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वाराणसी में विपक्ष ने प्रधानमंत्री के जीतने की राह को किया आसान

वाराणसी में विपक्ष ने प्रधानमंत्री के जीतने की राह को किया आसान
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वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अपने लोकसभा क्षेत्र में रोड शो शुरू करने के कुछ घंटे पहले कांग्रेस पार्टी ने प्रियंका वाड्रा की बजाय बाहुबली नेता अजय राय को चुनाव मैदान में उतारने की घोषणा की। इसे मोदी की चुनावी जीत की राह को कांग्रेस का अवरोधमुक्त करने जैसा फैसला माना जा रहा है।

मोदी के खिलाफ विपक्ष का साझा उम्मीदवार सामने नहीं आ पाने के बाद अब चुनाव में एकमात्र आकर्षण और उत्सुकता यह शेष है कि प्रधानमंत्री की जीत का अंतर क्या होगा। वाराणसी संसदीय सीट पिछले तीन दशकों से भाजपा का गढ़ रही है। संसदीय क्षेत्र की पांचों विधानसभा सीटों, शहर दक्षिणी, शहर उत्तरी, कैंटोनमेंट, सेवापुरी और रोहनिया पर भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टी का कब्ज़ा है। मेयर भी भाजपा का है।

देश विदेश के पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों को इस बात का अफसोस जरूर होगा कि वे वाराणसी में 2014 जैसा चुनावी नजारा नहीं देख सकेंगे जो आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल के मैदान में कूदने से दिलचस्प हो गया था। पिछले चुनाव में मोदी 56.37 प्रतिशत मत हासिल कर केजरीवाल से तीन लाख 70 हजार से अधिक मतों से जीते थे। चुनाव परिणाम के बाद एक राजनीतिक विश्लेषक ने रोचक टिप्पणी की थी, 'भगवान विश्वनाथ की नगरी से जो जीतता वह प्रधानमंत्री बनता है और जो हारता है वह मुख्यमंत्री बन जाता है।' वाराणसी में हार के आठ महीने बाद केजरीवाल ने मोदी लहर को नकारते हुए दिल्ली में ऐतिहासिक विजय दर्ज कर मुख्यमंत्री पद हासिल किया था। वाराणसी में मोदी और केजरीवाल की चुनावी भिड़ंत के झटके देश की राजधानी में दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच पांच वर्षों तक तकरार के रूप में महसूस किए गए।

देश की सांस्कृतिक राजधानी माने जाने वाले इस नगर में कहने के लिए अब भाजपा के नरेन्द्र मोदी, कांग्रेस के अजय राय और सपा-बसपा गठबंधन की उम्मीदवार शालिनी यादव के बीच त्रिकोणीय संघर्ष है। इसे देश की राजनीति की अजीब परिपाटी ही कहा जाएगा कि कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय ने अपनी राजनीति की शुरुआत भाजपा कार्यकर्ता के रूप में की थी। वह जिले के कोलअसला विधानसभा क्षेत्र से तीन बार भाजपा टिकट पर जीते थे। इस सीट पर उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दिग्गज नेता ऊदल का वर्चस्व समाप्त किया था। स्वतंत्र भारत में सबसे अधिक बार विधानसभा चुनाव जीतने वालों की सूची में ऊदल का नाम शामिल है। अजय राय बाद में समाजवादी पार्टी से होते हुए कांग्रेस में शामिल हुए और वर्ष 2014 में मोदी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे। उनके पक्ष में राहुल गांधी ने रोड शो कर चुनाव माहौल बनाने की कोशिश की थी लेकिन वह दूसरे नंबर की दौड़ में केजरीवाल से बहुत पिछड़ गए थे। उस चुनाव में मोदी को 5,81,022, केजरीवाल को 2,09,238 और अजय राय को 75,614 वोट मिले थे।

