भारतीय राजनीति में भाषा का स्तर लगातार गिरता दिख र

राजनीति में शाब्दिक व्यभिचार की हदें..!

जयराम शुक्ल

लो कप्रिय व्यंगकवि माणिक वर्मा की एक कविता की अर्धीली है.इन नीचाइयों की अजब ऊँचाइयाँ। पैमाना सफलता या उपलब्धि भर नापने का नहीं होता, उसके विलोम को भी आंकने का होता है। बुरा आदमी कितना बुरा है, यह भी अच्छे आदमी के कितना अच्छा होने के बरक्स तय होता है। कवि ने नीचाइयों की डेप्थ नहीं, साइट की बात की है। नकारात्मक बात को सकारात्मक नजरिये से ऐसे भी देखा जा सकता है।

व्यवस्था का आग्रह रहता है कि मसलों को पॉजिटिविटी से देखा जाए। तरक्की हो रही है तो उसके मुकाबले पतन भी। विकास की ग्रोथ रेट होती है तो विनाश की ग्रोथ रेट अपने आप तय हो जाती है, बिना किसी मीटर के नापे। इन्हीं तमाम संदर्भों की पृष्ठभूमि में जब हम राजनीति की भाषा के बारे में सोचते हैं तब और अब तो तस्वीर डरावनी लगती है।राजनीति में नारे और भाषण अब जुमलों में सिमट गए हैं। ये जुमले भी दो कौड़ी के। प्रशासनिक और राजनीतिक शब्द-संक्षेपों की जिस अंदाज़ में व्याख्या होती है, सिर कूटने का मन करता है। मामला एकतरफा नहीं है। राजनीति में जो जहाँ है, वहीं से जुमले और शिगूफों के कागजी रॉकेट छोड़ रहा है। समाज भाषा के स्तर पर पतन के चरम शिखर की ओर उन्मुख है।

हद तो तब हो जाती है जब संवैधानिक पदों पर बैठे नेता खुले मंच से ‘गोली मारो सालों को’ जैसे आह्वान करते हैं। या देश को रामजादे और हरामजादे के बीच वर्गीकृत करते हैं। ‘हाय-हाय मोदी, मर जा तू’ का जाप हो, या ‘मोदी, तेरी कब खुदेगी’ जैसे नारे जेएनयू परिसर में लगाए जाएं सब कुछ एक ही श्रेणी में आता है।सांसद और विधायक भी पीछे नहीं हैं। वे लात-घूंसे की भाषा में बात करते सुने जा सकते हैं। और भी भोंड़ी, भद्दी, बेसिर-पैर की टांग-तोड़ तुकबंदियां आए दिन सुनने को मिलती हैं। कमाल यह कि टीवी चैनलों के पैनलिस्ट इन पर गंभीर विमर्श करते दिखाई देते हैं।पिछले पांच-सात वर्षों की ओर लौटकर देखें तो सार्वजनिक सभाओं, संसद और विधानसभाओं में जनप्रतिनिधियों के भाषणों में कैसे-कैसे जुमले आए, कैसे-कैसे शब्द ट्वीट किए गए। तब संदेह होता है—क्या यही लोग नेहरू, लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी, जगन्नाथ राव जोशी, मधु लिमये, चंद्रशेखर और सोमनाथ चटर्जी जैसे नेताओं के वंशधर हैं?

इन महान नेताओं के बोले शब्दों को उनके समर्थक मंत्रों की तरह जपते थे। इन्हीं भाषणों से नारे निकलते थे, जो राजनीति और समाज की दिशा मोड़ देने की ताकत रखते थे। ये क्या हो गया है? भाषाई मर्यादा, उसका स्तर और संवैधानिक व्यवहार कहां से कहां जा पहुंचा है?पहले के नेता लड़ते भी थे और पढ़ते भी थे। नेहरू और लोहिया में राजनीति से इतर पढ़ने-लिखने की होड़ रहती थी। जनसंचार के सीमित दौर में भी दोनों ने इतना लिखा कि उन्हें पूरा पढ़ने में सालों लग जाएं। एक वाकया है जब जनता सरकार बनी और इंदिरा गांधी घर बैठ गईं, तो जयप्रकाश नारायण उनसे मिलने गए और पूछा, ‘इंदू, अब तुम्हारा खर्च कैसे चलेगा?’ (जयप्रकाश जी और इंदिरा जी के बीच सगे चाचा-भतीजी जैसा संबंध था)। इंदिरा जी ने जवाब दिया ‘फिक्र मत करिए, पिताजी की किताबों से इतनी रॉयल्टी आ जाती है कि बिना कुछ किए गुजारा चल जाएगा।’

