संघ कार्य के 100 वर्ष: सतना में 1941 से लगने लगी शाखा, 1962 में सुदर्शन जी ने दी नई दिशा
सतना में संघ का कार्य स्थानीय सज्जन शक्ति के समर्पण से आकार ले सका। संघचालकों की सूची में विभाग संघचालक देवीशंकर खंडेलवाल, जिला संघचालक राज किशोर शुक्ल, जिला संघचालक शंकर प्रसाद ताम्रकार, तहसील संघचालक रामकृष्ण पांडे (मैहर), तहसील संघचालक रामकुमार अग्रवाल (नागौद) के नाम आज भी स्वयंसेवकों को प्रेरणा देते हैं। इन लोगों ने तमाम प्रतिकूलताओं को झेलकर भी संघ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को कम नहीं होने दिया।
सतना में संघ कार्य के लिए पूर्णकालिक व्रत लेकर घर छोड़ने वाले कार्यकर्ताओं की कमी भी नहीं रही। राजाभाऊ डेगवेकर, मुकुंदराव चांदे, कुलकर्णी, बबलू जोशी, श्री श्रावणे, रामचन्द्र तापीकर, सुंदर सिंह शक्रवार, सुदर्शन जी, रोशन लाल सक्सेना, कृष्णचंद सूर्यवंशी, नारायण शर्मा, श्री शिरपुरकर, विनायक तांबे जैसे नाम उस दौर में संघ कार्य की सतना में व्यापक व्याप्ति को प्रमाणित करते हैं।
सतनाः 1941 से लगने लगी शाखा
सतना जिले में संप शाखा का प्रारंभ नवम्बर 1941 में हुआ। शाखा का प्रारंभ निखिलेश पाल (उस समय किशोरवय विद्यार्थी) ने किया। उनके पिताजी रेलवे में कार्यरत थे। सतना में प्रभावी सामाजिक कार्यकर्ता राधेश्याम मेहरोत्रा, राजकिशोर शुक्ल, उस्ताद रामकृष्ण, संघ विचार के शुभ चिंतक थे। इन सभी विभूतियों ने सतना में पहली शाखा की शुरुआत में खुलकर सहयोग दिया। ध्यान देना होगा कि यह दौर स्वतंत्रता आंदोलन के चरम का समय भी था।
प्रारंभिक काल के संप कार्य से जुड़ने वाले कार्यकर्ताओं में गोविंद प्रसाद नेमा, श्रीदेखि, श्री पालधीकर (रेलवे ड्राइवर), श्री कानेटकर तथा शिव प्रसाद केसरवानी प्रमुख थे। सतना में संघ कार्य के विस्तार की दृष्टि से श्रीकृष्ण द्विवेदी, राजपाल सिंह तोमर, हुकुमचंद जैन, लल्लन प्रसाद, सुखेन्द्र सिंह आदि युवाओं को संघ कार्य के विस्तार हेतु सतना से रीवा भेजा गया। सन् 1947 तक आते-आते विंध्य के इन दोनों जिलों में संघ कार्य विस्तार पा चुका था। अकेले सतना जिले में लगभग 25 स्थानों पर शाखाएं लगने लगी थीं। सतना नगर में उस दौर में 14 शाखाएं लगती थीं।
प्रतिबंध के बाद भी कम नहीं हुआ संघ कार्य
1948 में संघ पर पहले प्रतिबंध के कारण सन् 1952 तक संघ कार्य प्रभावित हुआ, लेकिन स्वयंसेवकों का उत्साह और प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं आई। जिले में इस काल में भी 12 शाखाएं लग रही थीं, हालांकि सतना नगर में पुलिसिया भय के कारण शाखाओं की संख्या घटकर 6 ही रह गई थी। सन् 1952 से 1957 तक संघ कार्य में शाखाओं की संख्यात्मक दृष्टि से विशेष प्रगति नहीं हुई, लेकिन संघ गांव और कस्बों तक अपनी पहुँच बढ़ा रहा था।
1962 में सुदर्शन जी विभाग प्रचारक बन सतना आए
सन् 1962 में जिले में शाखाओं की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। नगर में संघ कार्य फिर से सक्रिय हुआ। के.सी. सुदर्शन जी विभाग प्रचारक के रूप में जिले में आए और 1967 तक सतना में कार्यरत रहे। उनके कार्यकाल में सतना जिले में संघ का व्यापक विस्तार हुआ। प्रतिबंध अवधि में निष्क्रिय हो चुके पुराने कार्यकर्ताओं को सुदर्शन जी ने नई ऊर्जा के साथ सक्रिय किया और देखते ही देखते नए-नए स्थानों पर संघ का काम खड़ा हो गया। शाखाओं की संख्या जिले में 35 तक पहुंच गई।
1967 से 1972 के बीच अनुषांगिक क्षेत्र के संगठनों का कार्य प्रारंभ हुआ। इसके तहत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्, भारतीय मजदूर संघ तथा सरस्वती शिशु मंदिर का कार्य प्रारंभ हुआ। सन् 1968 में सतना में संघ शिक्षा वर्ग लगा, जिससे एक अलग ही वातावरण निर्मित हुआ। 1973 में संघ शिक्षा वर्ग पुनः लगा, जिससे संघ कार्य का और विस्तार हुआ।
1975 में आपातकाल के कारण सभी शाखाएं बन्द हो गई थीं, लेकिन अन्य माध्यमों से स्वयंसेवकों की सक्रियता बनी रही। स्वयंसेवकों ने आपातकाल को चुनौती के रूप में स्वीकार किया। मुद्रण कार्य व्यवस्थित ढंग से किया गया, संप साहित्य और आपातकाल के विरोध में बड़े पैमाने पर साहित्य का वितरण हुआ। जेल गए कार्यकर्ताओं के परिवारों को आर्थिक और पारिवारिक सहायता भी प्रदान की गई।
सन् 1977 में आपातकाल हटने के बाद संघ कार्य पुनः प्रारंभ हुआ। संघ के प्रति लोगों की रुचि बढ़ी, कई कार्यकर्ता राजनीति छोड़कर संघ में आए। सन् 1980-81 में लगातार दो वर्ष संघ शिक्षा वर्ग सतना में लगा और नए कार्यकर्ताओं का निर्माण हुआ। शाखाओं की संख्या 39 तक पहुंच गई। कल्याण आश्रम, विश्व हिन्दू परिषद्, भारतीय मजदूर संघ, विद्यार्थी परिषद् जैसे संगठनों का कार्य जिले में सक्रिय हुआ। विद्या भारती के लिए समाज की सज्जन शक्ति एकजुट हुई। नतीजतन, सतना का सरस्वती शिशु मंदिर प्रांत का प्रमुख विद्यालय बन गया। नगर की पिछड़ी बस्ती में निःशुल्क विद्यालय शाखा प्रारंभ की गई तथा वनवासी बन्धुओं के मध्य नागौद में प्रौढ़ शिक्षा केंद्र चलाया गया।
सतना में दो बार आए गुरुजी
संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर 'गुरुजी' दो बार सतना प्रवास पर आए। एक बार वे संघ शिक्षा वर्ग में भी शामिल हुए। तृतीय सरसंघचालक बाला साहेब देवरस एक बार जिला प्रवास पर तथा दो बार संघ शिक्षा वर्ग में सतना आए। एकनाथ रानाडे, बाबासाहब आपटे, माधवराव मुल्ये, रज्जू भैया, मोरोपंत पिंगले, यादवराव जोशी जैसे तपोनिष्ठ प्रचारक भी तत्समय अलग-अलग दायित्वों के लिए जिले में प्रवास पर आते रहे।