आत्ममंथन का समय: आखिर टी-20 क्रिकेट में भारत की सोच कब बदलेगी?
(अनुराग तागड़े)
170 रन भी नहीं बचा सके... ऑस्ट्रेलिया ने फिर दिखा दिया कि टी-20 क्रिकेट केवल स्कोर नहीं, सोच का खेल है
महिला टी-20 विश्व कप में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत का "करो या मरो" मुकाबला केवल एक हार नहीं था, बल्कि भारतीय महिला क्रिकेट की वर्तमान टी-20 सोच पर बड़ा सवालिया निशान छोड़ गया। भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 170/4 का चुनौतीपूर्ण स्कोर बनाया, लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने 171 रन का लक्ष्य 19 ओवर में चार विकेट खोकर हासिल कर लिया और भारत का सेमीफाइनल का सपना टूट गया।
यह महिला टी-20 विश्व कप इतिहास का सबसे सफल रन चेज़ भी बन गया।इस हार की सबसे बड़ी वजह केवल गेंदबाजी नहीं थी। असली समस्या भारत की टी-20 मानसिकता रही, जो आज भी आधुनिक क्रिकेट की मांग के अनुरूप पूरी तरह विकसित नहीं हो सकी है।भारत ने पावरप्ले में विकेट नहीं गंवाए, जो किसी भी टीम के लिए मजबूत शुरुआत मानी जाती है। लेकिन सवाल यह है कि उस सुरक्षित शुरुआत का फायदा कितना उठाया गया? शुरुआती छह ओवरों में भारतीय बल्लेबाजों ने जोखिम लेने के बजाय विकेट बचाने पर अधिक ध्यान दिया। परिणामस्वरूप टीम कम से कम 25 से 30 रन पीछे रह गई।
टी-20 क्रिकेट अब विकेट बचाने का नहीं बल्कि अवसरों का अधिकतम उपयोग करने का खेल है। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और वेस्टइंडीज जैसी टीमें पावरप्ले को मैच का सबसे बड़ा हथियार मानती हैं। भारत अभी भी उसे "सुरक्षित शुरुआत" मानकर खेलता दिखाई देता है।यदि अंतिम ओवर में कप्तान हरमनप्रीत कौर तीन छक्के लगाकर विस्फोटक बल्लेबाजी नहीं करतीं, तो भारत शायद 155-160 रन तक ही सीमित रह जाता। हरमनप्रीत की 27 गेंदों पर तेज़ अर्धशतकीय पारी ने भारत को सम्मानजनक स्कोर तक पहुंचाया, लेकिन यह भी साफ कर दिया कि शुरुआत में जिस आक्रामकता की जरूरत थी, वह अंत में जाकर दिखाई दी।
यह भी सोचने वाली बात है कि क्या भारतीय बल्लेबाजी क्रम में खिलाड़ियों की भूमिकाएं स्पष्ट हैं? पूरे टूर्नामेंट में लगातार बल्लेबाजी क्रम बदला गया। किसी खिलाड़ी को स्थायी भूमिका नहीं मिली। टी-20 क्रिकेट में बल्लेबाज तभी सफल होते हैं जब उन्हें अपनी जिम्मेदारी और बल्लेबाजी क्रम का पूरा भरोसा हो।जेमिमा रोड्रिग्स जैसी प्रतिभाशाली बल्लेबाज पर भी सवाल उठ रहे हैं। तकनीकी रूप से बेहद सक्षम होने के बावजूद उनसे अपेक्षित निरंतर आक्रामकता दिखाई नहीं दी। आज का टी-20 क्रिकेट केवल अच्छी बल्लेबाजी नहीं, बल्कि मैच का रुख बदलने वाली बल्लेबाजी मांगता है।गेंदबाजी भी भारत की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर सामने आई।
