मेटा और गूगल : जवाबदेही से बचने का बहाना या तकनीकी विवशता?
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत में करोड़ों नागरिकों के दैनिक जीवन, विचारों, चुनावी विमर्श, बच्चों की मानसिक स्थिति और सामाजिक सौहार्द पर गहरा प्रभाव डालने वाले डिजिटल मंच आज के समय में सार्वजनिक जीवन के निर्णायक माध्यम बन चुके हैं। ऐसे में जब मेटा और गूगल यह कहते हैं कि उनके लिए हर विवादित सामग्री की निगरानी करना संभव नहीं है, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या यह तकनीकी सीमा है या जवाबदेही से बचने का सुविधाजनक तर्क?
विशेष रूप से तब, जब यही कंपनियां विज्ञापन लक्ष्यीकरण, उपभोक्ता व्यवहार की पहचान और सामग्री की प्राथमिकता तय करने के लिए अत्यंत उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और एल्गोरिदम का उपयोग करती हैं। जिस व्यक्ति तक जो सामग्री पहुंचानी होती है, वह पलक झपकते ही पहुंचा देती हैं। यही कारण है कि समय-समय पर दुनिया के अनेक देशों ने इन कंपनियों पर अरबों डॉलर के जुर्माने लगाए हैं और उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाइयां भी की हैं।
'निगरानी असंभव' का दावा कितना विश्वसनीय?
मेटा और गूगल का तर्क है कि उनके मंचों पर प्रतिदिन अरबों पोस्ट, वीडियो और टिप्पणियां आती हैं, इसलिए प्रत्येक सामग्री की पूर्व जांच संभव नहीं है। यह तर्क पहली नजर में सही लग सकता है, किंतु यह पूरी तरह सही नहीं है। यही कंपनियां यह भी दावा करती हैं कि उनके पास अत्याधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग और लाखों संकेतकों पर आधारित एल्गोरिदम हैं, जो उपयोगकर्ता की पसंद, भाषा, स्थान और व्यवहार का सटीक विश्लेषण कर सकते हैं।
ऐसे में यह स्वाभाविक है कि यदि यही तकनीक किसी व्यक्ति को उसकी रुचि के अनुरूप विज्ञापन दिखाने, कुछ सेकंड में कॉपीराइट उल्लंघन पहचानने और विज्ञापन नीतियों का पालन कराने में सक्षम है, तो फिर हिंसा, आतंकवाद, बाल यौन शोषण, संगठित दुष्प्रचार या घृणास्पद सामग्री जैसे मामलों में ऐसी सामग्री को त्वरित रूप से क्यों नहीं हटाया जा सकता? देखा जाए तो इस विषय पर इन कंपनियों द्वारा बार-बार असमर्थता जताना स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा करता है और भारत के संदर्भ में एक खास नैरेटिव तथा बाजार बनाने की ओर संकेत करता है।
भारत के नागरिकों के प्रति इनकी जिम्मेदारी क्यों नहीं तय होनी चाहिए?
यह एक बड़ा प्रश्न है कि जब भारत इन कंपनियों के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में से एक है और करोड़ों भारतीय नागरिक इन मंचों का उपयोग समाचार, शिक्षा, व्यापार और सामाजिक संवाद के लिए करते हैं, तब इन कंपनियों का दायित्व क्या केवल लाभ कमाना ही होना चाहिए? क्या भारतीय कानूनों का पालन करना और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना भी उनकी जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए?
