यश की फिल्म टॉक्सिक में जबरदस्त एक्शन, शानदार म्यूजिक और दमदार परफॉर्मेंस देखने को मिलती है। हालांकि कमजोर कहानी और स्क्रीनप्ले फिल्म का मजा कुछ कम कर देते हैं।
मनोरंजन। सुपरस्टार यश की लंबे समय से इंतजार की जा रही टॉक्सिक सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। KGF के बाद यश को एक बार फिर बड़े पर्दे पर देखने के लिए दर्शकों में काफी उत्सुकता थी। गीतू मोहनदास के निर्देशन में बनी यह फिल्म एक्शन, गैंगस्टर ड्रामा, रोमांस और इमोशनल का मिश्रण है। फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष यश का स्वैग, दमदार स्क्रीन प्रेजेंस और शानदार बैकग्राउंड स्कोर है। लेकिन कमजोर कहानी और बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले कई जगह मजा किरकिरा कर देता है। इंटरवल से पहले फिल्म उम्मीद जगाती है। लेकिन उसके बाद कहानी लड़खड़ाने लगती है।
फिल्म की कहानी
टॉक्सिक की कहानी 1940 से 1967 के दौर के गोवा की पृष्ठभूमि में बुनी हुई है। कहानी ड्रग्स के कारोबार से जुड़े एक गैंग और उसके आसपास मौजूद किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। यश का किरदार सिर्फ गैंग लीडर नहीं है। उसके अतीत, बचपन और परिवार से जुड़े पहलुओं को भी कहानी में जगह दी गई है। उनकी बहन गंगा के किरदार में नयनतारा हैं। इसके अलावा कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया और रुक्मणी वसंत भी अहम भूमिकाओं में हैं।
कहानी में कहा कमजोर पड़ती है टॉक्सिक
फिल्म की शुरूआत धीमी है और लंबे समय तक कहानी डायलॉग के सहारे आगे बढ़ती है। इसमें कई सीन के बीच जरूरी कनेक्शन महसूस नहीं होता। यही वजह है कि शुरूआत में कहानी से जुड़ने में थोड़ा वक्त लगता है। हालांकि इंटरवल से पहले फिल्म अपनी पकड़ मजबूत करती है और कहानी दिलचस्प लगने लगती है। लेकिन इंटरवल के बाद वही रफ्तार बरकरार नहीं रहती। कई जगह एक्शन और हिंसा कहानी पर भारी पड़ते हैं। आखिर में ट्विस्ट और साइकोलॉजिकल ड्रामा के जरिए कहानी को संभालने की कोशिश की गई है। लेकिन तब तक कई हिस्से कमजोर हो चुके होते हैं।
सिनेमेटोग्राफी फिल्म की बड़ी ताकत
जहां कहानी और स्क्रीनप्ले कई जगह निराश करते हैं। वहीं, टॉक्सिक की सिनेमेटोग्राफी प्रभावित करती है। 1940 से 1960 के दशक का माहौल, रंग, लोकेशन, और फैशन पर्दे पर शानदार तरीके से उतारा गया है। कई विजुअल ऐसे हैं जो बड़े पर्दे पर फिल्म का अनुभव बेहतर बनाते हैं। हालांकि स्क्रीनप्ले में कई सीन टूटे महसूस होते हैं। एक सीन से दूसरे सीन तक पहुंचने में स्वाभाविक फ्लो की कमी नजर आती है। किरदारों के बीच भी कई जगह ऐसा कनेक्शन नहीं बन पाता, जैसा कहानी के लिए जरूरी था।
म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर शानदार
टॉक्सिक का म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के मजबूत हिस्सों में शामिल है। यश जब बी स्क्रीन पर आते हैं, बैकग्राउंड स्कोर उनके किरदार के स्वैग को और बढ़ा देता है। दूसरे किरदारों की एंट्री और एक्शन सीन्स के लिए भी अलग साउंड डिजाइन इस्तेमाल किया गया है। फिल्म के गाने और बैकग्राउंड म्यूजिक कहानी का माहौल के साथ अच्छी तरह फिट बैठते हैं। कुछ जगह म्यूजिक कहानी को आगे बढ़ाने में भी मदद करता है।
यश की स्क्रीन प्रेजेंस ने लूटी महफिल