शुरुआती सफलताओं के बाद भारतीय गेंदबाज ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों पर दबाव बनाए रखने में असफल रहे। एलिस पेरी और एश्ले गार्डनर ने केवल 57 गेंदों में 100 रन की साझेदारी कर मैच पूरी तरह भारत से छीन लिया। यही वह चरण था जहां भारतीय गेंदबाजों के पास न गति में विविधता थी, न सटीक यॉर्कर और न ही ऐसी रहस्यमयी गेंदें जो बल्लेबाजों को भ्रमित कर सकें।एक और बड़ा प्रश्न टीम चयन पर भी उठता है। निर्णायक मुकाबले में यास्तिका भाटिया को अंतिम एकादश में शामिल किया गया, जबकि भारत के पास अतिरिक्त स्पिन विकल्प या कोई मिस्ट्री स्पिनर शामिल करने का अवसर था। लॉर्ड्स जैसी पिच पर एक अतिरिक्त स्पिनर ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों के लिए चुनौती बन सकती थी। चयन समिति और टीम प्रबंधन को यह स्पष्ट करना होगा कि अंतिम एकादश परिस्थितियों के अनुसार चुनी जा रही थी या पूर्व निर्धारित सोच के आधार पर।
भारतीय टीम की फील्डिंग भी पूरे टूर्नामेंट में चिंता का विषय रही। कैच छोड़ना, मिसफील्ड और दबाव के समय साधारण गलतियां लगातार देखने को मिलीं। इससे पहले बांग्लादेश के खिलाफ भी कई आसान कैच छूटे थे। विश्व स्तरीय टी-20 क्रिकेट में एक कैच ही मैच का परिणाम बदल देता है। ऑस्ट्रेलिया जैसी टीम ऐसी गलतियों की कोई कीमत नहीं चुकाती, बल्कि विपक्ष से उसकी पूरी कीमत वसूलती है।सबसे महत्वपूर्ण सवाल अब भारतीय महिला टी-20 टीम के भविष्य को लेकर है। क्या अब समय आ गया है कि पुरुष टीम की तरह महिला टीम के लिए भी अलग टी-20 दर्शन अपनाया जाए?
भारतीय पुरुष क्रिकेट ने पिछले कुछ वर्षों में टी-20 प्रारूप में निडर बल्लेबाजी, स्पष्ट भूमिकाओं और आक्रामक मानसिकता पर जोर दिया है। महिला टीम को भी अब उसी दिशा में आगे बढ़ना होगा। केवल तकनीकी रूप से सक्षम खिलाड़ी पर्याप्त नहीं होंगे। ऐसे खिलाड़ियों की जरूरत होगी जो पहली गेंद से मैच पर नियंत्रण स्थापित करने का साहस रखें।घरेलू क्रिकेट और महिला प्रीमियर लीग (डब्ल्यूपीएल) में कई युवा खिलाड़ी लगातार आक्रामक क्रिकेट खेल रही हैं। चयन का आधार केवल अनुभव नहीं बल्कि स्ट्राइक रेट, फील्डिंग, बहुआयामी क्षमता और दबाव में खेलने की योग्यता भी होना चाहिए।कप्तान हरमनप्रीत कौर ने मैच के बाद स्वयं स्वीकार किया कि भारत मजबूत टीमों के खिलाफ अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं कर पाया और टीम को गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता है।
यह स्वीकारोक्ति बताती है कि बदलाव की जरूरत केवल बाहर से नहीं, टीम के भीतर भी महसूस की जा रही है।भारत के पास प्रतिभा की कमी नहीं है। समस्या सोच, रणनीति और टी-20 क्रिकेट की बदलती मांगों के अनुरूप स्वयं को ढालने की है। यदि भारत अगले विश्व कप में खिताब का वास्तविक दावेदार बनना चाहता है, तो उसे "सुरक्षित क्रिकेट" से आगे बढ़कर "निडर क्रिकेट" अपनाना होगा।
170 रन बनाने वाली टीम हार सकती है, लेकिन निडर सोच वाली टीम लंबे समय तक हारती नहीं। यही इस विश्व कप से भारतीय महिला क्रिकेट के लिए सबसे बड़ा सबक है।