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न्यूनतम मजदूरी 375 करने पर कई केन्द्रीय योजनाएं होंगी प्रभावित, खेती-किसानी भी हो जाएगी महंगी

न्यूनतम मजदूरी 375 करने पर कई केन्द्रीय योजनाएं होंगी प्रभावित, खेती-किसानी भी हो जाएगी महंगी
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नई दिल्ली। वीवी गिरि नेशनल लेबर इंस्टीट्यूट (वीवीजीएनएलआई) के फेलो अनूप सत्पथी के नेतृत्व में सरकार ने 2017 में एक विशेषज्ञ समिति गठित की थी। जिसका कार्य राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने के लिए नई विधि (मेथड) बनानी थी| उसकी रिपोर्ट कुछ दिन पहले सार्वजनिक की गई। समिति ने सुझाव दिया है कि राष्ट्रीय स्तर पर कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी 375 रुपये प्रतिदिन यानि 9,750 रुपये प्रति माह होनी चाहिए। यह मजदूरी नई विधि से तय की गई है। इसके अलावा एक अन्य तरीके से विभिन्न क्षेत्रों के आधार पर स्थानीय स्थितियों के मुताबिक मजदूरी 342 से 447 रुपये प्रतिदिन यानि 8,892 रुपये से 11,622 रुपये प्रति माह करने का सलाह दिया गया है। इसके अलावा अलग से शहरी क्षेत्रों के मजदूरों के लिए आवास का किराया भी देने को कहा गया है। अन्य राज्यों की अपेक्षा सबसे अधिक मजदूरी केवल दिल्ली में है। यहां मजदूरी 538 रुपये प्रतिदिन है। समिति द्वारा दिये सुझाव से 163 रुपये अधिक है। जबकि अन्य राज्यों में मजदूरी प्रस्तावित मजदूरी से बहुत कम है। इसको लेकर कई संगठनों ने सभी राज्यों में लगभग बराबर या राज्यों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति के हिसाब से तय न्यूनतम मजदूरी को लागू करने की मांग की है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, 'न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के अंतर्गत वैधानिक रूप से वेतन तय करने के बाद भी कम मजदूरी और विभिन्न कार्यक्रमों में न्यूनतम वेतन देने में भिन्नता सभी राज्यों में है।' समिति ने पाया कि किसी भी राज्य में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के लिए कोई सुव्यवस्थित प्रक्रिया नहीं है।

इस बारे में पूर्व सांसद हरिकेश बहादुर का कहना है कि नोटबंदी के बाद से देश में कई सेक्टर में रोजगार कम हुए हैं। इसके चलते मजदूरी भी कम हो गई है। मजदूर जितना मेहनताना मिल रहा है उसी में काम करके अपना जीवन यापन करने को मजबूर हो रहे हैं। ईंट भट्ठों, तेल मिलों, निर्माण कार्यों आदि में हालत बहुत खराब हुई है। बीएचयू प्रबंध शास्त्र संकाय के डीन रहे प्रो. छोटेलाल का कहना है कि रूस, अमेरिका, ब्राजील में औसत न्यूनतम मजदूरी तय है। मलेशिया, चीन, वियतनाम में तो अलग-अलग सेक्टर, क्षेत्र व पेशा के आधार पर अलग-अलग न्यूनतम मजदूरी तय है। इसी तरह से भारत में भी होनी चाहिए। महंगाई आदि को देखते हुए हर एक- दो वर्ष पर इसका रिव्यू किया जाना चाहिए। लेकिन न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा ) के तहत हर गरीब ग्रामीण परिवार को 100 दिन रोजगार देने और उसको सुझाये गये न्यूनतम मजदूरी देने पर असर पड़ सकता है। उसके तहत प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराना अनिवार्य है, जो प्रतिदिन 220 रुपये की वैधानिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य संबंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार हैं। 2010-11 वित्तीय वर्ष में इस योजना के लिए केंद्र सरकार का व्यय 40,100 करोड़ रुपये था। वह बढ़ते-बढ़ते 2018-19 वित्तीय वर्ष में 55,000 करोड़ रुपये हो गया था। भारत सरकार ने अप्रैल-मई 2019 में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर इस तय बजट के अलावा भी 6,084 करोड़ रुपये अतिरिक्त आवंटन किया। इस तरह 2018 -19 में मनरेगा के मद में 61,084 करोड़ रुपये खर्च किये गए। यदि न्यूनतम मजदूरी 375 रुपये प्रतिदिन कर दी गई तथा सभी राज्यों में लगभग समान कर दी गई ,तब यह खर्च और 20 हजार करोड़ रुपये के लगभग बढ़ सकता है। इसके कारण या तो मनरेगा योजना में कटौती करनी पड़ेगी या बजट बहुत बढ़ाना पड़ेगा। प्रो. छोटेलाल का कहना है कि केन्द्र सरकार ने किसानों से लगायत बेरोजगारों तक को सीधे उनके खाते में प्रतिमाह यदि कुछ सौ रुपये देने की योजना चाहे किसी भी नाम से बना रही है अथवा देने जा रही है, तो ऐसे में वह मनरेगा व इसी तरह की अन्य योजनाओं में कटौती कर सकती है, वरना इन सभी योजनाओं के लिए धन जुटाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इस तरह केन्द्र सरकार के सामने एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति बनती जा रही है।

Updated : 19 Feb 2019 8:50 AM GMT
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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