अनिश्चितता ही अस्तित्व की स्वाभाविक अवस्था है। संभावना उसी शून्य में जन्म लेती है
जब सब कुछ अनिश्चित हो जाता है, तब इंसान के पास खोने को कुछ नहीं बचता, और यहीं से संभावनाओं का जन्म होता है। अनिश्चितता डराती ज़रूर है, लेकिन यही वो खाली कैनवास है जिस पर ज़िंदगी अपने सबसे खूबसूरत रंग भरती है। जब रास्ते साफ़ नहीं होते, मंज़िलें तय नहीं होतीं, तब दिल अपनी ही धड़कनों को कम्पास बनाकर, साथी बनाकर चलना सीखता है। यही वो पल होते हैं जहाँ “क्या होगा” का डर टूटता है और “जो होगा, देखा जाएगा” की हिम्मत पैदा होती है। अनिश्चितता में एक अजीब-सी आज़ादी छुपी होती है। कोई तय नियम नहीं, कोई पक्का नतीजा नहीं, बस संभावना ही संभावना। यहीं इंसान वो बन पाता है जो वो सच में है, न कि जो उससे बनने की उम्मीद की जाती है। जब भविष्य धुंधला होता है, तब सपने और भी ज़्यादा चमकने लगते हैं, क्योंकि उन्हें बाँधने वाली कोई दीवार नहीं होती। अनिश्चितता हमें सिखाती है कि भरोसा हालात पर नहीं, खुद पर किया जाए।
और शायद इसीलिए कहा गया है, जब सब कुछ अनिश्चित हो, तब सब कुछ संभव है। क्योंकि चमत्कार तय रास्तों पर नहीं होते, वो अनजाने मोड़ों पर मिलते हैं। वो वहीं जन्म लेते हैं जहाँ हम डरते हुए भी एक कदम आगे बढ़ा देते हैं। अनिश्चितता अंत नहीं होती, वो शुरुआत होती है, एक ऐसी शुरुआत जहाँ दिल कहता है, “अगर यहाँ तक आए हैं, तो थोड़ा और सही।”
▪️सतीश शर्मा