डॉ. सुमन चौरे, लोकसंस्कृतिविद्

लोकसंस्कृति में तीर्थयात्रा की परम्परा

अयोध्याधाम में रामलला के दर्शनों और उनकी एक झलक पाने के लिए लोक का सागर उमड़ रहा है। राम का हर रूप, हर अवस्था लोक को अपनत्व का बोध कराती है। लोक ने अपने संस्कारों और अपनी परम्पराओं में राम को प्रतिक्षण अपने निकट पाया है। लोक अपने ग्रामदेवता की पूजा करता है, चावड़ी-चौपाल और पंचवटी की चौकी के देवता के प्रति भी उसकी आस्था है। अपने घर के पूजा स्थान में भी देवी-देवताओं का पूजन करता है। ईश्वर के प्रति यह अटूट विश्वास लोक को उसके ग्राम की सीमाओं तक बाँधता नहीं, बल्कि अनजान मार्गों पर बाधाओं को पार करते हुए तीर्थयात्रा पर जाने के लिए प्रेरित करता है। लोकसंस्कृति ने अपार श्रद्धा से भरी हुई तीर्थयात्रा की परम्परा को सहस्रों वर्षों में पुष्ट किया है।

ईश्वर-उपासना और ईश्वर-प्राप्ति के कई साधन हैं। देवस्थान-दर्शन और पवित्र नदियों-सरोवरों में स्नान अर्थात् तीर्थयात्रा को ईश्वर प्राप्ति का एक प्रमुख मार्ग बताया गया है। लोक में इस बात का श्रद्धापूर्वक पालन किया जाता है कि व्यक्ति जब अपने कर्तव्यों और पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त हो जाता है, तब वह तीर्थयात्रा का नियोजन करता है। या फिर कोई युवा अपने परिवार के वृद्ध सदस्य को तीर्थ करवाने ले जाता है। लोक-परम्परा के अनुसार तीर्थयात्रा में प्रमुख हैं—चारधाम, द्वादश ज्योतिर्लिंग, सप्तपुरी, शक्तिपीठ, पवित्र सरोवर-नदियाँ, पर्वत, प्राचीन मन्दिर, आश्रम आदि।

मध्यप्रदेश के दक्षिण-पश्चिम में मालवा और निमाड़ लोक-सांस्कृतिक क्षेत्र है। निमाड़ में तीर्थयात्रा से संबंधित सुदृढ़ लोक-परम्परा रही है। तीर्थयात्रा के लोकगीत इस परम्परा को समृद्ध करते हैं। ऐसा नहीं होता कि शासकीय सेवानिवृत्ति और पारिवारिक जिम्मेदारियों के पूरा होने के बाद कोई व्यक्ति निजी तौर पर योजना बनाए और तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। आम बोलचाल के शब्दों में कहें तो ‘ऐसे ही कोई उठा और छूटा’ जैसी तीर्थयात्रा नहीं होती। तीर्थयात्रा पर निकलने की तैयारी पूरे विधि-विधान से होती है।

मालवा-निमाड़ क्षेत्र का लोक चारों धामों की यात्रा में सबसे पहले जगन्नाथ धाम की यात्रा करता है। इस धाम से तीर्थयात्रा प्रारम्भ करने का एक प्रमुख कारण यह माना जाता है कि शुभारम्भ पूर्व दिशा से हो। इसके बाद पश्चिम दिशा में द्वारकाधीश धाम के दर्शन करते हैं। इसके पश्चात उत्तर में पर्वतराज हिमालय के आँचल में स्थित बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री-यमुनोत्री के दर्शन किए जाते हैं। इस धाम की यात्रा मार्ग की कठिनाइयों के कारण सर्वाधिक दुष्कर मानी जाती है। तीर्थयात्री गंगोत्री से जल भरकर लाते हैं। इस जल को दक्षिण के धाम रामेश्वरम् में शिवजी को अर्पित करके तीर्थयात्री वापस लौटते समय ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर और बाबा महाकालेश्वर को जल अर्पित करते हैं और क्षिप्रा व नर्मदा मैया में डुबकी लगाते हैं।

वर्तमान में तो लोग आवागमन के साधनों की सुविधा के अनुसार यात्रा का नियोजन करते हैं। इसके लिए मुहूर्त निकालने और उसके पालन की प्रथा अब मुश्किल से ही दिखती है। लेकिन कुछ दशकों पहले तक मुहूर्त निकालकर ही तीर्थयात्रा प्रारंभ होती थी। तीर्थयात्रा जाने के बहुत पहले ही यात्रा-शुभारम्भ की तिथि निश्चित कर ली जाती थी। गाँव के पटेल (मुखिया) इस यात्रा में सम्मिलित होने वाले यात्रियों के नाम लिख लेते थे। लोकगीतों में आस्था और देवता के प्रति भक्त का अपनापन झलकता है, जब देवता ही कागज पर चिट्ठी लिखकर भक्त को बुलावा भेजते हैं कि दूसरे स्थानों के भक्त आ गए हैं, तू क्यों नहीं आया अभी तक?

