भारत में नक्सलवाद के खिलाफ सुरक्षा उपायों और विकास

नक्सलवाद से विकास की निर्णायक यात्रा

भारत आज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। जहाँ सड़क पहुँचती है, वहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य पहुँचते हैं; जहाँ शिक्षा और अवसर बढ़ते हैं, वहाँ हिंसा का प्रभाव स्वतः कम होने लगता है। यही वह प्रक्रिया है, जो किसी भी उग्रवादी विचारधारा को दीर्घकाल में कमजोर करती है।

भारत की लोकतांत्रिक यात्रा अनेक बड़ी चुनौतियों से होकर गुजरी है, किंतु नक्सलवाद उन चुनौतियों में रहा, जिसने केवल कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि विकास, सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी गहराई से प्रभावित किया। पाँच दशकों तक चली इस हिंसा ने हजारों निर्दोष नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और सुरक्षा बलों के जवानों की जान ली तथा आदिवासी क्षेत्रों को भय और असुरक्षा के वातावरण में जीने के लिए विवश किया। एक समय इसे भारत की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती कहा जाता था, किंतु आज परिस्थितियाँ बदल रही हैं। प्रभावी सुरक्षा अभियानों, प्रशासनिक पहुँच और विकास-केंद्रित नीतियों ने यह संकेत दिया है कि भारत इस चुनौती पर निर्णायक बढ़त बना चुका है।

नक्सलवाद की शुरुआत सामाजिक और आर्थिक असंतोष की पृष्ठभूमि में हुई थी। भूमिहीनता, पिछड़ापन और प्रशासनिक उपेक्षा ने कुछ क्षेत्रों में असंतोष को जन्म दिया, किंतु समय के साथ यह आंदोलन अपने घोषित उद्देश्यों से भटककर हिंसा, उगाही और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमलों का पर्याय बन गया। स्कूलों, सड़कों और सार्वजनिक संपत्तियों को निशाना बनाना तथा निर्दोष नागरिकों की हत्या किसी भी वैचारिक संघर्ष को वैधता नहीं दे सकती। लोकतंत्र में असहमति के लिए पर्याप्त स्थान है, पर हिंसा कभी समाधान नहीं हो सकती।

पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने इस समस्या को केवल सुरक्षा के दृष्टिकोण से नहीं देखा। यह समझ विकसित हुई कि स्थायी समाधान के लिए सुरक्षा के साथ विकास और सुशासन की निरंतर उपस्थिति भी आवश्यक है। इसी सोच के अनुरूप सुरक्षा अभियानों को आधुनिक तकनीक, बेहतर खुफिया तंत्र और राज्यों के बीच समन्वय से मजबूत किया गया। साथ ही सड़क, बिजली, मोबाइल नेटवर्क, शिक्षा, स्वास्थ्य और बैंकिंग जैसी मूलभूत सुविधाओं का विस्तार उन क्षेत्रों तक किया गया, जहाँ कभी प्रशासन की उपस्थिति भी चुनौती मानी जाती थी।

इस समन्वित रणनीति का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। जिन इलाकों में कभी सरकारी कर्मचारी जाने से हिचकिचाते थे, वहाँ आज सड़कें बन रही हैं, विद्यालय खुल रहे हैं और स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँच रही हैं। डिजिटल सेवाओं तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता बढ़ाई है और लोगों का विश्वास मजबूत किया है। जब नागरिकों को यह महसूस होता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था उनकी समस्याओं का समाधान कर रही है, तब हिंसक विचारधाराओं का आकर्षण स्वतः कम होने लगता है।

नक्सलवाद के विरुद्ध संघर्ष में सुरक्षा बलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। कठिन परिस्थितियों में चलाए गए अभियानों, आधुनिक उपकरणों और सटीक खुफिया जानकारी के कारण नक्सली संगठनों की परिचालन क्षमता लगातार कमजोर हुई है। अनेक शीर्ष कमांडर मारे गए, गिरफ्तार हुए अथवा आत्मसमर्पण करने को विवश हुए। यह सफलता केवल सैन्य कार्रवाई का परिणाम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति और निरंतर प्रयासों का प्रतिफल है।

