संघ कार्य के 100 वर्ष पूर्ण होने पर जानिए प्रचारक

संघ कार्य के 100 वर्ष:  एक तपस्वी प्रचारक का मौन पुरुषार्थ ग्वालियर-चंबल में रखी संघ की नींव

सदियों की हल्की धुंध में लिपटी वह सुबह ग्वालियर स्टेशन के लिए सामान्य थी, किंतु इतिहास के लिए अत्यंत असाधारण। नागपुर से उत्तरा एक सांवला, नाटे कद का युवक हाथ में छोटा सा सामान लिए अपरिचित नगर को निहार रहा था। आंखों में तेज, हृदय में राष्ट्रसेवा का तप और मन में एक ही संकल्प-ग्वालियर की धरती पर संघ कार्य की ज्योति प्रज्वलित करना।

यह युवक थे श्री नारायण विश्वनाथ तटें, जिन्हें आगे चलकर समूचा क्षेत्र श्रद्धा से 'तटें जी' कहने लगा। मैट्रिक शिक्षा पूर्ण करते ही उन्होंने अपना जीवन राष्ट्रकार्य को समर्पित कर दिया था। जब उन्होंने नागपुर में संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के समक्ष प्रचारक बनने की इच्छा व्यक्त की, तब उनकी अल्प शिक्षा के कारण कुछ लोगों ने संकोच प्रकट किया। किंतु डॉ. हेडगेवार ने उनके भीतर धधकती राष्ट्र निष्ठा को पहचान लिया। ग्वालियर प्रस्थान के समय उन्होंने तटें जी को अपने हाथ से लिखी संघ प्रार्थना, चार रुपये, 'दासबोध' और 'गीता रहस्य' की प्रतियां देकर विदा किया। यही उनकी पूंजी थी।

अपरिचित नगर में तपस्वी जीवनः ग्वालियर उनके लिए पूर्णतः अनजान था। रेलवे फाटक के पास स्थित श्रीकृष्ण धर्मशाला में तीन दिन का आश्रय मिला, पर उसके बाद कोई ठिकाना नहीं था। भोजन की निश्चित व्यवस्था भी नहीं। कई बार स्टेशन और खुले मैदानों में रात्रि बितानी पड़ती। किंतु तटें जी के लिए यह कठिनाई नहीं, साधना थी। दिन भर वे नगर की गलियों में घूमते, लोगों से परिचय बढ़ाते और समाज की नब्ज पहचानने का प्रयास करते। नई सड़क स्थित मधुमालती रेस्टोरेंट के संचालक उनकी सादगी और ध्येयनिष्ठा से इतने प्रभावित हुए कि अत्यंत कम मूल्य में भोजन कराने लगे। कभी-कभी वही स्थान उनका विश्रामस्थल भी बन जाता।

आत्मीयता से खड़ी हुई संगठन की नींवः तटें जी केवल कार्यकर्ता नहीं खोज रहे थे; वे ऐसे हृदय तलाश रहे थे जिनमें राष्ट्रभावना का दीप प्रज्वलित हो सके। एक दिन उन्होंने एक मराठी युवक को कॉलेज से लौटते देखा और उसके पीछे-पीछे घर तक पहुंच गए। युवक ने आश्चर्य से पूछ 'आपण कोणा कड़े आला आहात?' (आप किसके यहाँ आये हैं) तटें जी मुस्कराए और बोले 'आपण कड़ेच।' (मैं आपके यहीं आया हूँ) यही आत्मीय संवाद आगे चलकर ग्वालियर में संघकार्य की आधारशिला बना। वह युवक था दत्तात्रेय त्रियम्बक कल्याणकर। तटें जी ने उसकी पुस्तकालय से पुस्तक ली और दो दिन बाद लौटाने के बहाने पुनः पहुंचे। यह केवल पुस्तक का आदान-प्रदान नहीं था, बल्कि विश्वास और आत्मीयता का श्री नारायण विश्वनाथ तर्टे सेतु था। धीरे-धीरे मुकुंदराव वाघ, पु.ना. सोहनी और हरि रामचंद्र दिवेकर जैसे अनेक लोग उनके संपर्क में आए। 

जनकगंज स्थित पोतनीस धर्मशाला में उनके रहने की व्यवस्था हुई। वहीं से साप्ताहिक एकत्रीकरण प्रारंभहुआ और राष्ट्रभक्ति के बीज अंकुरित होने लगे। सन् 1938 में नियमित शाखा प्रारंभहुई। स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ने लगी तो शाखा लक्ष्मीगंज स्थित सातभाई की गोठ के विशाल मैदान में लगने लगी। उस समय ग्वालियर रियासत में बाहरी संगठनों को लेकर संदेह का वातावरण था। कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि शाखा किसी अन्य नाम से चलाई जाए। किन्तु तटें जी अडिग रहे। उन्होंने स्पष्ट कहा कार्य 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' के नाम से ही होगा। इसी बीचहिन्दू महासभा के नेता डॉ. बालकृष्ण मुंजे ग्वालियर आए। शाखा में उन्होंने निर्भीक स्वर में संघ का नाम लेते हुए कहा कि संगठन अपने उद्देश्य और पहचान से कभी विचलित नहीं होता। इसके बाद सारी शंकाएं समाप्त हो गई और शाखाएं खुले रूप में संचालित होने लगीं।

अटल जी को स्वयंसेवक बनाया था

तर्टे जी का व्यक्तित्व केवल संगठन विस्तार तक सीमित नहीं था; उन्होंने अनेक प्रतिभाओं को राष्ट्रकार्य से जोड़ा। उन्हीं दिनों ग्वालियर शाखा में आने वाले एक तेजस्वी युवक थे अटल बिहारी वाजपेयी। तर्टे जी के सान्निध्य और संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया। स्वयं अटल जी ने अनेक अवसरों पर स्वीकार किया कि उनके सार्वजनिक जीवन के निर्माण में नारायण राव तटें का महत्वपूर्ण योगदान रहा। प्रधानमंत्री बनने के बाद जब अटल जी नागपुर पहुंचे, तब वे संघ कार्यालय जाकर तर्ट जी का आशीर्वाद लेने अवश्य गए। यह केवल गुरु-शिष्य का मिलन नहीं, बल्कि तप और संस्कार के प्रति कृतज्ञता का विनम्र प्रणाम था।

मौन पुरुषार्थ की अमर गाथा

तटें जी ने ग्वालियर ही नहीं, भिंड, मुरैना, शिवपुरी और गुना तक संघकार्य का विस्तार किया। बाद में उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार जैसी संस्थाओं में भी महत्वपूर्ण दायित्व निभाए। जीवन के अंतिम समय तक वे नागपुर के मोहिते का बाड़ा स्थित शाखा में नियमित जाते रहे। 1 अगस्त 2005 को यह कर्मयोगी पंचतत्व में विलीन हो गया, किंतु उनका पुरुषार्थ आज भी प्रेरणा देता है कि महान कार्य संसाधनों से नहीं, संकल्प, चरित्र और तपस्या से खड़े होते हैं। ग्वालियर की धरती आज भी उस मौन तपस्वी की गाथा सुनाती है, जिसने अकेले आकर इतिहास की दिशा बदल दी।