भारत की आजादी की लड़ाई को समझने के लिए 9 अगस्त की तारीख बेहद अहम है। इसी दिन 1925 में काकोरी ट्रेन एक्शन ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी प्रतिरोध की ताकत दिखाई थी।
भारत की आज़ादी की लड़ाई में 9 अगस्त का दिन कई अहम तारीखों को एक साथ सामने लाता है। 1925 में काकोरी ट्रेन एक्शन से लेकर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन तक विरोध के अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं। 17 साल के अंतर वाली इन दो तारीखों में रास्ते अलग थे लेकिन मंज़िल एक ही थी- आज़ादी।
इस साल इस याद का एक बड़ा मतलब था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार को काकोरी ट्रेन एक्शन के नायकों को श्रद्धांजलि दी और 9 अगस्त 1925 को ब्रिटिश शासन को चुनौती देने वाले युवा क्रांतिकारियों की हिम्मत और कुर्बानी को याद किया। उन्होंने कहा कि उनकी देशभक्ति पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी और नागरिकों से “राष्ट्र सबसे पहले” की भावना के साथ काम करने की अपील की।
9 अगस्त से जुड़ी दो बड़ी ऐतिहासिक घटनाएं
9 अगस्त भारत की आज़ादी की लड़ाई के सिर्फ़ एक हिस्से से जुड़ा नहीं है। काकोरी के सत्रह साल बाद यही तारीख अगस्त क्रांति का दूसरा नाम बन गई। 1942 में महात्मा गांधी के ऐतिहासिक “करो या मरो” के आह्वान के बाद भारत छोड़ो आंदोलन पूरे देश में फैल गया। काकोरी ने जहां एक छोटे क्रांतिकारी ग्रुप की हिम्मत दिखाई वहीं भारत छोड़ो आंदोलन ने दिखाया कि जब विरोध एक मास मूवमेंट बन जाता है तो क्या हो सकता है।
काकोरी की कहानी 9 अगस्त 1925 को लखनऊ की ओर जा रही एक ट्रेन से शुरू हुई। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के युवा सदस्यों ने काकोरी के पास ट्रेन रोकी और कॉलोनियल सरकार का पैसा ज़ब्त कर लिया। क्रांतिकारी अपनी दौलत नहीं चाहते थे। उनका मकसद ब्रिटिश राज के खिलाफ अपनी लड़ाई के लिए रिसोर्स इकट्ठा करना था।
काकोरी में युवाओं ने ब्रिटिश शासन को दी सीधी चुनौती
इस एक्शन से जुड़े खास नामों में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और सचिंद्र नाथ बख्शी शामिल थे। सरकारी रिकॉर्ड इस घटना को भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के एक अहम हिस्से के तौर पर याद करते हैं। काकोरी उन युवा भारतीयों की पीढ़ी का प्रतीक बन गया जो आज़ादी के लिए अपना करियर, परिवार और आखिर में अपनी जान तक छोड़ने को तैयार थे। उनमें से कई तो मुश्किल से बड़े हुए थे। वे उस कॉलोनियल सरकार की ताकत जानते थे जिसका वे सामना कर रहे थे लेकिन फिर भी उन्होंने विरोध करना चुना।
ब्रिटिश जवाब बहुत सख्त था। इसके बाद गिरफ्तारियां हुईं और क्रांतिकारियों पर काकोरी कॉन्सपिरेसी ट्रायल चलाया गया। बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को आखिरकार मौत की सज़ा सुनाई गई। दूसरों को अलग-अलग समय की जेल हुई। हालांकि उनकी मौत से कहानी खत्म नहीं हुई।
बिस्मिल और अशफाक की दोस्ती बनी साझा मकसद की मिसाल
बिस्मिल और अशफाकउल्ला खान की दोस्ती ने इस घटना को एक और हमेशा रहने वाला इंसानी पहलू दिया। अलग-अलग धार्मिक बैकग्राउंड से होने के बावजूद दोनों का एक ही क्रांतिकारी संगठन था। आज़ाद भारत का एक ही सपना था और आखिर में कॉलोनियल सरकार के हाथों उनका एक ही हश्र हुआ। वह साझा मकसद एक सदी बाद भी काकोरी के सबसे मज़बूत संदेशों में से एक है। यह यह भी बताता है कि उत्तर प्रदेश ने इस घटना को याद करते हुए जानबूझकर “काकोरी ट्रेन एक्शन” शब्द का इस्तेमाल क्यों किया है। यह विवरण इस घटना को सिर्फ़ कॉलोनियल सरकार द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा के ज़रिए देखने के बजाय आज़ादी की लड़ाई के संदर्भ में रखता है।
1942 में आज़ादी की लड़ाई ने लिया जनआंदोलन का रूप
