सतपुड़ा की वादियों में महुआ फूलों की खुशबू, वनांचल में लौटी रौनक
सतपुड़ा की वादियों में फाल्गुन मास की विदाई और चैत्र मास की दस्तक के साथ ही वनांचल इन दिनों महुए की भीनी-भीनी खुशबू से सराबोर हो उठा है। ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से घिरे चिचोली, भीमपुर एवं शाहपुर ब्लॉक के सुदूर क्षेत्रों में महुआ फूलों का टपकना शुरू हो गया है, जिससे पूरा वातावरण महक उठा है। प्राकृतिक परिवेश में घुली महुए की सुगंध जहां मन को आनंदित कर रही है, वहीं यह आदिवासी समुदाय के लिए आर्थिक समृद्धि की उम्मीद भी लेकर आई है।
भवानी प्रसाद मिश्र की पंक्तियां हुईं साकार
बैतूल अंचल के जंगलों और महुए की मादकता से प्रभावित होकर भवानी प्रसाद मिश्र ने अपनी रचनाओं में महुए की खुशबू का सजीव वर्णन किया था। वर्तमान मौसम और वनांचल की स्थिति को देखकर उनकी पंक्तियां साकार होती नजर आ रही हैं। जंगलों में बिखरे हल्के पीले-सफेद महुआ फूल और उनकी सुगंध वातावरण को अलौकिक बना रही है।
महुआ बीनने के दौरान आग से बचें
जहां एक ओर महुए की आवक से ग्रामीणों में उत्साह है, वहीं वन संपदा पर खतरे के बादल भी मंडरा रहे हैं। अक्सर महुआ बीनने के लिए पेड़ों के नीचे सूखी घास हटाने के उद्देश्य से आग लगा दी जाती है, जो हवा के साथ फैलकर बड़े वन क्षेत्र को नुकसान पहुंचाती है। इससे वन्यजीवों और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
वनवासियों के लिए ‘कल्पवृक्ष’ है महुआ
क्षेत्र के जनजातीय समाज के लिए महुआ का पेड़ किसी ‘कल्पवृक्ष’ से कम नहीं माना जाता। यह उनकी आजीविका और संस्कृति का अहम हिस्सा है। महुआ झरने से पहले ही ग्रामीण अपने-अपने पेड़ों के नीचे साफ-सफाई कर कपड़े का चिन्ह बांध देते हैं, जिससे स्वामित्व तय हो जाता है। परंपरा के अनुसार, जिस पेड़ पर जिसका चिन्ह होता है, महुआ बीनने का अधिकार भी उसी का होता है।इस वर्ष अनुकूल मौसम के चलते चिचोली और भीमपुर क्षेत्र में महुए की अच्छी आवक देखी जा रही है।
वन विभाग की अपील
वन विभाग ने ग्रामीणों से अपील की है कि महुआ संग्रहण के दौरान किसी भी स्थिति में आग का प्रयोग न करें। जंगलों की सुरक्षा हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है, ताकि प्राकृतिक संपदा और पर्यावरण संतुलन बना रहे।