK: Big Win, Bigger Challenges

जीत के बाद असली परीक्षा शुरू! विजय के सामने क्यों खड़ी हैं बड़ी चुनौतियां, केजरीवाल से क्या सबक?

तमिलनाडु में TVK की बड़ी जीत के बाद विजय के सामने सरकार बनाने से लेकर गठबंधन और प्रशासन चलाने तक कई चुनौतियां खड़ी हैं। जानिए पूरी राजनीतिक तस्वीर।


जीत के बाद असली परीक्षा शुरू विजय के सामने क्यों खड़ी हैं बड़ी चुनौतियां केजरीवाल से क्या सबक

Kejriwal Like Situation Vijay In tamilnadu |

एक्टर से पॉलिटिशियन बने थलपति विजय का पॉलिटिकल डेब्यू भले ही सुपरहिट रहा हो, लेकिन असली चुनौती अब शुरू होगी। चुनाव जीतना जितना मुश्किल होता है। उससे कहीं ज्यादा कठिन होता है उस जीत को स्थिर सत्ता में बदलना और उसे लंबे समय तक बनाए रखना। तमिलगा वेत्री कज़गम (TVK) ने 108 सीटों के साथ तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर दिया है। लेकिन 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी 118 सीटों से पार्टी अब भी 10 कदम दूर है। यही वह स्थिति है जहां से विजय की असली राजनीतिक परीक्षा शुरू होती है।

केजरीवाल जैसा मौका और वैसा ही जोखिम

विजय की स्थिति कुछ हद तक 2013 के दिल्ली चुनाव में अरविंद केजरीवाल जैसी दिखाई देती है। उस समय केजरीवाल ने पहली बार चुनाव लड़कर कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था। लेकिन सरकार बनाने के लिए उसी कांग्रेस के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ा। नतीजा यह हुआ कि उनकी सरकार ज्यादा समय तक टिक नहीं पाई। तमिलनाडु में भी विजय के सामने वैसी ही परिस्थिति बनती दिख रही है, जहां उन्हें सरकार बनाने के लिए किसी न किसी दल का सहारा लेना ही पड़ेगा। फर्क सिर्फ इतना है कि विजय के पास विकल्प ज्यादा हैं, लेकिन हर विकल्प अपने साथ राजनीतिक शर्तें और जोखिम लेकर आता है।

गठबंधन की राजनीति का असली खेल

गठबंधन की राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है कि समर्थन कभी मुफ्त में नहीं मिलता। जो भी पार्टी विजय को समर्थन देगी, वह सत्ता में हिस्सेदारी जरूर चाहेगी। चाहे वह मंत्रालय हो, नीतिगत फैसलों में दखल हो या राजनीतिक एजेंडा। ऐसे में विजय को बेहद संतुलित रणनीति अपनानी होगी, क्योंकि जरा सी चूक सरकार की स्थिरता पर भारी पड़ सकती है। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे “जीत के बाद का सबसे कठिन चरण” मान रहे हैं।

प्रशासन चलाना सबसे बड़ी परीक्षा

इसके साथ ही प्रशासन चलाना भी विजय के लिए एक नई और बड़ी चुनौती है। अब तक वे फिल्मी दुनिया में सक्रिय रहे हैं, जहां निर्णय लेने का ढांचा अलग होता है। लेकिन सरकार चलाना पूरी तरह अलग खेल है। मंत्रिमंडल का गठन, विभागों का बंटवारा, सहयोगी दलों को संतुष्ट रखना और नौकरशाही के साथ तालमेल काम शामिल हैं। ये सभी पहलू उनकी नेतृत्व क्षमता की असली परीक्षा लेंगे। तमिलनाडु जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से परिपक्व राज्य में यह काम और भी जटिल हो जाता है।

किसके साथ बनेगी सरकार?

राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो विजय के सामने कई दरवाजे खुले हुए हैं। कांग्रेस के साथ बातचीत की संभावनाएं पहले भी दिख चुकी हैं और चुनाव के बाद यह चर्चा फिर तेज हो गई है। वहीं, AIADMK ने भी संकेत दिए हैं कि अगर कोई प्रस्ताव आता है तो उसे पूरी तरह नकारा नहीं जाएगा। छोटी पार्टियां भी इस स्थिति में अहम भूमिका निभा सकती हैं और 'किंगमेकर' बन सकती हैं। लेकिन हर गठबंधन के साथ समझौते की एक कीमत तय होती है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

क्या स्थिर सरकार दे पाएंगे विजय?

इस पूरे परिदृश्य में विजय के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि चुनावी लहर और जनसमर्थन को स्थिर शासन में बदलने के लिए राजनीतिक परिपक्वता जरूरी है। अगर फैसले जल्दबाजी में लिए गए या संतुलन बिगड़ा, तो वही स्थिति बन सकती है जो दिल्ली में केजरीवाल की पहली सरकार के दौरान देखने को मिली थी। लेकिन अगर विजय रणनीतिक रूप से सही कदम उठाते हैं, तो वे तमिलनाडु की राजनीति में एक स्थायी और मजबूत विकल्प के रूप में खुद को स्थापित कर सकते हैं।

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