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सिर्फ 8 मिनट में धुलेगी एक ट्रेन, पानी और वक्त की होगी बचत

सिर्फ 8 मिनट में धुलेगी एक ट्रेन, पानी और वक्त की होगी बचत

नई दिल्ली। भारतीय रेल ने ट्रेनों की धुलाई के दौरान उपयोग में लाये जाने वाले पानी के संरक्षण के लिए नई प्रणाली विकसित की गई है जिसके तहत पानी को फिर से उपयोग में लाया जा सकेगा। इसकी शुरुआत दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से हुई है, जहां एक स्वचालित कोच वाशिंग प्लांट लगाया गया है।

उत्तर रेलवे के दिल्ली मंडल में निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर स्वचालित कोच वाशिंग प्लांट लगाया गया है। यहां ट्रेनों की धुलाई के लिए परंपरागत धुलाई से बिल्कुल अलग रेलवे ट्रैक पर दोनों तरफ बड़े-बड़े ब्रश लगाए गये हैं जो काफी तेज गति से गोल-गोल घूमते हैं। इन ब्रशों में अलग-अलग तरह का डिटर्जेंट और केमिकल हैं। यहीं पर पानी की तेज धार निकलती है जो सीधे ट्रेन पर गिरती है। ट्रेन को धुलाई के लिए इस ट्रैक पर से गुजरना होता है और दोनों तरफ से ब्रश ट्रेन की धुलाई करना शुरू कर देते हैं।

उत्तर रेलवे के प्रवक्ता कुलतार सिंह ने मंगलवार को बताया कि यह प्लांट एक करोड 60 लाख की लागत से तैयार किया गया है। यहां पानी की रीसाइक्लिंग के लिए 50-50 हजार लीटर के दो भूमिगत वाटर टैंक बनाए गए हैं। ट्रेन की धुलाई में इस्तेमाल पानी ट्रैक पर बनी नालियों से होकर इनमें से एक टैंक में जाता है वहां से रिसाइकल होकर पानी दूसरे टैंक में जाता है। इससे ट्रेन की धुलाई में इस्तेमाल पानी में से केवल 20 प्रतिशत पानी ही बर्बाद होता है और शेष पानी फिर से रिसाइकल होकर इस्तेमाल में आता है।

उन्होंने बताया कि यह फिलहाल प्रायोगिक स्तर पर काम कर रहा है। इस समय प्रतिदिन यहां 5-6 ट्रेनों की धुलाई ही की जा रही है। इस दौरान इस पूरी प्रक्रिया में पानी की कितनी बचत हो रही है, कितनी मानव शक्ति की बचत हो रही है और लागत आदि का अध्ययन किया जा रहा है।

कुलतार ने बताया कि इस प्लांट पर 24 डिब्बों की बड़ी ट्रेन को केवल 8 मिनट में पूरी तरह धोया जा सकता है जबकि परंपरागत धुलाई की बात करें तो वहां ट्रेन की धुलाई में एक घंटा लगता है। एक डिब्बे की धुलाई के लिए 300 लीटर पानी का इस्तेमाल होता है। इस तरह पूरी ट्रेन के लिए 7200 लीटर पानी चाहिए। वहीं मैन्युअल धुलाई में एक डिब्बे के लिए 1500 लीटर पानी का इस्तेमाल होता है। इससे पानी की बहुत बचत होगी।

उन्होंने बताया कि विदेशों में कारों की धुलाई के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल होता है। कमोबेश यह आइडिया वहीं से आया है। इससे मेन पावर की भी बचत होगी, क्योंकि परंपरागत तरीके से ट्रेन की धुलाई के लिए 5-6 लोगों की एक पूरी टीम लगती है जबकि यहां आधुनिक सेंसर और कैमरे लगे हुए हैं जो ट्रेन के ट्रैक पर आते ही अपने आप आप चालू हो जाते हैं। ऐसे में सुपरविजन के लिए एक ही आदमी चाहिए होता है।

Updated : 2018-07-18T06:40:57+05:30
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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