परफॉर्मेंस की बीत करें तो यश फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। एक्शन सीन के बाद उनका खास अंदाज और गर्दन झुकाकर चलने वाला स्वैग स्क्रीन पर अलग ही प्रभाव पैदा करता है। उनके लुक्स और स्क्रीन प्रेजेंस पर दर्शकों की नजर बनी रहती है। यश ने डबल रोल निभाया है और दोनों किरदारों में उनकी मौजूदगी असर छोड़ती है। हालांकि उनके कई डायलॉग एक ही टोन में बोले गए हैं, जिसकी वजह से कुछ जगह परफॉर्मेंस में एकरूपता महसूस होती है।
कियारा आडवाणी ने भी अच्छा काम किया है। नादिया के किरदार में उनके एक्सप्रेशन और इमोशनल सीन प्रभावी हैं। डर और प्यार जैसे भाव उन्होंने अच्छी तरह पर्दे पर उतारे हैं। तारा सुतारिया अपने छोटे रोल में ठीक लगती हैं, जबकि हुमा कुरैशी अपने किरदार से चौंकाती हैं। नयनतारा की एक्टिंग अच्छी है। लेकिन उनके किरदार को कहानी में ज्यादा जगह मिलनी चाहिए थी। रुक्मणी वसंत को भी ऐसा किरदार नहीं मिला। इसमें वह ज्यादा प्रभाव छोड़ पातीं।
डायरेक्शन में कोशिश अच्छी, लेकिन कनेक्शन कमजोर
गीतू मोहनदास ने टॉक्सिक को एक अलग विजुअल स्टाइल देने की कोशिश की है। फिल्म के पीरियड लुक, फैशन, एक्शन और माहौल पर काफी काम किया गया है। कुछ एक्शन सीक्वेंस भी अलग अंदाज में फिल्माए गए हैं और असर छोड़ते हैं। लेकिन डायरेक्शन की सबसे बड़ी कमी कहानी को लगातार बांधे रखने में नजर आती है। कई जगह भारी-भरकम डायलॉग तो हैं, लेकिन किरदारों के बीच बातचीत स्वाभाविक नहीं लगती। शुरुआत में फिल्म दर्शकों से कनेक्शन बनाने में भी संघर्ष करती है।
टॉक्सिक की खूबियाँ और कमियाँ
फिल्म की सबसे बड़ृी मकजोरी इसकी कहानी और स्क्रीनप्ले है। कई सीन के बीच कनेक्शन कमजोर है और कुछ एक्शन सीक्वेंस कहानी के लिए जरूरी नहीं लगते। इंटरवल के बाद कहानी की पकड़ ढीली पड़ जाती है। दूसरी तरफ यश की स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है। शानदार सिनेमेटोग्राफी, दमदार बैकग्राउंड स्कोर और कलाकारों की अच्छी परफॉर्मेंस फिल्म को संभालने का काम करती है।
क्यों मिले 5 में से 3 स्टार
अगर आप यश के फैन हैं और उनका स्वैग, एक्शन और स्क्रीन प्रेजेंस बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं तो टॉक्सिक आपको एक बार थिएटर तक खींच सकती है। लेकिन अगर फिल्म से मजबूत कहानी और कसा हुआ स्क्रीनप्ले चाहते हैं तो निराशा हाथ लग सकती है। यश की परफॉर्मेंस, म्यूजिक, बैकग्राउंड स्कोर और विजुअल ट्रीटमेंट को देखते हुए टॉक्सिक को 5 में से 3 स्टार दिए जा सकते हैं।
फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट
‘टॉक्सिक’ में यश का स्टारडम, बड़ा बजट, भव्य सेट, एक्शन और शानदार विजुअल्स सब कुछ भरपूर है। फिल्म कई मौकों पर अपनी भव्यता से प्रभावित करती है, लेकिन कहानी उस स्तर तक पहुंचने में नाकाम रहती है। यश के कई सीन दमदार हैं और उनका स्वैग फिल्म की जान है। लेकिन 3 घंटे 14 मिनट की लंबी फिल्म को सिर्फ स्टारडम के सहारे आगे ले जाना मुश्किल हो जाता है। कहानी में कई ऐसे हिस्से हैं जहां फिल्म दर्शकों को बांधे रखने के बजाय अपनी ही रफ्तार में उलझती नजर आती है।
कुल मिलाकर, ‘टॉक्सिक’ देखने में भव्य जरूर है, लेकिन इसमें इमोशन और कहानी की गहराई उतनी नहीं है। फिल्म बहुत कुछ दिखाती है, लेकिन दर्शकों को उतना महसूस नहीं करा पाती।