साइबर अपराधः डिजिटल युग के परजीवी
लालजी जायसवाल
भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। यूपीआई, डिजिटल बैंकिंग, ऑनलाइन निवेश और ई-गवर्नेंस ने आम नागरिक के जीवन को सरल बनाया है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने साइबर अपराधियों को 'परजीवी' बताते हुए कहा कि वे निवेशकों की गाढ़ी कमाई को धोखे से हड़प लेते हैं और ऐसे अपराधियों के प्रति किसी प्रकार की नरमी समाज के हित में नहीं हो सकती। न्यायालय की यह टिप्पणी वर्तमान समय की गंभीर चुनौती को रेखांकित करती है।
साइबर अपराध अब केवल तकनीकी अपराध नहीं रह गए हैं, बल्कि यह आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक विश्वास और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न बन चुके हैं। आज फर्जी निवेश योजनाएं, डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन ट्रेडिंग फ्रॉड, यूपीआई धोखाधड़ी, फिशिंग और डीपफेक तकनीक के माध्यम से लाखों लोगों को ठगा जा रहा है।वर्तमान परिदृश्य में साइबर अपराध का स्वरूप और भी जटिल हो गया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीपफेक तकनीक ने धोखाधड़ी के नए रास्ते खोल दिए हैं। किसी व्यक्ति की आवाज और वीडियो की नकल कर परिवारजनों से पैसे मांगने जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं।
सरकार ने भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल तथा हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएं विकसित की हैं। परंतु अपराधियों की बदलती रणनीतियों के सामने संस्थागत क्षमता, तकनीकी दक्षता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और मजबूत करने की आवश्यकता है। डिजिटल भारत की सफलता तभी सुनिश्चित होगी, जब नागरिकों का डिजिटल व्यवस्था पर विश्वास सुरक्षित रहेगा।
साइबर ठगी की बढ़ती घटनाएं
साइबर अपराध केवल बैंक खाते से पैसे चोरी नहीं करता, बल्कि नागरिकों के मन से विश्वास भी चुरा लेता है। जब कोई व्यक्ति डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन निवेश या सरकारी पोर्टल पर भरोसा खोने लगता है, तब नुकसान केवल उस व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे डिजिटल भारत अभियान का होता है।सर्वोच्च न्यायालय द्वारा साइबर अपराधियों को 'परजीवी' कहना केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ का सटीक चित्रण है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत में साइबर और वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में तेजी आई है। भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में बैंक धोखाधड़ी के 10,114 मामले सामने आए, जिनमें 2,48,021 करोड़ रुपए की राशि शामिल थी।
इसके अलावा, 'डिजिटल अरेस्ट' के नाम पर करोड़ों रुपए की ठगी के बड़े मामले भी सामने आए हैं। बता दें कि वर्ष 2018-19 में डिजिटल बैंकिंग फ्रॉड 74 प्रतिशत बढ़कर 71,543 करोड़ रुपए का हो गया था। इससे एक वर्ष पहले, यानी वित्त वर्ष 2017-18 में यह आंकड़ा 41,168 करोड़ रुपए था।बैंकों ने 2018-19 में 6,801 धोखाधड़ी के मामलों की जानकारी दी, जबकि 2017-18 में यह संख्या 5,916 थी। वहीं, निजी क्षेत्र और विदेशी बैंकों की कुल बैंक धोखाधड़ी में हिस्सेदारी क्रमशः 30.7 प्रतिशत और 11.2 प्रतिशत रही।
पिछले 11 वित्तीय वर्षों में बैंक फ्रॉड के कुल 53,334 मामले सामने आए, जिनके माध्यम से 2.05 लाख करोड़ रुपए की धोखाधड़ी हुई। भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2022-23 में 30 हजार करोड़ रुपए से अधिक की बैंक धोखाधड़ी की शिकायतें दर्ज की गई थीं।पिछले एक दशक में, जून 2014 से मार्च 2023 तक, भारतीय बैंकों में 65,017 ठगी के मामले सामने आए, जिनमें 4.69 लाख करोड़ रुपए की धोखाधड़ी की जा चुकी थी।
अब 'डिजिटल अरेस्ट' भी साइबर अपराधियों का एक बड़ा हथियार बनकर सामने आ रहा है, जिसे साइबर ठगी में नवाचार के रूप में देखा जा सकता है।डिजिटल अरेस्ट में किसी व्यक्ति को ऑनलाइन माध्यम से डराया जाता है कि वह किसी सरकारी एजेंसी द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका है और उसे पेनाल्टी या जुर्माना देना होगा।मालूम हो कि ठगी करने के कई तरीके होते हैं। जैसे, किसी कूरियर का नाम लेकर यह कहना कि उसमें गलत सामान आया है, या यह दावा करना कि आपके बैंक खाते से ऐसे लेनदेन हुए हैं जो वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े हैं।
मनी लॉन्ड्रिंग, एनडीपीएस जैसे मामलों का भय दिखाकर अधिकतर उन लोगों को फंसाया जाता है, जो पढ़े-लिखे और कानून की जानकारी रखने वाले होते हैं। ऐसे लोगों को डराकर उनसे डिजिटल माध्यम से फिरौती जैसी रकम वसूली जाती है।जिन लोगों को ठगी का शिकार बनाया जाता है, उनके पैन कार्ड, आधार कार्ड समेत कई अन्य व्यक्तिगत डेटा को गैरकानूनी तरीके से इकट्ठा किया जाता है। इसके बाद उनके खातों से पैसे ट्रांसफर कराए जाते हैं। कई बार क्रिप्टोकरेंसी या गेमिंग ऐप के माध्यम से हवाला के जरिए धन विदेश भेज दिया जाता है।लोगों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी सरकारी एजेंसी ऑनलाइन माध्यम से पूछताछ नहीं करती।
साइबर ठगी से सुरक्षा की रणनीति
साइबर ठगी पर नियंत्रण के लिए अन्य देशों से सीखने की आवश्यकता है। गौरतलब है कि सिंगापुर ने एक विशिष्ट ढांचा लागू किया है, जिसके तहत फिशिंग और ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामलों में बैंक और टेलीकॉम कंपनियों की जवाबदेही तय की जाती है। यदि वे सुरक्षा मानकों में चूक करते हैं, तो उन्हें पीड़ित को मुआवजा देना पड़ता है।यूके में बैंकों को संदिग्ध धोखाधड़ी वाले लेनदेन में देरी करने का कानूनी अधिकार दिया गया है। इसके तहत वे धन निकासी को 72 घंटे तक रोक सकते हैं, ताकि धोखाधड़ी की जांच की जा सके।ध्यातव्य है कि यूरोपीय देशों और अमेरिका में धोखाधड़ी का पता लगाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग का व्यापक उपयोग हो रहा है। ये प्रणालियां उपयोगकर्ता के व्यवहार, जैसे टाइप करने की गति, माउस की गतिविधि और नेविगेशन पैटर्न का विश्लेषण करती हैं। असामान्य व्यवहार दिखाई देने पर यह तुरंत अलर्ट जारी कर देती हैं।
भारत में भी ऐसी नवाचार आधारित व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि साइबर ठगी की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सके।