गीत का अंश:

बद्रीनाथ न लिख्या कागज दई भेज्या

तू रे वीरा बेगो आव

सगळो पोहो रे मान आई गयो

नईं आई म्हारी भोळई निमाड़

भोळई निमाड़ का मानवयी अ सो बोल्या

भावार्थ: बद्रीनाथ स्वामी ने संदेश भेजा है कि ‘हे भाई, तू दर्शन करने क्यों नहीं आया?’ सभी स्थानों से तीर्थयात्रियों के दल आ चुके हैं, पर भोली-भाली निमाड़ का मानस नहीं आया। इस पर निमाड़ के भाई कहते हैं—‘हमारे खेत में मिरी (मिर्ची), कपास फूल रही है, तुवर और जुवार निकालनी है। इसी से विलम्ब हो रहा है।’

लोक अपने आत्मीयजन को मन्दिर तक पहुँचाकर वापस घर लौट आते हैं। तीर्थ जाने वाले लोग रात को भूमि या चटाई पर सोते हैं और भोर होते ही तैयार हो जाते हैं। इस दिन लोग मन्दिर पहुँचकर यात्रियों को गाँव से विदाई देते हैं। तीर्थयात्रा में कैसे कष्ट हो सकते हैं, इसकी जानकारी एक रात मंदिर में भूमि पर सोने से ही मिल जाती है। जो लोग दृढ़निश्चयी नहीं होते या आराम पसंद होते हैं, वे गाँव से निकलकर ओंकार महाराज के दर्शन करके तुरंत वापस लौट आते हैं। गाँव से विदा लेने के बाद तीर्थयात्रियों को ‘तीर्थवासी’ कहा जाता है। घरवालों को तीर्थवासियों की याद आती है, तो उनके घर की महिलाएँ तीरथ-गीत गाकर अपने मन को समझा लेती हैं।

गीत का अंश:

सोन्ना रूप्पा की बाई थारी भायरी

या भायरी काई कव्हाय?

हमारा दादाजी मांय तीरथ गया

या भायरी मारग झड़ाय

हीरा मोती की बाई थारी छाबड़ी

भावार्थ: हे बहन, सोना-चाँदी की यह झाड़ू किस काम की है? बहन कहती है—मेरे आजा-दाजी और आजी तीरथ यात्रा को गए हैं। मैं इस झाड़ू से मार्ग झाड़ूँगी ताकि उनका मार्ग कंटकविहीन हो। और यह हीरे-मोती से जड़ी टोकनी किस काम की है?—इसमें मैं फूल भरकर मार्ग में बिछाऊँगी ताकि उनका मार्ग फूल-सा कोमल हो जाए। परिवारवालों को जितनी याद तीर्थवासियों की आती है, उतनी ही याद तीर्थवासी भी अपने परिवार की करते हैं। गंगा के दर्शन होते ही यह भाव और भी प्रबल हो उठता है। गंगा में उन्हें सतत प्रवाहिणी मातृत्व की छवि दिखाई देती है।

गीत का अंश:

ओ देवी गंगा वय हो सुरंगा

तो थारी झब्बर म्हारो निरमळ अंग

गंगा का लह्यर चढ़ाओ रे काप

भावार्थ: हे देवी गंगा! तुम بڑی सुहावनी बह रही हो। तुम्हारी लहरों के स्पर्श से मेरा तन निर्मल और मन आल्हादित हो उठा है। हे माता! तुम्हारे दर्शन से मेरा मन अपने परिवार में पहुँच गया है।

