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डॉ. तीजन बाई का निधन

पंडवानी की अमर आवाज हुई खामोश,पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन

पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण सम्मानित डॉ. तीजन बाई का 70 वर्ष की उम्र में रायपुर एम्स में निधन हो गया। उनका योगदान भारतीय लोककला में अमूल्य रहा है।


पंडवानी की अमर आवाज हुई खामोशपद्म विभूषण डॉ तीजन बाई का निधन 

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व पटल पर पहचान दिलाने वाली पंडवानी गायिका पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का शनिवार देर रात निधन हो गया। वे 70 वर्ष की थीं। उन्होंने रात करीब 3:15 बजे रायपुर एम्स में अंतिम सांस ली। पिछले करीब दो वर्षों से वे विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थीं और हाल के दिनों में उनकी हालत अधिक गंभीर हो गई थी।

भारतीय लोककला की एक युगांतकारी आवाज

डॉ. तीजन बाई ने अपनी दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय और अद्वितीय प्रस्तुति शैली से पंडवानी को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। महाभारत की कथाओं को मंच पर जीवंत करने की उनकी कला ने उन्हें भारतीय लोक संस्कृति की सबसे प्रतिष्ठित हस्तियों में शामिल किया।भारतीय लोककला में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें क्रमशः पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले लिया था स्वास्थ्य का हाल

डॉ. तीजन बाई की तबीयत खराब होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं उनकी बहू वेणू देशमुख से फोन पर बातचीत कर उनका हालचाल जाना था। प्रधानमंत्री ने उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए हरसंभव सहायता का आश्वासन दिया था। प्रधानमंत्री ने कहा था कि डॉ. तीजन बाई का देश की संस्कृति के लिए योगदान अमूल्य है और वे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर हैं।

नाना से मिली महाभारत सुनाने की प्रेरणा

डॉ. तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को छत्तीसगढ़ के भिलाई के गनियारी गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम चुनुकलाल परधा और माता का नाम सुखवती था। पारधी जनजाति से संबंध रखने वाली तीजन बाई को पंडवानी गायन की प्रेरणा अपने नाना ब्रजलाल से मिली, जो महाभारत की कथाएं गाया करते थे। उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए लोकगायक उमेद सिंह देशमुख ने उन्हें विधिवत प्रशिक्षण दिया।

13 वर्ष की उम्र में पहली बार मंच पर उतरीं

महज 13 वर्ष की आयु में डॉ. तीजन बाई ने अपना पहला सार्वजनिक मंच प्रदर्शन किया। उस दौर में महिलाएं केवल बैठकर वेदमती शैली में पंडवानी प्रस्तुत करती थीं, जबकि खड़े होकर कापालिक शैली में गायन पुरुषों तक सीमित था। डॉ. तीजन बाई ने इस परंपरा को तोड़ते हुए कापालिक शैली में प्रस्तुति देने वाली पहली महिला कलाकार बनकर इतिहास रच दिया।

समाज से बहिष्कार के बाद भी नहीं छोड़ा गायन

पंडवानी गायन को अपनाने के कारण उन्हें सामाजिक विरोध और बहिष्कार का सामना भी करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपनी कला का साथ नहीं छोड़ा। संघर्षों के बीच उन्होंने अपनी पहचान बनाई और अंततः पंडवानी को वैश्विक मंच तक पहुंचाया।

कभी स्कूल नहीं गईं, फिर भी चार बार मिली डी.लिट.

डॉ. तीजन बाई बचपन में औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकीं। बाद में साक्षरता अभियान के माध्यम से उन्होंने पांचवीं तक की शिक्षा हासिल की। हालांकि उनकी कला का सम्मान देशभर के विश्वविद्यालयों ने किया और उन्हें चार बार डी.लिट. (डॉक्टर ऑफ लेटर्स) की मानद उपाधि प्रदान की गई।

पिछले दो वर्षों से थीं अस्वस्थ

डॉ. तीजन बाई पिछले करीब दो वर्षों से अस्वस्थ थीं। सांस लेने में तकलीफ और उम्र संबंधी जटिलताओं के कारण उन्हें रायपुर एम्स के आईसीयू में भर्ती कराया गया था, जहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही थी। उपचार के दौरान शनिवार देर रात उनका निधन हो गया।

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