क्या BRICS डॉलर के वर्चस्व को चुनौती दे पाएगा? भार

ब्रिक्स बनाम डॉलर- अमेरिकी चुनौती या सिर्फ सपना

जब एक ताकतवर देश अपनी शक्ति का इतना गलत इस्तेमाल करता है कि दूसरे देश उसके खिलाफ एक साथ हो जाते हैं। अमेरिका रूस को सजा देना चाहता था और चीन को डराना चाहता था। इसके बजाय उसने डॉलर के विकल्प बनाने के प्रयासों को और तेज कर दिया। हमने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह पैटर्न पहले भी देखा है जब आप अपनी सुरक्षा बढ़ाने की कोशिश करते हैं, तो दूसरों को इतना असुरक्षित बना सकते हैं कि वे आपके खिलाफ एकजुट हो जाएं।

राष्ट्रपति ट्रंप की हालिया धमकी इसका एक और उदाहरण है। उन्होंने कहा कि अगर कोई ब्रिक्स देश डॉलर छोड़ता है, तो उस पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा। लेकिन यह दांव उल्टा पड़ सकता है। इससे देशों के बीच यह विश्वास और मजबूत होता है कि अमेरिकी ताकत मनमानी और अविश्वसनीय है। शॉर्ट टर्म में छोटे देश डर सकते हैं, लेकिन लॉन्ग टर्म में यह उन्हें विकल्प खोजने के लिए और मजबूर करेगा।

भारत का संतुलन इस पूरे खेल में भारत की स्थिति सबसे दिलचस्प और सबसे जटिल है। नई दिल्ली ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है (2009 से) और 2026 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने शिखर सम्मेलन के लिए थीम घोषित की है- ‘ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ: बिल्डिंग ए बेटर वर्ल्ड टुगेदर’। इसका लोगो भी लॉन्च हो चुका है। भारत सक्रिय रूप से ब्रिक्स की गतिविधियों में भाग ले रहा है।

लेकिन साथ ही डॉ. जयशंकर यह भी साफ कहते हैं कि भारत डॉलर को बदलना नहीं चाहता, क्योंकि डॉलर की स्थिरता दुनिया के लिए जरूरी है। उन्होंने कहा है, “हम बहुध्रुवीय दुनिया में विश्वास करते हैं, लेकिन हम मुद्रा अराजकता नहीं चाहते।” यह कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि एक बेहद सोची-समझी रणनीति है।

भारत समझता है कि दुनिया एक ध्रुव से कई ध्रुवों में बदल रही है। वह इस नए आदेश को बनाने में भूमिका निभाना चाहता है, इसलिए ब्रिक्स में सक्रिय है। लेकिन भारत यह भी जानता है कि अमेरिका के साथ उसके गहरे आर्थिक संबंध हैं और चीन को संभालने के लिए अमेरिकी समर्थन जरूरी है। इसलिए भारत दोनों तरफ खेल रहा है.ब्रिक्स का इतना साथ दे रहा है कि उसका प्रभाव बना रहे, लेकिन इतना नहीं कि वाशिंगटन नाराज हो जाए। यह भारत की यथार्थवादी रणनीति है।

लेकिन यह संतुलन काम करेगा या नहीं, यह अनिश्चित है। भारत का इतिहास ऐसे प्रयोगों में मिली-जुली सफलता का गवाह है। 1950-60 के दशक में नेहरू ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के तहत अमेरिका और सोवियत संघ के बीच संतुलन साधा। यह रणनीति आंशिक रूप से सफल रही भारत ने दोनों महाशक्तियों से आर्थिक और तकनीकी सहायता हासिल की। लेकिन 1962 में जब चीन ने हमला किया और भारत को वास्तव में सहायता की सख्त जरूरत थी, तब न अमेरिका ने पूरी मदद की, न सोवियत संघ ने। भारत रणनीतिक रूप से अकेला पड़ गया।

आज की स्थिति और भी जटिल और जोखिम भरी है। यदि ब्रिक्स का प्रयोग असफल होता है, तो भारत ने अपनी कूटनीतिक साख और ऊर्जा व्यर्थ गंवाई होगी। दूसरी ओर, यदि ब्रिक्स सफल हो जाता है लेकिन भारत अत्यधिक सतर्क रहकर पूरी तरह नहीं जुड़ता, तो लाभ चीन को मिलेगा और भारत शायद सिर्फ दर्शक बनकर रह जाएगा।

