सतीश शर्मा

औरत की आज़ादी: क्या सिर्फ़ रोजगार ही मुक्ति है?

आज के समय में जब हम ‘महिला सशक्तिकरण’ की बात करते हैं, तो सबसे पहले जो छवि उभरती है वह है-एक शिक्षित, आत्मनिर्भर, और आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्री की। यह छवि हमें टीवी विज्ञापनों, सोशल मीडिया पोस्ट्स, और सरकारी अभियानों में बार-बार दिखाई जाती है। लेकिन क्या सच में यह ही आज़ादी है? क्या नौकरी करना या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना ही एक औरत की मुक्ति का पर्याय है?

आज़ादी का संकुचित अर्थ- समाज ने औरत की आज़ादी को इतना सीमित कर दिया है कि अब वह सिर्फ़ नौकरी करने तक ही सिमट कर रह गई है। एक महिला अगर ऑफिस जाती है, पैसा कमाती है, तो उसे ‘स्वतंत्र’ मान लिया जाता है। लेकिन क्या उसने अपने कपड़े पहनने की आज़ादी पाई? क्या वह अपनी मर्ज़ी से निर्णय ले सकती है? क्या वह बिना समाज के डर के जी सकती है?

यहाँ सवाल यह नहीं है कि नौकरी करना ग़लत है। बल्कि सवाल यह है कि क्या हम आज़ादी की पूरी परिभाषा को जी पा रहे हैं, या सिर्फ़ एक पहलू को पकड़ कर उसे ही सब कुछ मान बैठे हैं?

मुक्ति सिर्फ़ आर्थिक नहीं होती मुक्ति का अर्थ है- अपने विचारों को खुलकर व्यक्त कर पाना, अपनी पसंद-नापसंद के आधार पर निर्णय लेना, और सबसे ज़रूरी-ख़ुद को बिना किसी सामाजिक दबाव के स्वीकार करना। यदि एक महिला अपने घर के भीतर भी अपनी बात नहीं कह सकती, अगर वह हर कदम पर ‘लोग क्या कहेंगे’ से डरती है, तो क्या वह सच में मुक्त है?

एक शिक्षित महिला, जो एक बड़ी कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत है, लेकिन उसे अपने घर में सास-ससुर या पति के सामने अपनी इच्छा व्यक्त करने की हिम्मत नहीं होती-तो क्या वह आज़ाद मानी जाएगी?

सच्ची आज़ादी क्या है?

1 सोच की स्वतंत्रता: एक महिला को यह अधिकार होना चाहिए कि वह जो सोचती है, वह कह सके। चाहे वह जीवनसाथी चुनने की बात हो या धर्म, राजनीति, करियर से जुड़ा कोई भी विचार।

2 शारीरिक और मानसिक स्वतंत्रता: एक महिला का शरीर और मन सिर्फ़ उसका है। उसे यह अधिकार है कि वह अपने शरीर के साथ क्या करे, क्या पहने, कैसे जिए-इसका निर्णय वह स्वयं ले।

3 सामाजिक संरचनाओं से मुक्ति: पितृसत्ता, पारंपरिक मान्यताएँ और रूढ़ियाँ, जो महिला को हमेशा दोयम दर्जे का मानती हैं-उनसे मुक्ति पाना भी ज़रूरी है।

4 संवाद की आज़ादी: महिलाओं को घर और समाज दोनों जगह अपनी बात कहने का मंच मिलना चाहिए-बिना किसी डर या संकोच के।

आर्थिक आत्मनिर्भरता-एक रास्ता, मंज़िल नहीं...बेशक, रोजगार और शिक्षा औरत के सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन इन्हें आज़ादी का पर्याय मान लेना एक बड़ी भूल है। यह केवल एक रास्ता है, जिससे आगे बढ़कर वह अपनी असली आज़ादी की तलाश कर सकती है।

औरत की आज़ादी केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता में नहीं छुपी है। यह तो सिर्फ़ शुरुआत है। असली आज़ादी तब आएगी, जब हर महिला बिना भय, शर्म और दबाव के अपनी ज़िंदगी के हर पहलू में स्वतंत्र रूप से निर्णय ले पाएगी। जब वह सिर्फ़ ‘कार्यशील महिला’ नहीं बल्कि ‘संपूर्ण स्वतंत्र व्यक्तित्व’ के रूप में समाज में सम्मानित होगी।

(यह मेरे व्यक्तिगत विचार है!)

 सतीश शर्मा