लेकिन इतिहास ने 9 अगस्त को भारत की राष्ट्रीय याद में एक और जगह दी। 1942 तक आज़ादी की लड़ाई काकोरी से बहुत आगे निकल चुकी थी। दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था और भारतीय नेताओं और ब्रिटिश सरकार के बीच राजनीतिक मतभेद गहरे हो गए थे। 8 अगस्त को महात्मा गांधी ने बॉम्बे के गोवालिया टैंक मैदान में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी को संबोधित किया जिसे अब अगस्त क्रांति मैदान कहा जाता है। उनका मैसेज छोटा और साफ़ था: “करो या मरो।” मांग भी उतनी ही साफ़ थी। अंग्रेज़ों को भारत छोड़ना होगा।
अगले दिन 9 अगस्त तक ज़्यादातर सीनियर नेताओं को अरेस्ट कर लिया गया था। गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और कई दूसरे लोगों को कस्टडी में ले लिया गया। लेकिन उनके बिना भी मूवमेंट चलता रहा। स्टूडेंट्स क्लासरूम से बाहर चले गए। मज़दूरों ने काम बंद कर दिया। किसान और आम लोग प्रदर्शनों में शामिल हुए। महिलाओं ने अहम रोल निभाए। जब आम पॉलिटिकल एक्टिविटी मुश्किल हो गईं तो अंडरग्राउंड नेटवर्क ने मैसेज पहुँचाए।
आंदोलन में छात्रों से लेकर भूमिगत कार्यकर्ताओं तक की भूमिका
अरुणा आसफ़ अली, उषा मेहता, जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया विरोध के इस दौर से जुड़े खास चेहरों में से एक बन गए। उषा मेहता के अंडरग्राउंड कांग्रेस रेडियो ने मूवमेंट का मैसेज पहुँचाने में मदद की जब सेंसरशिप ने इसे चुप कराने की कोशिश की। मूवमेंट के सरकारी अकाउंट्स में यह दर्ज है कि कैसे बड़े पैमाने पर अरेस्ट और दमन के बावजूद विरोध प्रदर्शन फैले। यही 9 अगस्त के दोनों पलों के बीच ज़रूरी फ़र्क था। काकोरी एक सीक्रेसी और क्रांतिकारी संगठन पर निर्भर था। भारत छोड़ो आंदोलन सड़कों, गांवों, कॉलेजों और काम की जगहों से होकर गुज़रा। एक छोटे क्रांतिकारी ग्रुप की सीधी कार्रवाई थी तो दूसरा व्यापक जनभागीदारी वाला आंदोलन बन गया।
आज़ादी की लड़ाई सिर्फ एक रास्ते की कहानी नहीं
फिर भी एक को दूसरे के सामने रखना गुमराह करने वाला होगा। भारत का आज़ादी का आंदोलन कभी एक ही रास्ता नहीं था। इसमें संवैधानिक बातचीत और मास मूवमेंट थे। सत्याग्रह और क्रांतिकारी कार्रवाई हुई। मज़दूर, किसान, छात्र और अंडरग्राउंड एक्टिविस्ट थे। दुनिया भर में याद किए जाने वाले नेता थे और अनगिनत आम भारतीय थे जिनके नाम कभी इतिहास की किताबों में नहीं आए। उनके तरीके कभी-कभी एकदम अलग होते थे। आज़ाद भारत के बारे में उनका विचार भी अलग हो सकता था। लेकिन कॉलोनियल शासन आम दुश्मन था। इसी वजह से काकोरी और भारत छोड़ो आंदोलन को केवल दो अलग घटनाओं के तौर पर देखना आज़ादी के संघर्ष की पूरी तस्वीर को छोटा कर देता है।
काकोरी की याद आज भी क्यों महत्वपूर्ण है
यही बात योगी आदित्यनाथ के काकोरी को याद करने को एक एनिवर्सरी फंक्शन से कहीं ज़्यादा ज़रूरी बनाती है। क्रांतिकारियों को याद करना एक और पीढ़ी को भारत के आज़ादी के संघर्ष के कई पहलुओं से परिचित कराने का भी मौका है। 9 अगस्त उन दो पहलुओं को अजीब तरह से करीब लाता है। 1925 में कुछ युवा क्रांतिकारियों ने लखनऊ के बाहर एक छोटे से शहर के पास एक ट्रेन रोकी थी। 1942 में बॉम्बे से एक आवाज़ पूरे देश में पहुँची। एक काकोरी बन गया। दूसरा अगस्त क्रांति बन गया। दोनों आखिरकार 15 अगस्त 1947 तक के लंबे सफ़र का हिस्सा बन गए।
आज़ादी की कीमत और कुर्बानियों की याद
भारत की आज़ादी एक आंदोलन, एक नेता या एक तरीके में नहीं समा सकती। यह विरोध, त्याग और हिम्मत की कई धाराओं से बनी थी। कई पीढ़ियों बाद भी आज़ादी के लिए सब कुछ कुर्बान करने वालों की यादें देशभक्ति की इन लाइनों में ज़िंदा रहती हैं।
“शहीदों की चीतों पर शहीद हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।”
हर साल लोग शहीदों की समाधि पर इकट्ठा होंगे। यह उन लोगों की हमेशा याद रहने वाली निशानी रहेगी जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपनी जान दी। 9 अगस्त उन खास तारीखों में से एक है जब इतिहास खुद उन कुर्बानियों को एक साथ लाता है। यह भारत को न सिर्फ़ यह याद दिलाता है कि आज़ादी कैसे मिली बल्कि इसके लिए चुकाई गई कीमत भी।