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बोहरा समुदाय ने सुप्रीम कोर्ट में बच्चियों के खतना पर कुछ ऐसा...

बोहरा समुदाय ने सुप्रीम कोर्ट में बच्चियों के खतना पर कुछ ऐसा...

नई दिल्ली। बोहरा समुदाय की मुस्लिमों में औरतों के खतना के खिलाफ दायर याचिका पर मंगलवार को भी सुनवाई पूरी नहीं हो सकी। अब इस मामले पर अगली सुनवाई 6 सितंबर को होगी।

बोहरा समुदाय के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि बच्चियों के खतना को पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध कहना गलत है। अपराध गलत नीयत से होता है जबकि खतना धार्मिक रस्म है। पुरुषों के खतना की तरह महिलाओं के खतना का भी विरोध नहीं होना चाहिए ।

27 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पुरुषों का खतना वैज्ञानिक हो सकता है लेकिन महिलाओं के लिए ये मनोवैज्ञानिक रूप से बुरा प्रभाव डालता है । चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि संविधान कहता है आप किसी को शारीरिक नुकसान नहीं पहुंचा सकते , क्या पति के पक्ष में युवा लड़कियों को इससे गुजरना चाहिए । सुनवाई के दौरान जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि खतना एक 17 साल की लड़की को मानसिक रूप से भयभीत कर देता है। तब वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि अगर सुप्रीम कोर्ट ये सोचता है कि खतना लड़कियों को मानसिक रूप से भयभीत कर देता है तो पुरुषों के खतना पर आप क्या कहेंगे। उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट को इस बहस में नहीं पड़ना चाहिए, नहीं तो ये बहस नाक और कान छेदवाने तक पहुंच जाएगी।

20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं की गरिमा महत्वपूर्ण है । संविधान में भी महिलाओं और बच्चों को संरक्षण देने के लिए ज़रूरी व्यवस्था बनाने की बात कही गयी है । अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि खतना प्रथा महिलाओं के हित में है न कि उसके पति के फायदे के लिए । सिंघवी ने कहा था कि खतना का जिक्र 10वीं शताब्दी के एक पुस्तक में है। तब कोर्ट ने कहा था कि ये वर्षों पुराना है, इसका मतलब ये नहीं कि ये जरूरी है। सिंघवी ने कहा था कि बोहरा समुदाय की 99.99 फीसदी महिलाएं इस प्रथा का समर्थन करती हैं। सिंघवी ने इस जनहित याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना और इसे खारिज करने की मांग की।

31 जुलाई को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा था कि बोहरा मुस्लिम समुदाय की प्रथा को सती और देवदासी की तरह खत्म कर देना चाहिए। खतना से बच्चों को हुए नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती है। केंद्र की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि सती और देवदासी प्रथा भी खत्म की जा चुकी है। खतना को भी दुनिया के 42 देश प्रतिबंधित कर चुके हैं ।

अटार्नी जनरल ने कहा था कि इनकी आस्था खतना में हो सकती है लेकिन इन्हें संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही चलना होगा। अटार्नी जनरल ने कहा था ये प्रथा धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। ये महिला के जीवन और सेहत के मौलिक अधिकार का हनन है। केन्द्र ने कहा था कि वह प्रथा पर रोक लगाने की मांग का समर्थन करती है। बोहरा समुदाय की ओर से प्रथा का समर्थन करते हुए कहा गया था कि इसमे कुछ भी बर्बर नही है। ये प्रशिक्षित मिडवाइफ़ या डाक्टर करते हैं। प्रथा धर्म का अभिन्न हिस्सा है।

30 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि क्या महिलाएं पालतू मवेशी हैं। उनकी अपनी पहचान है। दरअसल जब सुप्रीम कोर्ट से ये कहा गया कि खतना करवाने वाली महिला पति की पसंदीदा होती हैं, तब चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने ये टिप्पणी की थी । सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में ये प्रथा महिलाओं की गरिमा को चोट पहुंचाने वाली लगती है । याचिकाकर्ता सुनीता तिवारी के वकील ने कहा था कि बोहरा मुस्लिम समुदाय इस व्यवस्था को धार्मिक नियम कहता है। बोहरा समुदाय का मानना है कि 7 साल की लड़की का खतना कर दिया जाना चाहिए। इससे वो शुद्ध हो जाती है। ऐसी औरतें पति की भी पसंदीदा होती हैं। तब जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि कि सवाल ये है कि कोई भी महिला के जननांग को क्यों छुए? वैसे भी धार्मिक नियमों के पालन का अधिकार इस सीमा से बंधा है कि नियम 'सामाजिक नैतिकता' और 'व्यक्तिगत स्वास्थ्य' को नुकसान पहुंचाने वाला न हो।

Updated : 2018-08-29T03:54:02+05:30
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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