ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच हालिया युद्धविराम क

अमेरिका-ईरान-इजराइल के बीच युद्धविराम व भ्रम

बलबीर पुंज

दुनिया कई बार ऐसे मोड़ों पर आ खड़ी होती है, जहां शांति का हर दावा खोखला और जीत का हर शोर अधूरा लगता है। ईरान और अमेरिका-इजराइल टकराव का ताजा अध्याय भी कुछ ऐसा ही है- ऊपर से सन्नाटा, भीतर से सुलगता हुआ संघर्ष। दोनों के बीच हुए दो हफ्तों के युद्धविराम की घोषणा ने दुनिया को उस खाई के किनारे से खींच लिया, जहां हालात किसी महाविनाश की ओर बढ़ते दिख रहे थे। पांच हफ्ते से अधिक चला यह युद्ध पूरी दुनिया को बेचैन किए रहा। दोनों पक्ष खुद को विजेता बता रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि यहां किसी की साफ जीत नहीं हुई यह दोनों के लिए नुकसान का सौदा अधिक है। निसंदेह, इस संघर्ष में अमेरिका और ट्रंप की साख को जबरदस्त झटका लगा है। ट्रंप प्रशासन इस युद्धविराम को अपनी रणनीतिक सफलता बताते हुए दावा करता है कि उसने ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने के लिए मजबूर किया। लेकिन हकीकत कुछ और है। यह सामरिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग, तमाम बयानबाजी के बावजूद कभी भी पूरी तरह बंद नहीं हुआ न फरवरी 2026 से पहले और न ही 2023 में इजराइल पर हमास के भीषण हमले या 2025 में ईरानी परमाणु ठिकानों पर अमेरिका-इजराइल हमलों के बाद।

ऐसे में जो समुद्री मार्ग इस युद्ध से पहले वर्षों से खुला हुआ था, उसे अमेरिका द्वारा फिर से खुलवाना, वह भी मात्र 15 दिन के लिए और उसे उसे अपनी जीत की तरह प्रस्तुत करना, कुतर्क और हास्यास्पद है। उसका उद्देश्य कभी होमुंज रहा ही नहीं था। दरअसल, 'एपिक फ्यूरी' (2026) और 'मिडनाइट हैमर' (2025) जैसे अमेरिकी सैन्य अभियानों के जरिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना और वहां सत्ता परिवर्तन लाना अमेरिका का असली मकसद था। लेकिन इतनी ताकत झोंकने के बावजूद ये लक्ष्य पूरे नहीं हुए। सैंकड़ों भीषण मिसाइल ड्रोन हमलों से ईरान का परमाणु ढांचा कमजोर जरूर पड़ा, लेकिन खत्म नहीं हुआ। उसका वैज्ञानिक आधार और क्षमता अभी भी कायम है। सबसे अहम ईरान में जिस आंतरिक विद्रोह या इस्लामी सत्ता के ढहाने का प्रयास अमेरिका कर रहा था, वह पूरी तरह असफल हुआ।

इस युद्ध ने ईरान के बुनियादी ढांचे को बुरी तरह जोर दिया। इन्हें फिर से खड़ा करने में उसे सालों लग जाएंगे। लेकिन इतनी भारी तबाही के बावजूद न तो ईरान का मनोबल टूटा और न ही उसका इरादा टस से मस हुआ। युद्धविराम से कुछ घंटे पहले ही ट्रंप ने चेतावनी 'आज रात पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी' बताती है कि हालात कितने खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुके थे। सबसे बड़ी चूक शायद यही रही कि अमेरिका ने वर्तमान ईरान की मानसिकता को समझने में रणनीतिक भूल कर दी। ट्रंप की लेन-देन वाली और बदजबान कूटनीति ने ईरानी जिद और लड़ने की ताकत को कम आंका। लगभग पांच दशकों में आयतोल्ला के इस्लामी शासन ने ऐसे लाखों फिदायीनों को तैयार किया है, जो मजहबी कारणों से मरना पसंद करते हैं। उनके लिए सांसारिक सुख-सुविधाएं गौण हैं. वे इस्लाम के लिए शहादत को एक उच्च आदर्श मानते हुए दूसरी दुनिया (जन्नत) में मिलने वाले पुरस्कारों की कामना करते हैं। यही विचारधारा ईरान की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। दूसरी ओर, ईरान ने तेजी से इस युद्धविराम को अपनी जीत के रूप में पेश किया। उसके आधिकारिक बयानों में इसे अमेरिका की 'करारी हार बताया गया और दावा किया गया कि अमेरिका को उसकी कई शर्तें माननी पड़ीं जैसे प्रतिबंधों में ढील, परमाणु संवर्धन के अधिकार की मान्यता और होर्मुज जलडमरूमध्य में उसकी भूमिका को स्वीकार करना। 

