भारत ने अपनी विदेश नीति में बदलाव कर, वैश्विक मंच

आत्मविश्वासी भारत: वैश्विक मंच पर नई शक्ति का उदय

प्रतिभा झा 

इक्कीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में भारत जिस आत्मविश्वास के साथ विश्व मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है, वह केवल आर्थिक प्रगति या सैन्य शक्ति का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक सशक्त राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक आत्मबोध और स्पष्ट वैचारिक दिशा का परिचायक है। लंबे समय तक भारत की विदेश नीति पर एक प्रकार की हिचकिचाहट और संतुलन साधने की प्रवृत्ति हावी रही, किंतु आज का भारत अपने हितों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हुए निर्णायक कदम उठाने में विश्वास रखता है। यही परिवर्तन उसे वैश्विक राजनीति में एक उभरती हुई शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है और यह संकेत दे रहा है कि भारत अब केवल परिस्थितियों का अनुयायी नहीं, बल्कि उन्हें दिशा देने वाला राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है।

भारत ने हाल के वर्षों में यह सिद्ध किया है कि वह अब केवल प्रतिक्रिया देने वाला राष्ट्र नहीं, बल्कि पहल करने वाला नेतृत्वकारी देश है। वैश्विक संकटों के समय भारत की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है। महामारी के दौरान अनेक देशों को औषधि और टीके उपलब्ध कराना केवल मानवीय सहायता नहीं था, बल्कि यह भारत की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना का सशक्त उदाहरण भी था। इस नीति ने भारत की छवि को एक उत्तरदायी, विश्वसनीय और संवेदनशील राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। यह पहली बार था जब दुनिया ने भारत को केवल एक विकासशील देश के रूप में नहीं, बल्कि एक समाधान प्रस्तुत करने वाले देश के रूप में देखा।

विदेश नीति के क्षेत्र में भारत ने संतुलन और स्वाभिमान का अद्भुत संयोजन प्रस्तुत किया है। एक ओर वह शक्तिशाली पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को सुदृढ़ कर रहा है, तो दूसरी ओर पारंपरिक मित्र देशों के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को भी बनाए हुए है। यह संतुलन केवल कूटनीतिक चतुराई नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखने की स्पष्ट नीति का परिणाम है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी एक गुट का अनुयायी नहीं, बल्कि अपने मार्ग का स्वयं निर्धारण करने वाला राष्ट्र है। यही स्वतंत्रता उसकी वास्तविक शक्ति का आधार है।

इसी प्रकार चीन के साथ संबंधों में भी भारत ने एक नई दृढ़ता का परिचय दिया है। सीमा विवादों के संदर्भ में भारत ने जिस प्रकार से अपनी सैन्य और कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन किया है, वह यह दर्शाता है कि अब राष्ट्र अपनी संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा के लिए किसी भी स्तर पर समझौता करने को तैयार नहीं है। यह केवल एक सामरिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संदेश है कि भारत अपनी भौगोलिक अखंडता और राष्ट्रीय सम्मान के प्रति पूर्णतः सजग और प्रतिबद्ध है। यह नीति देश के भीतर आत्मविश्वास को सुदृढ़ करती है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी यह संकेत देती है कि भारत अब अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम और संकल्पित है। भारत की विदेश नीति में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन उसके पड़ोसी देशों के प्रति दृष्टिकोण में दिखाई देता है। पहले जहां उदारता और सहिष्णुता को ही प्राथमिकता दी जाती थी, वहीं अब भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि पड़ोसी संबंध आपसी सम्मान, पारस्परिक हित और सुरक्षा के आधार पर ही टिके रह सकते हैं। आतंकवाद और सीमा पार से होने वाली गतिविधियों के प्रति भारत की “शून्य सहिष्णुता” की नीति ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। यह दृढ़ता ही एक आत्मविश्वासी राष्ट्र की पहचान होती है।

वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती सक्रियता भी उसके उभार का एक महत्वपूर्ण संकेत है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत की भूमिका लगातार सशक्त हो रही है। जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक आर्थिक स्थिरता जैसे मुद्दों पर भारत ने न केवल अपनी बात प्रभावशाली ढंग से रखी है, बल्कि ठोस पहल भी की है। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसे प्रयास भारत की दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता के उदाहरण हैं। भारत ने यह सिद्ध किया है कि वह केवल अपने हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक कल्याण की दिशा में भी सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तत्पर है।

