वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत के निर्यात में जुलाई-सितंबर तिमाही में 8.5% की वृद्धि दर्ज, इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर बना बड़ी ताकत
दुनिया भर में जारी आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत के निर्यात मोर्चे से राहत भरी खबर सामने आई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 की जुलाई–सितंबर तिमाही में देश के निर्यात में 8.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह संकेत देता है कि वैश्विक दबावों के बीच भी भारतीय निर्यात ने अपनी पकड़ बनाए रखी है।
नीति आयोग के सीनियर लीड प्रवाकर साहू ने कहा कि इस तिमाही का सबसे अहम पहलू यह है कि निर्यात की रफ्तार मजबूत रही, जबकि आयात में अपेक्षाकृत सीमित बढ़ोतरी हुई। उनके अनुसार जुलाई–सितंबर अवधि में आयात वृद्धि करीब 4.5 प्रतिशत रही, जो व्यापार संतुलन के लिहाज से सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।यह जानकारी ‘ट्रेड वॉच क्वार्टरली’ के छठे संस्करण के जारी होने के मौके पर साझा की गई, जिसमें भारत के व्यापार रुझानों और उभरते अवसरों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात बना मजबूत स्तंभ
रिपोर्ट के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक्स अब भारत के निर्यात बास्केट में दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र बनकर उभरा है। मोबाइल फोन निर्यात लगभग 50 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच गया है, जो पिछले कुछ वर्षों में तेज प्रगति को दर्शाता है।
वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने की गुंजाइश
प्रवाकर साहू ने बताया कि वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार का आकार करीब 4.6 ट्रिलियन डॉलर है, जिसमें भारत की हिस्सेदारी फिलहाल लगभग 1 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि इसमें आगे बढ़ने की बड़ी संभावना मौजूद है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं।उन्होंने यह भी बताया कि इलेक्ट्रॉनिक्स व्यापार घाटा समय के साथ बढ़ा है। वर्ष 2016 में यह करीब 35 अरब डॉलर था, जो अब बढ़कर लगभग 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इसकी मुख्य वजह मजबूत घरेलू मांग और कंपोनेंट्स के आयात पर निर्भरता मानी जा रही है।
कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग पर जोर
केंद्रीय बजट में इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग के लिए 40,000 करोड़ रुपये के प्रावधान का जिक्र करते हुए साहू ने कहा कि अब नीति का फोकस केवल असेंबली तक सीमित नहीं है, बल्कि कंपोनेंट निर्माण को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे आयात निर्भरता घटाने और घरेलू मूल्य श्रृंखला मजबूत करने में मदद मिलेगी।
दक्षिण-दक्षिण व्यापार और एफटीए की भूमिका
साहू ने दक्षिण–दक्षिण व्यापार के बढ़ते महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि विकासशील देशों को भारत का निर्यात वर्ष 2005 में 56 अरब डॉलर था, जो अब बढ़कर लगभग 250 अरब डॉलर हो गया है। यह निर्यात बाजार के विविधीकरण का साफ संकेत है.मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) को लेकर उन्होंने कहा कि भारत ने अब तक करीब 8–9 एफटीए पर हस्ताक्षर किए हैं। इससे टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं में कमी आई है और खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों को बेहतर बाजार पहुंच मिली है।
श्रम भागीदारी और निर्यात की मजबूती
प्रवाकर साहू ने स्पष्ट किया कि यह किसी कमी का नहीं, बल्कि श्रम भागीदारी बढ़ाने का मुद्दा है। उनके अनुसार पिछले पांच वर्षों में श्रम बल की भागीदारी में वृद्धि के पर्याप्त संकेत मिले हैं। कुल मिलाकर भारत का निर्यात प्रदर्शन यह दिखाता है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था में लचीलापन और आगे बढ़ने की क्षमता बनी हुई है।