महाराष्ट्र के वर्धा जिले में देसी आम के पेड़ों और

वर्धा में देसी आम की अमराइयों को पुनर्जीवित करने की पहल, गुठलियों से तैयार होंगे हजारों पौधे

पद्मश्री मारुति चितमपल्ली के सपने को साकार करने की दिशा में शुरू हुआ अभिनव अभियान

वर्धा। महाराष्ट्र के वर्धा जिले में विलुप्त होती देसी आम की अमराइयों को फिर से जीवंत बनाने के लिए एक अभिनव और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा अभियान शुरू किया गया है। अरण्यऋषि पद्मश्री मारुति चितमपल्ली के सहयोगी कौशल मिश्र, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी बी.एस. मिरगे और एडवोकेट ताम्रध्वज बोरकर द्वारा पिछले वर्ष शुरू किया गया प्रयास अब जमीन पर आकार लेने लगा है।

कभी देसी आमों से भरा रहता था वर्धा

कौशल मिश्र के अनुसार एक समय वर्धा जिले के गांव-गांव में देसी आम के विशाल पेड़ और अमराइयां हुआ करती थीं। ग्रामीण संस्कृति में आम के फलों का पाहुनचार और पारंपरिक महत्व विशेष था। लेकिन समय के साथ संतरा उद्योग में पैकिंग के लिए लकड़ी की बढ़ती मांग के कारण बड़ी संख्या में आम के पेड़ काट दिए गए। परिणामस्वरूप जिले में देसी आम की अमराइयां लगभग समाप्त हो गईं और उनका गौरवशाली इतिहास धीरे-धीरे स्मृतियों तक सीमित हो गया।

गुठलियों से तैयार होंगे नए पौधे

इस विरासत को बचाने के उद्देश्य से जिले में बचे हुए देसी आम के पेड़ों से गुठलियां एकत्र करने का अभियान चलाया गया। इन गुठलियों से पौधे तैयार कर भविष्य में विभिन्न क्षेत्रों में रोपण किया जाएगा। कौशल मिश्र ने बताया कि इस संबंध में वर्धा के उपवन संरक्षक Harveer Singh के समक्ष प्रस्ताव रखा गया था, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। सहायक वन संरक्षक एम. आडे ने भी अभियान को हरसंभव सहयोग देने का आश्वासन दिया।

वन विभाग के अधिकारियों ने निभाई अहम भूमिका

इस अभियान को सफल बनाने में वन विभाग के कई अधिकारियों और कर्मचारियों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रमुख सहयोगी

  • नरेंद्र सावंत (पूर्व रेंजर, कारंजा)

  • अक्षय जाधव (वन रक्षक)

  • शिवाजी सावंत (पांजरा बंगला रेंज, तलेगांव)

  • एम. आडे

  • निलीमा मुणोत

  • सरपंच शेषराव आडे

वन रक्षक अक्षय जाधव ने गांव-गांव जाकर देसी आम की कैरियां और गुठलियां एकत्र कीं, जिन्हें बाद में कौशल मिश्र को सौंपा गया।

सामाजिक वनीकरण विभाग की नर्सरी में होगा रोपण

बरसात का मौसम शुरू होते ही एकत्रित गुठलियों को सामाजिक वनीकरण विभाग की नर्सरी में लगाया Aजाएगा। पौधों के पर्याप्त विकसित होने के बाद उन्हें वन क्षेत्रों, गांवों और सार्वजनिक स्थलों पर रोपित किया जाएगा। इस कार्य में सामाजिक वनीकरण विभाग के वन रक्षक शिवाजी सावंत और विजय सहित कई कर्मियों का सहयोग मिल रहा है।

पर्यावरण संरक्षण के साथ सांस्कृतिक विरासत बचाने का प्रयास

यह अभियान केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय जैव विविधता, पारंपरिक फलों की प्रजातियों और ग्रामीण सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कौशल मिश्र ने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में वर्धा जिले के वन क्षेत्रों और गांवों में फिर से देसी आम की अमराइयां दिखाई देंगी और पद्मश्री मारुति चितमपल्ली का सपना साकार होगा।