और सबसे बड़ा खतरा यह है कि यदि वाशिंगटन को लगा कि भारत ब्रिक्स की ओर ज्यादा झुक गया है, तो क्वाड और रणनीतिक साझेदारियां कमजोर हो सकती हैं, जो चीन को रोकने के लिए जरूरी हैं। यह दोधारी तलवार पर चलने जैसा है।

पुरानी व्यवस्था तोड़ना इतना आसान नहींछ:मूल सवाल यही है क्या ब्रिक्स सच में डॉलर की ताकत को तोड़ सकता है। यथार्थवादी जवाब है नहीं, कम से कम निकट भविष्य में तो नहीं। डॉलर की ताकत सिर्फ अमेरिकी अर्थव्यवस्था में नहीं है, बल्कि दशकों की गहरी जड़ों में है। सत्तर वर्षों के व्यापारिक समझौते डॉलर में लिखे गए हैं। खरबों डॉलर के वित्तीय साधन डॉलर में ही हैं। इस पूरी व्यवस्था को बदलना ऐसे पेड़ को उखाड़ने जैसा है, जिसकी जड़ें जमीन में बहुत गहराई तक फैली हुई हैं।

इसके अलावा, एक नई भुगतान व्यवस्था बनाना एक बात है, लेकिन उसे डॉलर-व्यवस्था जितना भरोसेमंद, कुशल और तरल बनाना बिल्कुल दूसरी बात है। स्विफ्ट इसलिए काम करता है क्योंकि इसे दशकों से सुधारा गया है और इस पर अधिकांश देशों का भरोसा है। ब्रिक्स देशों को अभी यह साबित करना है कि वे भी इतनी मजबूत व्यवस्था बना सकते हैं।

‘यूनिट’ एक दिलचस्प प्रयोग है, लेकिन प्रयोग और वास्तव में काम करने वाली व्यवस्था में बहुत फर्क होता है। इसलिए ब्रिक्स डॉलर की ताकत को शायद ही पूरी तरह खत्म कर पाए। डॉलर रातों-रात खत्म नहीं होगा। जो बदलेगा धीरे-धीरे, उतार-चढ़ाव के साथ वह है डॉलर का एकाधिकार।

आने वाले समय में युआन, यूरो और शायद ब्रिक्स की ‘यूनिट’ भी डॉलर के साथ मिलकर काम करेंगे। लेकिन इस बदलाव में दशकों लगेंगे और इसकी कोई गारंटी नहीं है। अमेरिका पूरी ताकत से इस बदलाव को रोकने की कोशिश करेगा पैसे, राजनीति और धमकियों के जरिए। कई बार वह सफल भी होगा।

ब्रिक्स देशों के अपने आंतरिक मतभेद भी इस प्रक्रिया को धीमा करेंगे। रूस की कमजोर अर्थव्यवस्था, चीन की बड़ी बनने की इच्छा, भारत की सावधानी, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की सीमित ताकत ये सभी इस रास्ते में रुकावट डालेंगे।

फिर भी दिशा साफ है। जब इतने सारे देश यह मानने लगते हैं कि एक देश की मुद्रा पर निर्भर रहना उनकी आजादी के लिए खतरा है, और जब वे विकल्प की संभावना देखते हैं, तो पूरी तरह पीछे लौटना मुश्किल हो जाता है। सवाल यह नहीं है कि डॉलर को चुनौती मिलेगी या नहीं चुनौती तो मिल रही है। सवाल यह है कि क्या इस चुनौती से वास्तव में कुछ बदलेगा, या बिना किसी ठोस विकल्प के सिर्फ अस्थिरता बढ़ेगी।

इतिहास बताता है कि बड़े बदलाव धीमे और दर्दनाक होते हैं। और जो लोग बड़ी-बड़ी घोषणाएं करते हैं, वे अक्सर पाते हैं कि असलियत, बातों से कहीं ज्यादा जिद्दी होती है। ब्रिक्स भी शायद यही पाएगा।