यदि किसी मंच के एल्गोरिदम झूठी खबरों, हिंसक सामग्री या सामाजिक वैमनस्य फैलाने वाली पोस्ट को अधिक लोगों तक पहुंचाते हैं, क्योंकि उससे उपयोगकर्ताओं की सक्रियता बढ़ती है, तो क्या इसे केवल तकनीकी समस्या मानकर खारिज किया जा सकता है? सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रश्न यहां स्पष्ट रूप से उभरता है। यह सच है कि लोकतांत्रिक समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, किंतु उसके साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। आज मेटा और गूगल जैसी सभी कंपनियों को इसे समझने की आवश्यकता है।
दुनिया भर में बढ़ती सख्ती
यदि इन कंपनियों के दावे पूरी तरह सही होते, तो दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों को उनके विरुद्ध कठोर कदम उठाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। इससे जुड़े प्रमाण बताते हैं कि यूरोपीय संघ ने डिजिटल सर्विसेज एक्ट (DSA) और डिजिटल मार्केट्स एक्ट (DMA) लागू कर बड़े डिजिटल मंचों पर कठोर जवाबदेही तय की है। इन कानूनों के अंतर्गत मेटा और गूगल जैसी कंपनियों को अवैध सामग्री हटाने, जोखिम आकलन करने और अपने एल्गोरिदम की पारदर्शिता बढ़ाने के लिए बाध्य किया गया है।
आयरलैंड के डेटा संरक्षण आयोग ने उपयोगकर्ताओं के डेटा संरक्षण नियमों के उल्लंघन के कारण वर्ष 2023 में मेटा पर 1.2 अरब यूरो का रिकॉर्ड जुर्माना लगाया। यह इतिहास के सबसे बड़े गोपनीयता दंडों में से एक है। यूरोपीय आयोग ने भी गूगल पर प्रतिस्पर्धा कानूनों के उल्लंघन के लिए पिछले वर्षों में कुल मिलाकर 8 अरब यूरो से अधिक के जुर्माने लगाए। इनमें एंड्रॉयड, गूगल शॉपिंग और विज्ञापन कारोबार से जुड़े मामले शामिल थे। फ्रांस ने भी गोपनीयता और कुकी नीति से जुड़े उल्लंघनों के लिए गूगल और मेटा पर करोड़ों यूरो का दंड लगाया। यही कारण है कि दुनिया के अनेक देशों ने समय-समय पर इन मंचों पर प्रतिबंध या गंभीर प्रतिबंधात्मक कदम उठाए हैं।
ब्राजील में न्यायालयों ने कई अवसरों पर मेटा के मंचों के विरुद्ध कार्रवाई की और वर्ष 2024 में न्यायपालिका ने सोशल मीडिया कंपनियों से अवैध सामग्री हटाने के संबंध में कड़ा रुख अपनाया। तुर्किये ने सोशल मीडिया कानून बनाकर इन कंपनियों को स्थानीय प्रतिनिधि नियुक्त करने और न्यायालय के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य किया। पालन न करने पर विज्ञापन प्रतिबंध और बैंडविड्थ सीमित करने जैसी कार्रवाई का प्रावधान किया गया।
रूस ने वर्ष 2022 में मेटा को 'चरमपंथी संगठन' घोषित करते हुए फेसबुक और इंस्टाग्राम पर प्रतिबंध लगा दिया था। वहीं चीन में गूगल, फेसबुक और इंस्टाग्राम वर्षों से प्रतिबंधित हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि विभिन्न देशों ने अलग-अलग कारणों से इन कंपनियों पर कठोर नियंत्रण या प्रतिबंध लगाए हैं।
बच्चों और किशोरों पर बढ़ती चिंता
वर्तमान समय में सबसे गंभीर चिंताओं में से एक बच्चों और किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य है। ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका के कई राज्यों तथा यूरोप में सोशल मीडिया के बच्चों पर प्रभाव को लेकर लगातार जांच और कानून बनाने की प्रक्रिया चल रही है। अनेक सरकारें आयु सत्यापन, किशोरों के लिए एल्गोरिद्मिक अनुशंसाओं पर नियंत्रण और अभिभावकीय सुरक्षा उपायों को अनिवार्य बनाने की दिशा में काम कर रही हैं।
अमेरिका में अनेक राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने मेटा के विरुद्ध मुकदमे दायर किए हैं। आरोप है कि कंपनी के मंचों की डिजाइन ऐसी है, जो किशोरों में लत बढ़ाने और उनके मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली हो सकती है। मेटा इन आरोपों से असहमत रही है, किंतु ये मुकदमे स्वयं इस बात का संकेत हैं कि नियामकों की चिंताएं गंभीर हैं।
भारत को क्या करना चाहिए?
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में केवल कंपनियों के स्वैच्छिक आश्वासनों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता ऐसे नियामक ढांचे की है, जिसमें एल्गोरिदम की पारदर्शिता, शिकायतों के त्वरित निस्तारण, भारतीय कानूनों के अनुपालन, बच्चों की सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उत्तरदायी उपयोग और बार-बार नियमों का उल्लंघन करने पर कठोर आर्थिक दंड का स्पष्ट प्रावधान हो। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वैध आलोचना पर अनावश्यक अंकुश न लगे।
फिलहाल, इस संबंध में यही समझ बनती है कि दुनिया भर में लगाए गए भारी जुर्माने, नए कानून और न्यायिक हस्तक्षेप इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि डिजिटल शक्ति के साथ डिजिटल जवाबदेही भी उतनी ही अनिवार्य है। भारत के करोड़ों नागरिकों के हित में यह समय की मांग है कि इस अपेक्षा को हर हाल में पूरा किया जाए। यदि कोई कंपनी भारत में जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है, तो फिर नुकसान कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे देश से स्थायी रूप से विदा कर देना चाहिए। वस्तुतः, इसी में सभी की भलाई है।