प्रेम का अंत हत्या पर क्यों हो रहा है?

संबंधों की हत्या का दौर : आखिर भारतीय समाज को क्या हो गया है?

 अनुराग तागड़े

पुणे के लोहगढ़ किले में मंगेतर की कथित हत्या का मामला हो, इंदौर में पति की हत्या का चर्चित प्रकरण हो, बेंगलुरु, मेरठ, दिल्ली, जयपुर अथवा देश के अन्य शहरों से समय-समय पर सामने आने वाली ऐसी घटनाएँ हों एक भयावह प्रश्न बार-बार हमारे सामने खड़ा हो रहा है। आखिर ऐसा क्या बदल गया है कि जिन संबंधों का आधार प्रेम, विश्वास, त्याग और समर्पण हुआ करता था, वही संबंध अब प्रतिशोध, छल, हिंसा और हत्या में बदल रहे हैं?क्या यह केवल कुछ आपराधिक घटनाएँ हैं अथवा भारतीय समाज किसी गहरे सांस्कृतिक और भावनात्मक संकट से गुजर रहा है?

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की वर्ष 2024 की रिपोर्ट इस चिंता को और गंभीर बना देती है। देश में कुल अपराधों में 6 प्रतिशत तथा हत्या के मामलों में 2.4 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई है, लेकिन परिवार और संबंधों के भीतर बढ़ती मानसिक अशांति अलग ही कहानी कहती है। वर्ष 2024 में भारत में 1,70,746 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें सबसे बड़ा कारण "पारिवारिक समस्याएँ" रहीं, जो कुल आत्महत्याओं के 33.5 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार थीं। अर्थात लगभग हर तीसरी आत्महत्या का कारण परिवार के भीतर का तनाव था।और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि विवाह और प्रेम संबंधों से जुड़े विवाद आज भी आत्महत्या के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। NCRB की रिपोर्ट बताती है कि परिवार और वैवाहिक संबंधों से उत्पन्न तनाव भारतीय समाज के मानसिक स्वास्थ्य पर सबसे बड़ा बोझ बन चुके हैं।

महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के 4,41,534 मामले वर्ष 2024 में दर्ज हुए। यद्यपि कुल संख्या में मामूली कमी आई है, किंतु "पति अथवा उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता" अब भी महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की सबसे बड़ी श्रेणी बनी हुई है। यह बताता है कि भारतीय परिवारों के भीतर संबंधों का संकट सतह से कहीं अधिक गहरा है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आर्थिक रूप से सशक्त होते भारत में भावनात्मक रूप से इतना विघटन क्यों बढ़ रहा है?

भारतीय परिवार की बदलती संरचना

पिछले तीन दशकों में भारत ने आर्थिक उदारीकरण, तकनीकी क्रांति और शहरीकरण का अभूतपूर्व दौर देखा। करोड़ों लोग गरीबी से बाहर आए, जीवन स्तर सुधरा, लेकिन इसी दौरान संयुक्त परिवारों का विघटन भी तेजी से हुआ। पहले जहाँ परिवार संकटों को सामूहिक रूप से संभाल लेते थे, वहीं आज अधिकांश युवा दंपत्ति भावनात्मक संघर्षों का सामना अकेले कर रहे हैं।संयुक्त परिवार से एकल परिवार और अब "व्यक्तिकेंद्रित जीवनशैली" की ओर बढ़ते समाज में संवाद लगातार कम हुआ है। परिवार एक भावनात्मक संस्था के बजाय एक प्रशासनिक व्यवस्था बनता जा रहा है, जहाँ साथ रहने वाले लोग भी एक-दूसरे के जीवन से अनभिज्ञ रहते हैं।

प्रेम नहीं, उपभोग का संबंध

भारतीय संस्कृति में विवाह एक संस्कार था। आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने उसे धीरे-धीरे सुविधा आधारित अनुबंध में बदल दिया है।आज संबंधों को निभाने से अधिक उन्हें "उपयोग" करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। जब तक संबंध अपेक्षाएँ पूरी करता है, वह स्वीकार्य है; जैसे ही त्याग, धैर्य या समझौते की आवश्यकता पड़ती है, संबंध बोझ लगने लगता है।इसी मानसिकता ने प्रेम को प्रतिबद्धता से अलग कर दिया है।

सोशल मीडिया और आभासी जीवन

डिजिटल युग ने संवाद बढ़ाया है, लेकिन आत्मीयता घटाई है। सोशल मीडिया पर दिखने वाला कृत्रिम वैभव, परिपूर्ण रिश्तों का प्रदर्शन और निरंतर तुलना लोगों में असंतोष, ईर्ष्या और अवास्तविक अपेक्षाएँ पैदा कर रहे हैं। वास्तविक जीवन का सामान्य संघर्ष अब लोगों को असहनीय प्रतीत होने लगा है।

मानसिक स्वास्थ्य का मौन विस्फोट

NCRB के आंकड़े बताते हैं कि परिवार और संबंधों से जुड़े तनाव आज आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण हैं। यह केवल अपराध का विषय नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य का राष्ट्रीय संकट है।दुर्भाग्य यह है कि भारत में लोग हृदय रोग का उपचार तो करवा लेते हैं, लेकिन टूटते हुए मन और बिखरते संबंधों का उपचार नहीं करवाते।

समाधान कानून नहीं, संस्कार भी

हर हत्या के बाद कठोर दंड की मांग होती है और होनी भी चाहिए। लेकिन समाज केवल दंड से नहीं सुधरता।हमें परिवारों में संवाद लौटाना होगा।विद्यालयों में मूल्य शिक्षा को पुनर्जीवित करना होगा।विवाह को केवल सामाजिक आयोजन नहीं, जीवनपर्यंत उत्तरदायित्व के रूप में समझाना होगा।बच्चों को सफलता के साथ संवेदनशीलता भी सिखानी होगी।क्योंकि किसी व्यक्ति की हत्या होने से पहले अक्सर विश्वास की हत्या होती है, संवाद की हत्या होती है, संवेदनाओं की हत्या होती है।और जब किसी समाज में संबंध मरने लगते हैं, तब सभ्यता का पतन आरंभ हो जाता है।आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती है परिवार, विश्वास और संबंधों को बचाए रखना।यदि हम इसमें असफल रहे, तो अपराधों के आंकड़े भले घट जाएँ, लेकिन समाज भीतर से खोखला होता जाएगा।