आज जब लोग देश-विदेश के पल-पल के समाचार रखते हैं, तब उस समय में कोई व्यक्ति घर से बहुत दूर अनजान स्थानों पर रहता था, और उसके लौटने की कोई निश्चित अवधि नहीं होती थी। तब सूचना-संप्रेषण का माध्यम केवल आत्मिक बल ही था। ऐसे में तीर्थयात्रियों के विषय में कोई समाचार न मिलने पर निमाड़ में प्रचलित तीरथ गीत बिछोह के करुण गीत बन जाते थे।

गीत का अंश:

ढेळ तो परवत भई, न अँगणों भयो परदेश

म्हारा वीरा रे तीरथ करी न बेगो आव

कचेरी बसन्त थारा पिताजी झूर

हिण्डोळा झूलन्ती थारी माँय…

भावार्थ: हे हमारे भाई! हमारे लिए तो घर की देहरी पर्वत-सी कठिन हो गई है और आँगन परदेश जैसा लगने लगा है। तेरे पिताजी कचहरी में बैठकर तुझे याद करते-करते घुल रहे हैं, और तेरी माता झूले पर झूलते हुए चिन्तित है। तू जल्दी तीरथ कर घर लौट आ।

तीर्थ-स्थानों के आनंद और कृपा-पूर्ण वातावरण में आस्थावान तीर्थवासी ऐसा रमता है कि उसे किसी बात की चिन्ता नहीं रहती। वह सांसारिक घटनाओं से ऊपर उठ जाता है। कभी-कभी तीर्थवासियों के संदेश उनके गाँव तक पहुँच जाते थे—जब कोई आस-पास के गाँव का यात्री लौटता था तो रास्ते में रुके यात्रियों की कुशल-क्षेम भी पहुँचा देता था।

तीर्थयात्रा सम्पन्न करके गाँव में आगमन

निमाड़ के लोक की प्रबल आस्था है कि कितने ही तीर्थ कर लो, किन्तु रेवा मैया में स्नान कर ओंकार महाराज को जल अर्पित न किया तो तीर्थयात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती। गाँव और कुटुम्ब के लोग तीर्थवासियों को ओंकारेश्वर में लेने आते हैं। भोर होते ही ढोल और परात की थाप पर गाते हुए सब उन्हें लेने पहुँचते हैं। प्रातःकाल सभी लोग तीर्थयात्रियों को बद्धाकर, उन्हें कुंकुम-अक्षत लगाकर आरती उतारते और बधावा गीत गाते हुए घर लाते हैं। मार्ग में उनके चरण धुलाए जाते हैं, चरणों पर कुंकुम-हल्दी लगाई जाती है, फूल वर्षाए जाते हैं। कुछ लोग तीर्थवासियों पर छत्र लगाकर उन्हें अपने घर तक ले जाते हैं।

तीर्थवासियों के घर पहुँचने पर हर्ष का अलग ही वातावरण हो जाता है। अड़ोस-पड़ोस में कई महीनों तक आनंद का माहौल रहता है। लोगों को जैसे-जैसे समाचार मिलता है कि तीर्थवासी लौट आए हैं, वे मिलने आते जाते हैं। ऐसा लगता है मानो उनका पुनर्जन्म हुआ हो। नाते-रिश्तेदार आते हैं और वस्त्र भेंट करते हैं। जब तीर्थवासी यात्रा पर रहते हैं, तब उनके घर प्रतिदिन रात को तीरथ-गीत गाए जाते हैं। अड़ोसी-पड़ोसी, रिश्तेदार और गाँव की अनेक महिलाएँ गीत गाने आती हैं। गीत गाने आने वालों को प्रसाद में जुवार की धानी या सेंगळई (मूँगफली) उनके आँचल में दी जाती है।

तीर्थयात्रा देश की अखण्डता को अक्षुण्ण बनाए रखती है। यह देश की सामाजिक-सांस्कृतिक-आध्यात्मिक संरचना को सुदृढ़ करती है। यह भारतवासियों को एक सूत्र में बाँधने का मूलमंत्र है। तीर्थयात्रा की परम्पराओं को देश के हर क्षेत्र की लोकसंस्कृति प्रभावित करती है, और इन तीर्थयात्राओं से बहुत कुछ ग्रहण करके यही लोकसंस्कृतियाँ समृद्धतर होती जाती हैं। लोकसंस्कृति की आत्मा लोकगीतों, लोककथाओं, लोककलाओं और प्रथाओं में बसती है। यही कारण है कि सहस्रों वर्षों से अगाध श्रद्धा से ओतप्रोत तीर्थयात्रा की परम्परा का पोषण लोकसंस्कृति करती आ रही है।