यूपी में ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने पर रोक, HC ने पंचायत चुनाव टालने पर सरकार से सवाल किए
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पंचायत व्यवस्था को लेकर बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें प्रशासक बनाए जाने के राज्य सरकार के फैसले पर रोक लगा दी है। साथ ही कोर्ट ने पंचायत चुनाव टालने को लेकर भी सरकार से कड़े सवाल पूछे हैं। यह मामला पंचायत चुनाव और संवैधानिक प्रावधानों के बीच टकराव का रूप ले चुका है, जिससे प्रदेश की ग्रामीण प्रशासनिक व्यवस्था पर अनिश्चितता की स्थिति बन गई है।
प्रशासक नियुक्ति पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243E के तहत पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष तक सीमित है और इसे किसी भी स्थिति में आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। कोर्ट ने राज्य सरकार के उस फैसले को असंवैधानिक बताया, जिसमें प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें प्रशासक के रूप में काम जारी रखने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून या अध्यादेश के जरिए चुनाव को टालकर कार्यकाल बढ़ाना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है और ऐसे किसी भी आदेश को मान्यता नहीं दी जा सकती।
पंचायत चुनाव टालने पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि आखिर किस आधार पर चुनाव समय पर नहीं कराए गए और संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद कार्यकाल बढ़ाने का आदेश कैसे जारी हुआ। कोर्ट ने पहले के फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें इस तरह की व्यवस्था को पहले ही असंवैधानिक माना जा चुका है।
याचिका और कानूनी आधार
यह मामला न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की अदालत में अरविंद राठौर की याचिका पर सुनवाई के बाद सामने आया। याचिका में सरकार के 25 और 26 मई के आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें पंचायत राज अधिनियम की धारा 12(3-ए) के आधार पर प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने का निर्णय लिया गया था। कोर्ट में यह भी बताया गया कि पहले ही डिवीजन बेंच इस प्रावधान को संविधान के खिलाफ घोषित कर चुकी है, जिसके बाद मौजूदा आदेश की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
गांवों की प्रशासनिक व्यवस्था पर असर
प्रदेश में करीब 57 हजार से अधिक ग्राम पंचायतें हैं और 26 मई 2026 को ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रशासक नियुक्त करने के फैसले पर रोक लगने से अब ग्रामीण प्रशासन के संचालन को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है। इसी बीच सरकार ओबीसी आयोग के जरिए पंचायत आरक्षण और जनसंख्या आंकड़ों की समीक्षा की प्रक्रिया भी आगे बढ़ा रही है, जिससे पंचायत चुनाव में और देरी की संभावना बनी हुई है।