आपातकाल के दौरान भोपाल के एक परिवार ने कैसे घर को

आपातकाल की आपबीती: घर बना आंदोलन का केंद्र परिवार बना संघर्ष की मिसाल

विनोद दुबे

आपातकाल के दौर की स्मृतियां केवल राजनीतिक घटनाएं नहीं, बल्कि उन परिवारों की कहानियां भी हैं जिन्होंने हर दिन भय और संघर्ष के बीच जीवन जिया। भोपाल के स्व. गिरिराज किशोर के पुत्र राकेश गौतम जब उन दिनों को याद करते हैं, तो उनके शब्दों में बचपन की मासूमियत के साथ उस समय की कठिनाई साफ झलकती है।

वे बताते हैं कि उस समय उनकी उम्र महज 7-8 वर्ष थी, जब पुलिस उनके पिता को घर से उठाकर ले गई। मौसा के तहत उन्हें करीब 19 महीने जेल में रखा गया। इसके बाद घर पर पुलिस की लगातार नजर बनी रही। आए दिन जांच के नाम पर पुलिस घर पहुंच जाती थी। इसी दौरान एक घटना ने उस दौर की संवेदनशीलता और साहस दोनों को उजागर किया। राकेश बताते हैं कि वरिष्ठ नेता दत्तोपंत ठेंगड़ी और आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन दिनों उनके घर ठहरे हुए थे। एक सुबह अचानक पुलिस घर पहुंची और दोनों के बारे में पूछताछ करने लगी। उस संकट की घड़ी में उनकी मां श्रीमती ज्योति शर्मा ने बड़ी सूझबूझ से दोनों को अपने भाइयों के रूप में परिचित कराया। ठेंगड़ी को बड़े भाई धनलाल शर्मा और नरेन्द्र मोदी को छोटे भाई विष्णु शर्मा बताया गया।

संयोग से उस दिन दोनों ने धोती कुर्ता के बजाय सफारी सूट पहन रखा था, जिससे पहचान और भी कठिन हो गई। पुलिस ने घर की तलाशी ली, लेकिन कुछ संदेह न होने पर वापस लौट गई। इस तरह एक साधारण सा पारिवारिक संवाद उस दिन आंदोलन के दो महत्वपूर्ण चेहरों को बचाने का कारण बन गया। बाद में जब गिरिराज किशोर जेल से रिहा हुए और एक कार्यक्रम में ठेंगड़ी जी को फिर से धोती कुर्ता में देखा, तो उन्होंने हल्के व्यंग्य में कहा कि 'इंदिरा आपको सफारी सूट तो पहना ही दिया'। यह टिप्पणी उस दौर की विडंबना को सहज तरीके से व्यक्त करती है।

राकेश बताते हैं कि उनका घर उन दिनों आंदोलन का गुप्त केंद्र बन चुका था। उनके यहां कम्पोजिटर टाइपसेटर मशीन थी, जिस पर रात में चोरी छिपे आंदोलन का साहित्य छापा जाता था। कार्यकर्ता उसे लेकर दीवारों पर चिपकाते और संदेश फैलाते थे। गिरिराज किशोर भेल में नौकरी करते हुए भी पूरी तरह आंदोलन में सक्रिय थे। उनका घर संघ और जनसंघ के नेताओं के लिए सुरक्षित ठिकाना बन गया था। लेकिन इस सक्रियता की कीमत भी परिवार को चुकानी पड़ी। पिता की गिरफ्तारी के बाद भेल प्रबंधन ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया और आवंटित मकान से भी बेदखल कर दिया। परिवार का सामान सड़क पर फेंक दिया गया। दिन में मां और बच्चे उसी सामान के साथ बाहर बैठे रहते और रात में किसी तरह सामान वापस अंदर रखकर सो जाते।

आर्थिक स्थिति भी डगमगा गई थी, लेकिन संघर्ष जारी रहा। 1971 में शुरू की गई आटा चक्की से घर का कुछ सहारा बना। घर के पास खाली पड़ी जमीन पर सब्जियां उगाकर जीवन चलाया गया। इस कठिन समय में संगठन के कार्यकर्ताओं ने भी चोरी छिपे आटा, तेल और राशन पहुंचाकर परिवार का साथ निभाया।

राकेश यह भी बताते हैं कि उनके पिता ने जेल में रहते हुए ही नागरिक सहकारी बैंक, भोपाल के डायरेक्टर का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। यह अपने आप में असाधारण घटना थी। जेल में उनके साथ रहे स्व. कैलाश नारायण सारंग ने इस पर टिप्पणी की थी कि 'तुमने जेल में रहकर चुनाव जीता है, अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी तुम्हें ही निभानी होगी'।

स्व. गिरिराज किशोर को यह कहानी केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं, बल्कि उस दौर के हजारों परिवारों की साझा पीड़ा और साहस की प्रतीक है। यह बताती है कि जब सत्ता का दमन चरम पर था, तब भी सामान्य परिवारों ने अपने साहस, सूझबूझ और संकल्प से लोकतंत्र की लौ बुझने नहीं दी।