इन दावों में कितनी सच्चाई है, यह अभी साफ नहीं है। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि लगातार हमलों के बावजूद टिके रहकर ईरान ने स्वयं को आंतरिक रूप से और क्षेत्रीय राजनीति में पहले से अधिक मजबूत किया है। कई लोगों ने सवाल उठाया कि इस मध्यस्थता के लिए भारत के बजाय पाकिस्तान को क्यों तरजीह मिली? बल्कि असली सवाल यह है कि क्या भारत को भी वहीं करना चाहिए था, जो पाकिस्तान ने ट्रंप को खुश करने के लिए किया? पाकिस्तान ने सुनियोजित राजनीतिक और आर्थिक चालें चलीं। जून 2025 में उसने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया, तो जनवरी 2026 में ट्रंप परिवार से जुड़े 'वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल' के साथ क्रिप्टो समझौता कर लिया। पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर के प्रभाव में उठाए गए ये कदम उसकी लेन-देन आधारित कूटनीति का परिणाम हैं।

भारत ने ऐसा नहीं किया और करना भी नहीं चाहिए था, क्योंकि वह कोई आठ दशक पुराना कृत्रिम राष्ट्र नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से स्थापित राष्ट्र है, जो अपने सम्मान से समझौता करके किसी नेता को खुश करने के लिए ऐसे सस्ते हथकडे नहीं अपनाएगा। यदि इस टकराव को सिर्फ सैन्य या राजनीतिक नजरिए से देखा जाए, तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी। पिछले एक हजार सालों का इतिहास बताता है कि जब-जब किसी विचारधारा ने खुद को एकमात्र सत्य माना, तब-तब हिंसक टकराव बढ़ा। यहूदी, ईसाई और इस्लामी परंपराओं के इतिहास में ऐसे कई दौर आए, जब मजहबी विश्वास सीधे खूनी संघर्ष में बदल गया। असल समस्या उस विचारधारा में है, जो मानती है कि उसका 'सत्य' ही अंतिम है। खूनी क्रूसेड्स, प्रारंभिक इस्लामी विस्तार और इक्विजिशन ये सब उसी मानसिकता की उपज थे। यरूशलम इसका जीवंत उदाहरण है, जहां सदियों से खून-खराबे का सिलसिला थमता नहीं दिखता।

ईरान-अमेरिका-इजराइल टकराव भी इसी जटिलता का एक हिस्सा है। एक तरफ ईरान है, जो हमास, हिज्बुल्लाह और हुती जैसे जिहादी संगठनों के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाता है। दूसरी तरफ अमेरिका है, जो क्षेत्रीय संतुलन को अपने मुताबिक ढालना चाहता है। वहीं इजराइल अपनी ऐतिहासिक और सभ्यतागत असुरक्षा के कारण बेहद सख्त रुख अपनाता है। इसलिए मात्र दो हफ्तों का संघर्षविराम किसी स्थायी समाधान का संकेत नहीं, बल्कि एक रणनीतिक ठहराव है। असल चुनौती बहुत गहरी है। जब तक संकीर्ण एकेश्वरवादी मानसिकता पर सवाल नहीं उठेगा, तब तक यह संघर्ष यूं ही चलता रहेगा। इसलिए ईरान-अमेरिका-इजराइल के बीच युद्धविराम केवल अल्प-विराम है।