रेडियो दिवस के अवसर पर आकाशवाणी ग्वालियर की वरिष्ठ उद्घोषक तूलिका शर्मा से वार्ता
विश्व रेडियो दिवस 2026 के अवसर पर आकाशवाणी ग्वालियर की वरिष्ठ उद्घोषक तूलिका शर्मा से खास बातचीत की आकाशवाणी उद्घोषक ,शोध छात्रा व्याप्ति उमड़ेकर ने जिसमें उन्होंने रेडियो से जुड़े अनुभव, श्रोताओं से जुड़ाव और लाइव प्रसारण के अनुभवों पर अपने विचार साझा किए.
प्रश्न: एक उद्घोषक के लिए उसकी आवाज ही उसका चेहरा होता है, ऐसे में श्रोताओं से जुड़ना कितना चुनौतीपूर्ण है ?
उत्तर: रेडियो श्रव्य माध्यम है ऐसे में संप्रेषण का पूरा दायित्व केवल हमारी आवाज़ पर होता है। आपकी आवाज़ ही आपका परिचय बन जाती है या यूं कहिए कि आपका चेहरा बन जाती है। श्रोता भी अपने पसंदीदा कार्यक्रम प्रस्तोता को उसकी आवाज़ से तुरंत पहचान जाते हैं। पत्रों के माध्यम से भी उनका स्नेह हमे प्राप्त होता है, पोस्टकार्ड में ना सिर्फ श्रोतासाठी हमें अपने पसंदीदा फिल्मी गीत को सुनने की फरमाइश भेजते हैं, बल्कि उसके साथ ही अपने पसंदीदा कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता के नाम उनके कार्य की तारीफ करते हुए व्यक्तिगत पत्र भी भेजते है। निश्चित रूप से सराहना करते हुए ये पत्र एक प्रस्तुतकर्ता के लिए, प्रमाण पत्र स्वरूप ही है की श्रोता साथी उनसे जुड़ पा रहे है।
प्रश्न : ऐसा कोई व्यक्तिगत पत्र जिसके विषय में आप हमे बताना चाहे।
उत्तर: जी बिलकुल, श्रोताओं का अपार स्नेह हमें पत्रों के माध्यम से प्राप्त होता है और ये पत्र एक साथ एक स्थान पर रखे जाते हैं। जिस भी प्रस्तुतकर्ता की ड्यूटी होती है वो उन पत्रों को उठाता है, श्रोताओं के फरमाइशी गीत सुनाता है और दोबारा रख देता है। ऐसे में इन पत्रों के बीच व्यक्तिगत पत्र कई बार जिस प्रस्तोता के लिए लिखे जाते हैं, उस तक नहीं पहुंच पाते। ऐसा ही एक वाक़िआ मुझे याद आता है कि एक पत्र मेरे लिए भी आया था, जो मेरी सहयोगी को प्राप्त हुआ, और उनके द्वारा मुझे सौंपा गया। बिलकुल महीन कड़ी हुई सुंदर लेखनी में लिखा गया पत्र था। एक विशेष कार्यक्रम जिसे मैं प्रस्तुत करती थी, उसकी तारीफ उन्होंने खुले शब्दों में की थी। मेरे लिए वो पत्र निश्चित रूप से एक उपलब्धि के स्वरूप है।
प्रश्न : आकाशवाणी से प्रसारित कार्यक्रम, एक उद्घोषक की पहचान बन जाते हैं, ऐसे कुछ कार्यक्रम जिनका जिक्र आप करना चाहती हो।
उत्तर : रोज़ाना का सजीव फिल्म संगीत का कार्यक्रम हो जहां हम अपना नाम बताते हैं या जानकारीपरक कार्यक्रम जैसे अभी गुड मॉर्निंग ग्वालियर आता है या पहले आशकिरण आता था ये सभी कार्यक्रम उद्घोषक की पहचान बनाते हैं। उद्घोषक और श्रोताओं के बीच फोन इन कार्यक्रम भी सेतु के समान अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, एक लंबे वक्त से कार्यक्रम "सेहत की बात तरानों के साथ" ने मुझे श्रोताओं से बहुत स्नेह दिलाया है। वहीं एक समय बॉलीवुड क्लासिक और गॉसिप पर आधारित कार्यक्रम "बॉलीवुड के रंग तूलिका के संग" ने मुझे एक विशेष पहचान दिलाई, श्रोताओं के स्नेह से ये कार्यक्रम काफी लंबे अरसे तक चला था, जिसे मैने ही डिजाइन किया था। चूंकी सिनेमा लोगो को आकर्षित करता है ऐसे में कुछ ही समय में ये कार्यक्रम हिट कार्यक्रमों की श्रेणी में शामिल हुआ।
प्रश्न : आकाशवाणी की सभाएं सजीव रूप से प्रसारित होती हैं, विभिन्न सजीव कार्यक्रम भी प्रसारित होते हैं, ऐसे में सजीव कार्यक्रम के दौरान क्या चुनौतियां उद्घोषक के समक्ष रहती हैं ?
उत्तर : सन् 1992 से नैमित्तिक उद्घोषक और फिर स्थाई उद्घोषक के रूप में मैं आकाशवाणी से जुड़ी हूं।सजीव प्रसारण का एक लंबा अनुभव है अभी तक। लेकिन मैं आज भी हर दिन एक नया अनुभव और चुनौती से परिपूर्ण समझती हूं। सजीव प्रसारण के दौरान कई बार समस्याएं भी हमारे समक्ष आती हैं और उन समस्याओं का समाधान भी त्वरित ही करना होता है। 6 से 7 घंटे का सजीव कार्यक्रम निर्बाध निर्विरोध पूर्ण करने के लिए आपको निश्चित रूप से अलर्ट भी रहना पड़ता है। यही अलर्टनेस यही नित नवीन चुनौतियां रोज़ हमे कल से बेहतर भी बनाती हैं।
प्रश्न: एक उद्घोषक के लिए उच्चारण की शुद्धता और भाषा पर पकड़ कितनी आवश्यक है ?
उत्तर: उद्घोषक को स्थानीय कला, संस्कृति और भाषा का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। उद्घोषक के चयन के लिए एक अतिरिक्त योग्यता को देखा जाता है, जो कि स्वरपरीक्षण के द्वारा निर्धारित होती है। स्वरपरीक्षण यानी आपकी आवाज़ कैसी है, उसका उतार चढ़ाव कितना है और साथ ही आपका उच्चारण कैसा है। आकाशवाणी से उच्चारित शब्द उच्चारण का सटीक पैमाना माना जाता है ऐसे में एक उद्घोषक का ये दायित्व हो जाता है कि वो शब्दों को सही उच्चारित करे। आज भी मैं लोगों को सुनती हूं, अलग अलग भाषाओं में अलग अलग शब्द कैसे उच्चारित होता है ये सीखती हूं। सीखना अनवरत क्रम है जो आज भी जारी है।
प्रश्न: जो युवा उद्घोषक बनना चाहते हैं, उन्हें आप क्या सुझाव देना चाहेंगी ?
उत्तर: बोलने की कला या स्वयं को अभिव्यक्त करने की कला रेडियो के लिए तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही किसी भी क्षेत्र से आप क्यों ना जुड़े हों, ये कला आपको भीड़ से अलग दिखाती है। एक अच्छी कम्युनिकेशन स्किल्स का होना प्रत्येक क्षेत्र में सफलता का परिचायक है।