लोहिया तो आजीवन अविवाहित रहे। उनकी किताबों की रॉयल्टी भी नेहरू से कुछ कम नहीं आती होगी। कौन लेता था, यह नहीं जानता, पर इन बातों का जिक्र इसलिए जरूरी है क्योंकि आज़ादी की लड़ाई और बाद की राजनीति में चौबीसों घंटे फंसे रहने वाले ये नेता पढ़ने-लिखने का समय निकाल लेते थे।इस पार या उस पार, जो भी बोलते थे, प्रभावी बोलते थे। वहीं से नारे निकलते थे, जो आंदोलन बन जाते थे। उनके बोले शब्द आज भी संदर्भों के रूप में उद्धृत किए जाते हैं। आज जो सामने है, उससे लगता है कि हमारे भाग्यविधाताओं का पढ़ने-लिखने से कोई वास्ता ही नहीं रहा। जो कुछ है भी, वह सतही ज्ञान से आगे नहीं बढ़ पाया।राजनीति की बात भी अब जिरह की भाषा में होती है। दरअसल, बड़े नेताओं के लिए पढ़ने, लिखने, सोचने और विचारने का काम अब पीआर एजेंसियों ने संभाल लिया है। वही भाषण लिखती हैं, जुमले गढ़ती हैं और सोशल मीडिया हैंडल करती हैं। अब एड एजेंसियों का वह कॉपीराइटर, जो ‘ठंडा मतलब कोका-कोला’ की पंचलाइन गढ़ता है, उससे यही उम्मीद की जा सकती है कि वह जीएसटी का मतलब ‘गब्बर सिंह टैक्स’ निकाल दे या बिहार में तक्षशिला लाकर खड़ी कर दे।

राजीव गांधी का वह डायलॉग आज भी याद होगा ‘सत्ता के दलालों को समझ लेना चाहिए कि इन नरम दस्तानों के भीतर लोहे के पंजे हैं।’ तब चर्चा उड़ी थी कि यह संवाद सलीम-जावेद ने लिखा है। राजनीति में पीआर एजेंसियों की यह पहली दस्तक थी।आज की एजेंसियों में काम करने वालों का किताबों से कोई वास्ता नहीं। संदर्भ सामग्री के लिए ये इंटरनेट पर निर्भर हैं। विकिपीडिया इनके लिए ज्ञान की गीता है, जबकि विकिपीडिया एक ओपन प्लेटफॉर्म है, जहां कोई भी कुछ भी जोड़-घटा सकता है। बड़े नेताओं को देखकर छोटे और मझोले नेता भी लोकल पीआर एजेंसियों की शरण में चले गए हैं। जिनसे कीबोर्ड पर उंगली भी ठीक से नहीं रखी जाती, वे भी ट्वीट के मजे ले रहे हैं।पिछले साल का एक नमूना देखिए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के प्रदूषण को देखते हुए पटाखों पर प्रतिबंध लगाया। इधर प्रदेश के एक मंत्री का तड़ से ट्वीट आया ‘प्रदेशवासियों, दिल्ली के मित्रों को बुला लीजिए, वहां दीपावली मनाने की पूरी आज़ादी है।’ मुझे नहीं लगता कि संवैधानिक मर्यादा से बंधे किसी व्यक्ति को उच्चतम न्यायालय के आदेश पर ऐसा तंज कसना उचित कहा जाएगा, वह भी पर्यावरण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर।

ये ऊटपटांग शब्दों वाले ट्वीट सिर्फ इसलिए किए जाते हैं ताकि चर्चा में रहें, ज्यादा से ज्यादा हिट्स और लाइक्स मिलें। पीआर एजेंसियों की अंधी स्पर्धा जनप्रतिनिधियों को जोकर बना रही है और वे खुश हैं कि पहले पन्ने पर छप रहे हैं, ब्रेकिंग में चल रहे हैं कैसे भी सही।एक बार मोरारजी देसाई बाणसागर के उद्घाटन के सिलसिले में रीवा आए। बात 1978 की है। तब मैं दसवीं में पढ़ता था। मैं उस समय के सांसद यमुनाप्रसाद शास्त्री जी के पारिवारिक सदस्य की तरह उनके यहां रहता था। उनके ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ निवास पर ही मोरारजी भाई की पत्रकार वार्ता रखी गई। जीवन में पहली बार पत्रकारों को और पत्रकार वार्ता को देखा वह भी प्रधानमंत्री की।

देसाई जी ने पहले एक-एक करके सबका परिचय पूछा। फिर न्यूज एजेंसियों और दैनिक अखबारों के प्रतिनिधियों के अलावा बाकी लोगों को बाहर जाने को कहा। पत्रकार वार्ता शुरू हुई। मोरारजी भाई ने अपने सामने टेप रिकॉर्डर रखा, खुद ही ऑन किया और सवालों के जवाब दिए। अंत में कहा ‘मैंने जो कहा है, वही छपे। आपने जो सोचा है, वह नहीं।’इस बात का मतलब मुझे तब समझ आया जब मैं पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था और मोरारजी देसाई तथा प्रख्यात अमेरिकी पत्रकार सैमुअर हर्श के बीच मानहानि का मुकदमा चल रहा था। इस केस में मोरारजी भाई ने हर्श से माफी मंगवाकर अदालत के बाहर समझौता करने को मजबूर कर दिया था। तब उनकी उम्र 94 वर्ष थी।मोरारजी देसाई जैसे नेता शब्दों की महत्ता और मर्यादा जानते थे। वस्तुतः राजनीति शब्दों की बाजीगरी ही है। यह एवरेस्ट तक पहुंचा सकती है और अरब सागर में विसर्जित भी कर सकती है।