धार की भोजशाला से जुड़ी मां वाग्देवी की प्राचीन मूर्ति लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में रखी है। हाईकोर्ट के फैसले के बाद यह मामला फिर चर्चा में आया।
1875 में धार में मिली थी प्रतिमा, 1880 के आसपास ब्रिटेन ले जाया गया
मध्य प्रदेश के धार जिले का भोजशाला परिसर इन दिनों सुर्खियों में है। इसकी वजह वर्षों पुराना विवाद है कि यह परिसर मंदिर था या मस्जिद। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में इसे मंदिर मानते हुए हिंदू समुदाय को पूजा का अधिकार दिया है। इसके बाद भोजशाला एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई है।
हालांकि, कम लोग जानते हैं कि भोजशाला से जुड़ी मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा आज भारत में नहीं, बल्कि सात समंदर पार लंदन में सुरक्षित रखी हुई है। वाग्देवी माता को देवी सरस्वती का ही स्वरूप माना जाता है।
लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में रखी है प्रतिमा
लंदन के प्रसिद्ध British Museum की गैलरी संख्या 33 में 11वीं शताब्दी की सफेद संगमरमर से बनी एक प्राचीन प्रतिमा प्रदर्शित की गई है। संग्रहालय के रिकॉर्ड के अनुसार यह प्रतिमा 1034 ईस्वी की मानी जाती है, जब परमार वंश के राजा भोज का शासन था।कई इतिहासकार और शोधकर्ता मानते हैं कि यह प्रतिमा धार स्थित भोजशाला की वाग्देवी प्रतिमा से जुड़ी हुई है। यह प्रतिमा संग्रहालय के ‘एशियाई कलाकृतियां’ सेक्शन के अंतर्गत ‘पश्चिम भारत’ खंड में रखी गई है।
1875 में धार के खंडहरों में मिली थी मूर्ति
ब्रिटिश संग्रहालय के रिकॉर्ड के मुताबिक यह मूर्ति 1875 में धार के सिटी पैलेस के खंडहरों के बीच मिली थी। इसके बाद 1880 के आसपास इसे ब्रिटेन ले जाया गया।तब से यह प्रतिमा संग्रहालय में सुरक्षित और संरक्षित अवस्था में रखी गई है। संग्रहालय में मौजूद लगभग 80 लाख ऐतिहासिक वस्तुओं में यह भी एक महत्वपूर्ण कलाकृति मानी जाती है।
मूर्ति के शिलालेख में ‘वाग्देवी’ का उल्लेख
इस प्रतिमा पर खुदे शिलालेख में ‘वाग्देवी’ का उल्लेख मिलता है। वाग्देवी को वाणी, ज्ञान और विद्या की देवी माना जाता है। यही कारण है कि कई हिंदू संगठन और शोधकर्ता इस प्रतिमा को भोजशाला की मूल सरस्वती प्रतिमा बताते रहे हैं।भोजशाला को लंबे समय से हिंदू समुदाय सरस्वती मंदिर के रूप में देखता आया है। ऐसे में यह प्रतिमा अब केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का भी विषय बन गई है।
भारतीय कलाकृतियों की वापसी की मांग तेज
ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देशों के संग्रहालयों में रखी भारतीय कलाकृतियों की वापसी को लेकर लंबे समय से मांग उठती रही है।साल 2022 में Glasgow Museums ने भारत की छह प्राचीन कलाकृतियों को वापस करने पर सहमति जताई थी। इनमें 1000 साल पुरानी मंदिर नक्काशी भी शामिल थी। इसे ब्रिटेन से भारतीय धरोहरों की सबसे महत्वपूर्ण वापसी में से एक माना गया।इन कलाकृतियों को औपनिवेशिक काल के दौरान मंदिरों, शाही खजानों और धार्मिक स्थलों से बाहर ले जाया गया था।
संस्कृत न समझ पाने से अर्थ समझने में दिक्कत
यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के कला इतिहासकार डॉ. विवेक गुप्ता के अनुसार, ब्रिटेन के संग्रहालय कलाकृतियों को सुरक्षित रखने में सक्षम हैं, लेकिन वहां के कई क्यूरेटर संस्कृत भाषा नहीं समझते।उन्होंने कहा कि इस वजह से इन कलाकृतियों के सांस्कृतिक, धार्मिक और कलात्मक महत्व को पूरी तरह समझना उनके लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता है।