अंधी प्रतिस्पर्धा : व्यस्तता और सफलता के बीच बचपन के सवाल…
आज जब मैं अपने आसपास के बच्चों को देखता हूं तो लगता है कि उनके पास पहले से कहीं अधिक सुविधाएं और अवसर हैं, लेकिन समय, स्वतंत्रता और बचपन लगातार कम होता जा रहा है। सवाल यह है कि क्या हम बच्चों को जीवन के लिए तैयार कर रहे हैं या सिर्फ उपलब्धियों की दौड़ के लिए?
आज की छुट्टियां परिवार, संस्कार और अनुभवों की खुली पाठशाला बनने के बजाय समर कैंप, कोडिंग, रोबोटिक्स, स्विमिंग, ट्यूशन और पर्सनैलिटी डेवलपमेंट के अंतहीन टाइम-टेबल में सिमटती जा रही हैं। आठ-दस साल का बच्चा सुबह से शाम तक एक क्लास से दूसरी क्लास के बीच दौड़ रहा है, मानो वह किसी भविष्य की कॉर्पोरेट परियोजना की तैयारी कर रहा हो। नतीजा यह है कि रिपोर्ट कार्ड, रैंक और प्रमाणपत्र तो बढ़ रहे हैं, लेकिन रिश्तों की समझ, जीवन कौशल, जिम्मेदारी, रचनात्मकता और मानसिक संतुलन पीछे छूटते जा रहे हैं। सर्वांगीण विकास आवश्यक है, लेकिन उसकी कीमत बचपन नहीं हो सकती।
हमने विकास की परिभाषा को इतना संकुचित कर दिया है कि बच्चा हर समय पढ़ाई, प्रतियोगी तैयारी और नई-नई स्किल्स सीखने में लगा रहता है। यदि किसी बच्चे का पूरा दिन वयस्कों की तरह कैलेंडर और टाइम-टेबल से संचालित होने लगे, तो फिर बचपन और नौकरी के बीच अंतर क्या रह जाएगा?
एनसीईआरटी के एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 81 प्रतिशत छात्र परीक्षा और परिणामों से जुड़ी चिंता और तनाव का सामना करते हैं। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक सामाजिक चेतावनी है। विडंबना यह है कि कई बार बच्चे अपने सपनों से नहीं, बल्कि माता-पिता की अधूरी महत्वाकांक्षाओं से संचालित होते हैं। “जो मैं नहीं बन सका, वह मेरा बेटा बनेगा” जैसी सोच प्रेम से अधिक दबाव पैदा करती है।
हाल ही में मैंने अपने ही परिवार में इसका एक उदाहरण देखा। मेरी बेटी ध्रुवी अपनी छह साल की बेटी अन्वी को कई एक्स्ट्रा करिकुलर क्लासेस में भेज रही थी। मैंने उससे सहजता से कहा कि बच्चों पर इतनी छोटी उम्र में इतना दबाव डालना शायद ठीक नहीं है। इस पर उसने तुरंत जवाब दिया, "अरे पापा, मेरे फ्रेंड्स के बच्चों को देखिए, वे कितनी-कितनी क्लासेस में जाते हैं। अन्वी की उम्र के बच्चे डांस, स्विमिंग, म्यूजिक, एबेकस और न जाने क्या-क्या सीख रहे हैं।" उसकी बात सुनकर मुझे लगा कि समस्या बच्चों की नहीं, हमारी सोच की है। हम अपने बच्चों को उनकी रुचि और क्षमता से कम, और अपने फ्रेंड्स के बच्चों से ज्यादा तौलने लगे हैं। यही तुलना धीरे-धीरे बचपन को एक प्रतियोगिता में बदल देती है।
आज बच्चे की दुनिया या तो मोबाइल स्क्रीन की आभासी चमक में कैद है या किसी सख्त शेड्यूल के साइलेंट ज़ोन में। खाली बैठकर आसमान को निहारना, बारिश की बूंदों को महसूस करना और दोस्तों के साथ बिना वजह ठहाके लगाना दुर्लभ होता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और लैंसेट की रिपोर्टें बताती हैं कि किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। भारत में भी लगभग 10 से 12 प्रतिशत किशोर किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या का सामना कर रहे हैं। स्क्रीन की कृत्रिम रोशनी ने बच्चों से आसमान के तारों को देखने का कौतूहल और सुकून दोनों छीन लिया है।
भविष्य के लिए क्या है जरूरी?
सबसे बड़ी चिंता यह है कि हम बच्चों को सफलता का जश्न मनाना तो सिखा रहे हैं, लेकिन असफलता को स्वीकारना और उससे सीखना नहीं। जबकि जीवन में आगे बढ़ने के लिए हर बार जीतना नहीं, बल्कि हारकर फिर उठ खड़ा होना अधिक महत्वपूर्ण है। यदि हमें वास्तव में एक मजबूत, संस्कारी और जिम्मेदार पीढ़ी का निर्माण करना है, तो हमें अपनी सोच बदलनी होगी। अपने आप से पूछिये…
क्या हमारा बच्चा किसी रोते हुए दोस्त को सांत्वना दे सकता है? क्या उसमें बड़ों के प्रति आदर, छोटों के प्रति स्नेह और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता है? यूनिसेफ भी मानता है कि बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए केवल बौद्धिक क्षमता नहीं, बल्कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सामाजिक कौशल समान रूप से आवश्यक हैं
बच्चों को केवल सुविधाओं के घेरे में मत रखिए। उन्हें घर के छोटे-छोटे कामों में शामिल कीजिए। खेल के मैदानों तक पहुँचने दीजिए। उन्हें हारने, सीखने और दोबारा खड़े होने का अवसर दीजिए। आने वाला समय केवल जानकारी रखने वालों का नहीं, बल्कि नए विचार पैदा करने वालों का होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जानकारी दे सकती है, लेकिन संवेदनशीलता, कल्पनाशक्ति, नैतिकता और मानवीय रिश्तों की समझ केवल जीवन के अनुभव ही दे सकते हैं।
सवाल यह कि जब आज की यह पीढ़ी बड़ी होकर पीछे मुड़कर देखेगी, तो उन्हें अपने बचपन की कौन-सी याद सबसे अधिक सुकून देगी दोस्तों के साथ धूल में खेला गया बेफिक्र क्रिकेट, नानी के घर की आज़ादी और शरारतें, परिवार के साथ बिताए गए वे अनमोल दिन... या फिर एक क्लास से दूसरी क्लास के बीच हांफती-भागती, टाइम-टेबल में बंधी उनकी दिनचर्या?
उत्तर आपको देना है। क्योंकि आपका आज का फैसला ही बच्चों का कल तय करेगा।
प्रवीण कक्कड़