हालाँकि केवल सुरक्षा अभियानों से स्थायी समाधान संभव नहीं होता। किसी भी उग्रवादी आंदोलन की वास्तविक शक्ति उसके सामाजिक आधार में निहित होती है। इसलिए आदिवासी और वनवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और आजीविका के अवसर बढ़ाने पर विशेष बल दिया गया। ग्रामीण सड़कें, आवास योजनाएँ, स्वयं सहायता समूह और रोजगारोन्मुख कार्यक्रम स्थानीय समाज को मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। इसी के साथ आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति ने भी सकारात्मक परिणाम दिए हैं। अनेक युवाओं ने हिंसा का मार्ग छोड़कर सामान्य जीवन अपनाया है, जिससे नक्सली संगठनों के लिए नए कैडर तैयार करना कठिन हुआ है।

फिर भी यह मान लेना उचित नहीं होगा कि चुनौती पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। कुछ दुर्गम क्षेत्रों में नक्सली गतिविधियाँ अभी भी मौजूद हैं और डिजिटल माध्यमों के जरिए युवाओं को प्रभावित करने के प्रयास भविष्य की चुनौती बन सकते हैं। इसलिए सुरक्षा तंत्र को और अधिक तकनीकी रूप से सक्षम बनाने के साथ-साथ शिक्षा, जागरूकता और सकारात्मक सामाजिक संवाद को भी निरंतर मजबूत करना होगा।

यह भी आवश्यक है कि विकास केवल आँकड़ों तक सीमित न रहे। आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान, वनाधिकारों और स्थानीय संसाधनों पर उनके वैध अधिकारों का सम्मान लोकतांत्रिक शासन की प्राथमिकता होना चाहिए। जनभागीदारी आधारित विकास ही दीर्घकाल में स्थायी शांति और विश्वास स्थापित कर सकता है।

नक्सलवाद पर चर्चा करते समय यह भी स्मरण रखना होगा कि सबसे अधिक पीड़ा उन गरीब, आदिवासी और ग्रामीण परिवारों ने झेली है, जिन्होंने अपने परिजनों को खोया और वर्षों तक भय के वातावरण में जीवन बिताया। सामाजिक न्याय की माँग उचित हो सकती है, किंतु निर्दोष नागरिकों की हत्या, सार्वजनिक संपत्ति का विनाश और विकास कार्यों में बाधा कभी भी न्यायपूर्ण संघर्ष का माध्यम नहीं हो सकते। इसलिए आज आवश्यकता किसी वैचारिक रोमानीकरण की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाधान और समावेशी विकास की है।

भारत आज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। जहाँ सड़क पहुँचती है, वहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य पहुँचते हैं; जहाँ शिक्षा और अवसर बढ़ते हैं, वहाँ हिंसा का प्रभाव स्वतः कम होने लगता है। यही वह प्रक्रिया है, जो किसी भी उग्रवादी विचारधारा को दीर्घकाल में कमजोर करती है।

आज यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि तथाकथित 'लाल गलियारा' धीरे-धीरे विकास के नए गलियारे में परिवर्तित हो रहा है। यह परिवर्तन केवल सुरक्षा बलों की वीरता का परिणाम नहीं, बल्कि उस व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि का प्रतिफल है, जिसमें सुरक्षा, सुशासन और विकास को समान प्राथमिकता दी गई है। आने वाले वर्षों में इस नीति की निरंतरता ही इसकी सबसे बड़ी कसौटी होगी।

भारत ने अनेक कठिन चुनौतियों का सामना लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय संकल्प के बल पर किया है। नक्सलवाद के विरुद्ध संघर्ष भी उसी परंपरा का विस्तार है। अंतिम विजय तब होगी, जब जंगलों में गोलियों की आवाज नहीं, विकास की गतिविधियाँ सुनाई दें; जब किसी युवा के हाथ में हथियार नहीं, शिक्षा और रोजगार का अवसर हो; और जब आदिवासी अंचल भय के प्रतीक नहीं, बल्कि समृद्धि, विश्वास और आत्मसम्मान के केंद्र बनें। यही नए भारत की दिशा है और यही उस लोकतांत्रिक राष्ट्र की पहचान है, जो हिंसा नहीं, विकास; भय नहीं, विश्वास; और संघर्ष नहीं, सहभागिता के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प रखता है।