इस बार सपा-बसपा गठबंधन की उम्मीदवार शालिनी यादव ने भी अपनी राजनीतिक पारी कांग्रेस पार्टी से शुरू की थी। वह जिले में कांग्रेस नीति के दिग्गज रहे श्यामलाल यादव की पुत्र वधु हैं। श्यामलाल यादव वर्ष 1984 में वाराणसी से संसद चुने गए थे। वह राज्यसभा के उपसभापति भी रहे। शालिनी ने राजनीति में दस्तक उस समय दी, जब वाराणसी में नगर प्रमुख की सीट महिला के लिए आरक्षित कर दी गई। उस समय शालिनी कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरी और भाजपा की उम्मीदवार मृदुला जायसवाल से हारने के बावजूद एक लाख 13 हजार वोट हासिल करने में सफल रहीं। यह मत संख्या अजय राय को लोकसभा चुनाव में मिले मतों से करीब 40 हजार अधिक है। वोटों का यह अंकगणित बताता है कि यदि कांग्रेस अपना उम्मीदवार उतारने की बजाय गठबंधन की उम्मीदवार को समर्थन देती तो मोदी के खिलाफ चुनौती खड़ी की जा सकती थी।

अजय राय की उम्मीदवारी में कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा ने भूमिका निभाई। इस बात की भी संभावना है कि उनके चुनाव अभियान के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका सघन प्रचार और रोड शो करेंगे। गठबंधन की उम्मीदवार का यादव और दलित वोट पर दावा है। मायावती और अखिलेश यादव की संयुक्त रैली से यह दावा जमीनी हकीकत बन सकता है।

मुस्लिम मतदाताओं के सामने विपक्ष के दो उम्मीदवार पसोपेश की स्थिति पैदा कर रहे हैं। यदि मोदी के खिलाफ एक विपक्षी उम्मीदवार होता तो मुस्लिम मतों का उसके पक्ष में पूरी तरह ध्रुवीकरण हो जाता। अब अंत तक यह सस्पेंस बना रहेगा कि मोदी को टक्कर देने की स्थिति में कौन है। पिछली बार मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण केजरीवाल के पक्ष में हुआ था। यही कारण है कि नगर के लिए अनजान होते हुए भी उन्होंने दो लाख से अधिक वोट हासिल किये थे। देश-विदेश से राजनीतिक और गैर राजनीतिक कार्यकर्ता उनके पक्ष में वाराणसी आ डटे थे। इस बार ऐसा होने के आसार नहीं हैं। चुनाव फीका और कम दिलचस्पी वाला होगा।

अब वाराणसी के चुनाव में दिलचस्पी का केवल एक दरवाजा खुला है। प्रचार के अंतिम दौर में यदि कांग्रेस और गठबंधन के बीच कोई अनौपचारिक सहमति बन जाए और कोई एक उम्मीदवार मैदान से हटने का ऐलान कर दे तो विपक्ष चुनौती खड़ा करने की हालत में होगा। ऐसे में मुस्लिम मतदाता भी बिना किसी दुविधा के मतदान कर सकेंगे। कांग्रेस की नजर वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव पर भी है और वह अपने दमदार नेता से मैदान छोड़ने के लिए नहीं कह सकती।

जहां तक मां गंगा के बुलावे पर काशी आए नरेंद्र मोदी का सवाल है तो उन्होंने मां से किया वादा निभाया है। उत्तरवाहिनी गंगा और इसके किनारे बसे दुनिया के सबसे प्राचीन जीवंत शहर को सजाने संवारने के लिए उन्होंने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी। शहर आज विश्व मानचित्र पर नई पहचान के साथ उभरा है। तभी जीर्ण-शीर्णता की ओर बढ़ रहे नगर में कायाकल्प होता दिखाई दे रहा है। उन्हें अपनी उपलब्धियां गिनाने की आवश्यकता नहीं है। नगरवासी और देश-विदेश से आने वाले पर्यटक व श्रद्धालु इसका प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हैं।

Updated : 25 April 2019 2:55 PM GMT
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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