इसके साथ ही, भारत की सांस्कृतिक शक्ति भी उसकी विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरी है। योग, आयुर्वेद और भारतीय जीवन दर्शन की वैश्विक स्वीकार्यता ने भारत को एक सॉफ्ट पावर के रूप में सशक्त किया है। यह सांस्कृतिक प्रभाव केवल छवि निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के प्रति विश्व में एक सकारात्मक और स्थायी धारणा का निर्माण कर रहा है। एक ऐसा राष्ट्र, जिसकी जड़ें इतनी गहरी और व्यापक हों, वह केवल भौतिक शक्ति के आधार पर नहीं, बल्कि अपने सांस्कृतिक प्रभाव के माध्यम से भी विश्व को प्रभावित करता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि भारत ने अपनी विदेश नीति को केवल सरकारों के स्तर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रवासी भारतीयों को भी इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाया है। विश्व के विभिन्न देशों में बसे भारतीय आज भारत के सांस्कृतिक, आर्थिक और बौद्धिक दूत के रूप में कार्य कर रहे हैं। उनकी उपलब्धियां और योगदान भारत की वैश्विक छवि को सुदृढ़ कर रहे हैं। यह प्रवासी नेटवर्क भारत की कूटनीतिक शक्ति को एक नया आयाम प्रदान करता है।

आर्थिक क्षेत्र में भारत की प्रगति भी उसके आत्मविश्वास का एक महत्वपूर्ण आधार है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, डिजिटल क्रांति और नवाचार की दिशा में बढ़ते कदम भारत को एक नई पहचान दे रहे हैं। स्टार्टअप संस्कृति, तकनीकी विकास और बुनियादी ढांचे में सुधार ने भारत को एक उभरते हुए आर्थिक केंद्र के रूप में स्थापित किया है। यह आर्थिक सशक्तता ही उसे वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ खड़े होने की शक्ति प्रदान करती है। हालांकि, इस उभरती शक्ति के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। वैश्विक राजनीति में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है और विभिन्न शक्तियां अपने-अपने हितों को साधने में लगी हैं। भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक असमानताएं और तकनीकी प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां भारत के सामने उपस्थित हैं। ऐसे में भारत को अपनी नीतियों में निरंतरता, संतुलन और दृढ़ता बनाए रखनी होगी। केवल बाहरी सफलता पर्याप्त नहीं है, बल्कि आंतरिक सुदृढ़ता भी उतनी ही आवश्यक है। भारत को अपने सामाजिक और आर्थिक ढांचे को और अधिक मजबूत बनाना होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक समरसता जैसे क्षेत्रों में सुधार उसकी दीर्घकालिक शक्ति का आधार बनेंगे। एक सशक्त और संगठित समाज ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण करता है। यदि आंतरिक संरचना मजबूत होगी, तो बाहरी चुनौतियों का सामना करना भी आसान होगा। इसके अतिरिक्त, भारत को तकनीकी क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष अनुसंधान और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में नेतृत्व प्राप्त करना भविष्य की आवश्यकता है। ये सभी क्षेत्र आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन को निर्धारित करेंगे। यदि भारत इन क्षेत्रों में अग्रणी बनता है, तो उसका आत्मविश्वास और प्रभाव दोनों ही बढ़ेंगे।

अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत आज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वह केवल एक देश के विकास की कहानी नहीं है, बल्कि एक सभ्यता के पुनर्जागरण की गाथा है। यह वह क्षण है, जब इतिहास और वर्तमान एक-दूसरे से मिलकर भविष्य की नई दिशा तय कर रहे हैं। आत्मविश्वास, स्वाभिमान और स्पष्ट नीति के आधार पर भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह न केवल अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम है, बल्कि विश्व को दिशा देने की क्षमता भी रखता है।

यदि यही गति, दृष्टि और संकल्प बना रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत वैश्विक मंच पर एक निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित होगा। यह केवल एक आकांक्षा नहीं, बल्कि एक साकार होती हुई वास्तविकता है। यह समय है आत्मविश्वास को बनाए रखने का, अपनी नीतियों पर अडिग रहने का और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का। यही आत्मविश्वासी भारत की पहचान है, और यही उसकी वैश्विक भूमिका का आधार भी। प्रतिभा झा, शोधार्थी, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय